शुक्रवार, 22 जून 2012

ये है शब्दश: बौद्धिक सरसंघचालक मोहन भागवत जी का

सिंधुपति महाराजा दाहरसेन के बलिदान दिवस पर अजमेर में महाराजा दाहरसेन स्मारक पर गत 16 जून को आयोजित विशाल श्रद्धांजलि समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने सिंध और महाराजा दाहरसेन की प्रांसगिकता पर जो बौद्धिक दिया, उसे आपकी जानकारी में लाने के लिए यहां शब्दश: दिया जा रहा है:-
परम श्रद्धेय, परम वंदनीय, संत वृंद, मंच पर उपस्थित भारतीय सिंधु सभा के सभी माननीय पदाधिकारी, कार्यकर्ता, सम्माननीय अतिथि, उपस्थित नागरिक सज्जन एवं माता भगिनी। महाराजा दाहरसेन का जमाना 13सौ वर्ष पूर्व का जमाना है। आजकल दुनिया में ऐसा कहने वाले लोग मिलते हैं कि बीती को बिसर जाओ, और जो है उसके साथ चलो, पुरानी बातें भूल जाओ। कभी कभी मेरे मन में आता है कि उनको पूछें कि आपका नाम कितने साल पुराना है, तो कोई कहता है 40 साल पूर्व रखा गया था, 50 साल पूर्व रखा गया था, 60 साल पूर्व, तो मैं कहता हूं आप तो उसको भूलते नहीं। बात बात पर अपना हस्ताक्षर उसी नाम से करते हैं। 50 साल बाद कोई आपको उसी नाम से पुकारे तो आप देखते हैं, अन्यथा नहीं देखते। तो ये बात सही है कि जमाने के साथ चलने में, कुछ बातों को बिसारना पड़ता है। लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में और मृत्यु के समय में भी याद रखनी पड़ती है। आदमी अपनी मृत्यु के क्षण में अपने सत्य स्वरूप को याद करता है तो तर जाता है। भूल जाता है जो जन्म जन्मांतर के फेर में फिर से फंस जाता है, और इसलिए मुझे जब पता चला, भारतीय सिंधु सभा के कार्यकर्ताओं ने कहा, वैसे उनका काम बहुत छोटा है, मैं यहां पर अपने व्यस्त सारे निर्धारित कार्यक्रमों में समय निकाल कर आया हूं। संघ शिक्षा वर्ग के प्रवास को संघ में कभी बदला नहीं जाता है, लेकिन मैंने अपने प्रवास को एक दिन कम करके यहां पर समय दिया है। इसका कारण क्या है, इसका कारण ये है, कि ये प्रसंग याद करने का प्रसंग है, और ऐसी बातों को याद करने का प्रसंग है, जिसे कभी भूलना नहीं चाहिए।
महाराजा दाहरसेन का बलिदान क्यों हुआ था? वैसे तो उस समय के भारत वर्ष में अलग-अलग राज्य थे। अलग-अलग राजा थे। महाराजा दाहरसेन झगड़ा करने के बजाए संधि करा लेते, तो उनका भी जीवन बच जाता था, समर के संहार से हम सब बचाव उस समय हो जाता था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, वो लड़े। ऐसे भी अपने इतिहास में उदाहरण हैं कि ऐसी संधि लोगों ने की है। सिकंदर के सामने पौरस लड़ा, लेकिन आंभी ने उसके साथ संधि कर दी। हम पौरस को याद करते हैं और आंभी के प्रकरण को भूल जाना चाहते हैं। कोई हमारे इतिहास में आंभी का उल्लेख करता है तो हमको अच्छा नहीं लगता, पौरस की कथा बताए तो हमारा सीना अभिमान से फूल जाता है। ऐसा क्यों है? क्योंकि अभी सभी संतों ने, जिस मानवता का, जिस धर्म का उल्लेख किया, अपने जीवन के आचरण के नियम की दृष्टि से, उसके लिए भारतवर्ष खड़ा है, और लड़ाई से मुसलमान और हिंदुओं के बीच में नहीं थी, या दो राजाओं के बीच में नहीं थी। ये भूमि की लड़ाई नहीं थी। ये तो मