बुधवार, 20 मई 2026

युवा राजनेता श्री राजीव गांधी

देश के युवा राज-नेताओं में राजीव गांधी थे एक,

केवल ४० वर्ष की उम्र में वे प्रधानमंत्री बने नेक।
अद्भुत क्षमता उच्च तकनीक आधुनिक थी सोच,
लोकप्रिय वो नेता जिनके चाहने वाले थे अनेंक।।

सहनशील और निर्मल था जिनका ऐसा स्वभाव,
कंप्यूटर और विज्ञान के क्षेत्रो में दिखाया प्रभाव।
वतन तरक्की के खातिर दिया युवाओं पर ध्यान,
एक उदार नेता की छवि सरल था जिनका भाव।।

फिरोज गांधी व इंदिरा गांधी की यह ऐसी संतान, 
लंदन इम्पीरियल कॉलेज से हाॅसिल किया ज्ञान।
मज़बूत महफूज़ देश को बनाना चाहते थे महान,
पायलट बनकर चलाया पहले एयरलाइन्स यान।।

२० अगस्त १९४४ को आप जन्मे बंबई महाराष्ट्र,
मां के कहे राजनीति में आये कार्य किये उत्कृष्ट।
लाये कंप्यूटर व संचार क्रांति किया राज सशक्त,
अमिट छाप व सौगातें छोड़ी याद करता ये राष्ट्र।।

१९६८ में इटली की एन्टोनिया संग विवाह किया,
पुत्र राहुल, पुत्री प्रियंका ने‌ गांधी घर जन्म लिया।
२१/५/१९९१ तमिलनाडु श्रीपेरंबदूर में जो हुआ,
तत्पश्चात भारत रत्न देकर इन्हें ये सम्मान दिया।।

सैनिक की कलम 
गणपत लाल उदय, अजमेर राजस्थान

अपराधमुक्त राजनीति से ही संभव है नया भारत-विकसित भारत

भारत आज एक ऐतिहासिक संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक ओर देश विकसित भारत-2047 के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, वैश्विक मंचों पर भारत की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत विश्व राजनीति और कूटनीति के केंद्र में उभर रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय राजनीति में अपराध, धनबल और बाहुबल की बढ़ती पैठ लोकतंत्र की आत्मा को आहत कर रही है। यह विडंबना ही है कि जिस भारत को विश्वगुरु बनने का स्वप्न दिखाया जा रहा है, उसकी राजनीति अभी भी अपराधमुक्त नहीं हो सकी है। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सामने आए आंकड़ों ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। समाचार पत्रों में प्रकाशित एडीआर (ऐसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिपोर्ट) की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल विधानसभा के लगभग 65 प्रतिशत विधायक आपराधिक मामलों वाले हैं, जबकि 61 प्रतिशत विधायक करोड़पति हैं। रिपोर्ट के अनुसार 294 विधायकों में से 190 विधायकों ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले घोषित किए हैं तथा लगभग 142 विधायकों पर गंभीर आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। इनमें हत्या, हत्या के प्रयास, महिलाओं के विरुद्ध अपराध और अन्य गंभीर मामले भी शामिल हैं।

यह केवल पश्चिम बंगाल की स्थिति नहीं है। संसद और देश की अनेक विधानसभाओं की स्थिति भी इससे बहुत अलग नहीं है। पिछले कुछ वर्षों के चुनावी विश्लेषण बताते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना सहित अनेक राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे जनप्रतिनिधि चुनकर आए हैं जिन पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं। लोकतंत्र के मंदिरों में अपराध और दागी छवि वाले लोगों की बढ़ती उपस्थिति आज राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। राजनीति मूलतः लोकसेवा, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्रनिर्माण का माध्यम मानी गई थी। महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, लाल बहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने राजनीति को मूल्य आधारित दिशा दी। लेकिन समय के साथ राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता का स्थान धीरे-धीरे चुनावी गणित, धनबल और प्रभावशाली समूहों ने लेना शुरू कर दिया। आज कई राजनीतिक दल उम्मीदवार चयन में योग्यता, चरित्र और जनसेवा की बजाय “जीतने की क्षमता” को प्राथमिकता देते दिखाई देते हैं। यही कारण है कि दागी छवि वाले व्यक्तियों को भी टिकट देने में संकोच नहीं किया जाता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र की राजनीति में आने के बाद अनेक मंचों से राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने संसद में और सार्वजनिक मंचों पर कई बार कहा कि राजनीति को अपराधमुक्त बनाना लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है। उन्होंने जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों के शीघ्र निपटान के लिए विशेष अदालतों की आवश्यकता पर बल दिया। किंतु चिंता का विषय यह है कि आज भी लगभग सभी राजनीतिक दलों की स्थिति समान दिखाई देती है। चुनाव जीतने की मजबूरी और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण दल अपराधी और दागी उम्मीदवारों को टिकट देने से परहेज नहीं कर पा रहे हैं। इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण है चुनावों का अत्यधिक खर्चीला होना। आज चुनाव लड़ना सामान्य व्यक्ति की क्षमता से बाहर होता जा रहा है। बड़े संसाधनों वाले और आर्थिक रूप से प्रभावशाली लोग चुनावी प्रक्रिया में अधिक सक्रिय हो रहे हैं। दूसरा कारण है बाहुबल और प्रभाव का उपयोग। कई क्षेत्रों में आज भी राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने के लिए शक्ति प्रदर्शन को महत्वपूर्ण माना जाता है। तीसरा कारण है न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति। गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों के वर्षों तक लंबित रहने के कारण आरोपी चुनाव लड़ते रहते हैं और जनप्रतिनिधि बन जाते हैं।
राजनीति में अपराधीकरण का दूसरा बड़ा पक्ष है धनबल। पश्चिम बंगाल विधानसभा के आंकड़े बताते हैं कि 61 प्रतिशत विधायक करोड़पति हैं। यह प्रवृत्ति पूरे देश में दिखाई देती है। संसद और विधानसभाओं में करोड़पति जनप्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र धीरे-धीरे सामान्य नागरिक की पहुंच से दूर होता जा रहा है? यदि राजनीति केवल धनवान और प्रभावशाली वर्गों तक सीमित हो जाएगी तो लोकतंत्र की समावेशी भावना कमजोर होगी। इन परिस्थितियों में नागरिक समाज और लोकतांत्रिक संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय मतदाता संगठन इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास कर रहा है। इसके संस्थापक रिखबचंद जैन के नेतृत्व में लंबे समय से राजनीति को स्वच्छ और अपराधमुक्त बनाने की दिशा में जनजागरण अभियान चलाए जा रहे हैं। संगठन मतदाता जागरूकता, नैतिक मतदान, स्वच्छ राजनीति और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा देने के लिए कार्य कर रहा है। लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मूल्य आधारित व्यवस्था मानते हुए यह संगठन समाज को जागरूक करने का प्रयास कर रहा है कि मतदाता केवल जाति, धर्म, क्षेत्र या दलगत निष्ठा के आधार पर नहीं, बल्कि उम्मीदवार के चरित्र और सार्वजनिक जीवन को देखकर मतदान करें। इसी प्रकार एडीआर (ऐसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिपोर्ट) जैसे संगठन भी चुनावी पारदर्शिता और जनप्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। इन संगठनों के कारण आज मतदाताओं को उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों, संपत्ति और शिक्षा संबंधी जानकारी उपलब्ध हो रही है। यह लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
राष्ट्रीय चुनाव आयोग भी इस दिशा में लगातार प्रयासरत है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के निर्देश दिए गए हैं। उम्मीदवारों को शपथपत्र में अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति और देनदारियों की जानकारी देना अनिवार्य किया गया है। चुनाव आयोग लगातार मतदाता जागरूकता अभियान चला रहा है। किंतु केवल औपचारिक प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इन प्रयासों को अधिक तीव्र, व्यापक और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। आज आवश्यकता है कि राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आंदोलन खड़ा किया जाए। इसके लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं- पहला, जिन उम्मीदवारों पर हत्या, बलात्कार, अपहरण, भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप न्यायालय द्वारा तय हो चुके हों, उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने पर गंभीर विचार होना चाहिए। दूसरा, जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों के त्वरित निपटान हेतु विशेष न्यायालयों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि वर्षों तक मुकदमे लंबित न रहें। तीसरा, राजनीतिक दलों को दागी उम्मीदवारों को टिकट देने पर जवाबदेह बनाया जाए। उन्हें सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार उपलब्ध होने के बावजूद दागी व्यक्ति को क्यों चुना गया। चौथा, चुनावी खर्च पर कठोर नियंत्रण और पारदर्शिता लाई जाए ताकि सामान्य और योग्य नागरिक भी राजनीति में प्रवेश कर सकें। पांचवां, मतदाता जागरूकता को जनांदोलन बनाया जाए। जब तक मतदाता स्वयं दागी उम्मीदवारों को अस्वीकार नहीं करेंगे, तब तक सुधार अधूरा रहेगा।
भारत आज जिस दिशा में बढ़ रहा है, वहां राजनीति की शुचिता और नैतिकता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। यदि हम 2047 तक विकसित भारत बनना चाहते हैं, यदि हमें विश्वगुरु बनना है, यदि भारत को वैश्विक नेतृत्व करना है, तो राजनीति को अपराध और धनबल के प्रभाव से मुक्त करना ही होगा। आर्थिक शक्ति, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रतिष्ठा तभी सार्थक होगी जब लोकतंत्र की आत्मा सुरक्षित रहेगी। राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्ति नहीं, समाज निर्माण होना चाहिए। लोकतंत्र केवल वोटों का गणित नहीं, बल्कि विश्वास, नैतिकता और जनप्रतिनिधित्व की पवित्र व्यवस्था है। यदि राजनीति अपराधमुक्त होगी तो शासन अधिक पारदर्शी होगा, जनता का विश्वास बढ़ेगा और राष्ट्रनिर्माण की गति भी तेज होगी।
आज आवश्यकता केवल सरकारों या चुनाव आयोग के प्रयासों की नहीं है, बल्कि समाज, मतदाता संगठनों, नागरिक संस्थाओं, मीडिया और जागरूक नागरिकों के संयुक्त अभियान की है। भारतीय मतदाता संगठन जैसे प्रयास इसी दिशा में आशा की किरण हैं। इन प्रयासों को राष्ट्रीय स्वरूप देने की जरूरत है। भारत के विकसित भविष्य की आधारशिला केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि स्वच्छ राजनीति भी है। क्योंकि अपराधमुक्त राजनीति ही विकसित भारत, समृद्ध भारत और विश्वगुरु भारत की वास्तविक पहचान बन सकती है।
 प्रेषकः


 (ललित गर्ग)
लेखक,पत्रकार एवं स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

कलमप्रिया संस्थान द्वारा प्रति वर्ष की भाति इस वर्ष भी 250 परींडे लगाने का संकल्प

जयपुर । कलमप्रिया संस्थान की मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन कमलेश चौधरी जी के भवन में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना से किया गया। कार्यक्रम का संचालन पवनेश्वरी वर्मा ने अपनी मधुर वाणी में सुंदर व व्यवस्थित तरीके से करते हुए सभी सखियों को काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया । उमा शर्मा,मंजु कपूर,मीनू अग्निहोत्री,सुमन पहाड़िया,प्रियंका पुरोहित,कमलेश चौधरी,शारदा जेटली,आशा अरोड़ा, स्नेहलता सहाय,उषा शर्मा,अंजना चड्डा, डाॅ.अंजु सक्सेना,आशा परनामी,शशि तनेजा,डाॅ कंचना सक्सेना,रितिका मदान,रेशमा खान,अलका गर्ग,शशि पाठक,शशि सक्सैना,पवनेश्वरी वर्मा आदि सखियों ने अपनी उत्कृष्ट रचनाओं का प्रभावशाली काव्यपाठ किया।

    साहित्यिक सरोकारों के साथ-साथ सामाजिक संवेदनाओं को भी कार्यक्रम में विशेष स्थान दिया गया। प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी सभी सखियों ने पक्षियों हेतु परींडे लगाने का संकल्प लिया। संस्थान की अध्यक्षा शशि सक्सैना ने सभी सदस्यों को परींडे वितरित करते हुए भीषण गर्मी में पक्षियों के लिए जल व्यवस्था सुनिश्चित करने का आग्रह किया। कलमप्रिया संस्थान द्वारा इस वर्ष भी विभिन्न स्थानों पर लगभग 250 परींडे लगाने का संकल्प लिया गया, जो संस्था की साहित्य के साथ सामाजिक संवेदनशीलता एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता और विशिष्टता का सूचक है।

गीत

जन्मों का यह प्रेम प्यार, ,प्रिय  मत करना  तुम इनकार।

ले  चल मोहन नदिया पार।पाए  जीवन का  सत सार।।

***

साथ   तेरा   सुंदर   पाकर।  तनमन वृंदावन बन जाए।।

वीराने गुमसुम जीवन  में, एक  बहार मनमोहक आए।।

पाऊं   तेरा   प्रेम   अपार, प्रिय मत करना  तुम इनकार।

***

मन  में  फूलों का  डेरा  हो।तेरी  बाहों   का  घेरा   हो।। 

प्यारे मनोहर   जीवन  में। अब से एक नया सवेरा हो।।

आपस  में  भेद न तकरार, करू तुमसे  आज  मनुहार।

***

मेरे  होठों  पर    नाम  हो।इस  मन  में तेरा  मुकाम हो।।

हो न कभी आनंद की शाम,जीवन में हरक्षण श्याम हो।।

फिर बजे मनकी मधुर सितार.,सुन ले मेरे प्रिय रखवार।

***

तुझे छूकर चंदन हो जाऊं।मैं मोहक निधिवन हो जाऊं।।

नित पाऊं तेरी  चरण रज, मैं तुझमें ही लय हो जाऊं।।।

सुन मीत मोहन यह पुकार.,मुझे भला लगे यह सत्कार।

***

तेरी  झील  सी आंखो  में, हरदम अपना रूप देखू  में।।

पा मोहक मनहर स्पर्श  प्रिए,तुझे मन  मन  मैं लेखु मैं।।

पाकर सुंदर नेह संसार, तुझे  छोड़ूं  नही  अब  करतार।

***

निश्छल  होगा प्रेम  हमारा।एक दूजे में  विलय हमारा।।

सूरज  तारा अवनी अंबर ,देखेगे अदभुत प्रणय हमारा।।

ज्यों सागर में सरिता धार. करलो जी मुझे प्रभु स्वीकार।

***
गीतकार मनोहर सिंह चौहान मधुकर

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

आइए, हम महिला-पुरुष समानता का माहौल बनाने का संकल्प लें

मार्च: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष

– बाबूलाल नागा

   8 मार्च का दिन केवल उत्सव का नहींबल्कि आत्ममंथन और संकल्प का भी है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं के संघर्षउपलब्धियों और अधिकारों की याद दिलाता है। यह दिन उन बहनों को स्मरण करने का अवसर देता है जिन्होंने समानताशिक्षासम्मान और आत्मनिर्भरता के लिए लंबा संघर्ष किया। गांव हो या शहरइस दिन महिलाएं एक-दूसरे से मिलती हैंअपने सुख-दुख साझा करती हैंसांस्कृतिक कार्यक्रम करती हैं और एक-दूसरे का हौसला बढ़ाती हैं। यह सामूहिकता ही उनकी ताकत है।

   लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि महिला दिवस की चमक अक्सर सरकारी कार्यक्रमों और औपचारिक भाषणों तक सीमित रह जाती है। देश की अनेक महिलाओं को आज भी यह नहीं पता कि महिला दिवस क्यों मनाया जाता है। वे घर-परिवार की जिम्मेदारियों में इस तरह उलझी रहती हैं कि अपने अधिकारों और अवसरों के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिलता। सवाल यह है कि जब हमारा संविधान बराबरी का अधिकार देता हैतो व्यवहार में यह बराबरी क्यों नहीं दिखती?

  


भारतीय संविधान का अनुच्छेद-14 समानता का अधिकार देता है और अनुच्छेद-15 लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। फिर भी समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाता। आज भी कई स्थानों पर महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखा जाता है। घर की आय में उनका योगदान होने के बावजूद आर्थिक नियंत्रण उनके हाथ में नहीं होता। आंकड़े बताते हैं कि भारत में केवल लगभग 24 प्रतिशत महिलाओं के हाथ में सीधे तौर पर नगद मजदूरी आती है। अधिकांश मामलों में मजदूरी पति या परिवार के अन्य पुरुष सदस्य ले लेते हैं। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को समान काम के बदले कम मजदूरी मिलना आज भी आम बात है।

   यह स्थिति केवल आर्थिक असमानता तक सीमित नहीं है। लैंगिक भेदभाव सामाजिक सोच में गहराई से बैठा हुआ है। महिलाओं को अक्सर कमजोर वर्ग” के रूप में देखा जाता है। घरेलू हिंसाकार्यस्थल पर उत्पीड़नशिक्षा से वंचित होनाबाल विवाह और दहेज जैसी कुरीतियां आज भी समाज में मौजूद हैं। कानून तो बने हैंपर उनका प्रभावी क्रियान्वयन अब भी चुनौती बना हुआ है। जब तक सामाजिक मानसिकता नहीं बदलेगीतब तक केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं होंगे।

   महिला दिवस हमें यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि क्या हम सचमुच महिलाओं को बराबरी का स्थान देने के लिए तैयार हैंक्या हमारे घरों में बेटियों को वही अवसर मिलते हैं जो बेटों को मिलते हैंक्या पंचायतनगरपालिका और संसद में महिलाओं की भागीदारी केवल आरक्षण तक सीमित रहनी चाहिए या उसे सामाजिक स्वीकृति भी मिलनी चाहिए?

   महिला-पुरुष समानता का अर्थ केवल अधिकारों की बात करना नहीं हैबल्कि व्यवहार में उसे लागू करना है। समानता का अर्थ हैशिक्षा में बराबरीरोजगार में बराबरीनिर्णय लेने में बराबरी और सम्मान में बराबरी। जब हर घर में संविधान के मूल्यों को व्यवहार में उतारा जाएगातभी महिलाओं को वास्तविक हक मिलेगा। जिस दिन परिवारसमाज और संस्थाएं संविधान की भावना को आत्मसात कर लेंगीउस दिन महिला दिवस केवल प्रतीक नहीं रहेगाबल्कि उपलब्धि का उत्सव बन जाएगा।

   आज जरूरत है सामूहिक संकल्प की। राज्य और देशभर की महिलाएं यदि एकजुट होकर हिंसाजातिधर्म और लिंग आधारित भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाएंतो परिवर्तन संभव है। महिलाओं को अपने मताधिकार की ताकत को पहचानना होगा। लोकतंत्र में वोट केवल अधिकार नहींपरिवर्तन का साधन भी है। जब महिलाएं संगठित होकर अपनी प्राथमिकताओं को राजनीति और नीतियों का हिस्सा बनाएंगीतब सरकारें भी उनकी मांगों को गंभीरता से लेंगी।

   समानता का संघर्ष पुरुषों के खिलाफ नहींबल्कि असमान सोच के खिलाफ है। समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब आधी आबादी सुरक्षितशिक्षित और आत्मनिर्भर हो। महिला-पुरुष समानता केवल महिलाओं का मुद्दा नहींबल्कि पूरे समाज की प्रगति का प्रश्न है।

   आइएइस मार्च को केवल औपचारिक कार्यक्रम तक सीमित न रखें। संकल्प लें कि अपने घर से ही समानता की शुरुआत करेंगे। बेटियों को अवसर देंगेमहिलाओं की आवाज को महत्व देंगे और हर प्रकार की हिंसा व भेदभाव के खिलाफ खड़े होंगे। एक ऐसा माहौल बनाएंगे जहां हर औरत भयमुक्त होकर सम्मान से जी सके। यही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का वास्तविक संदेश हैसमानतासम्मान और स्वतंत्रता का संकल्प। 


(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

 

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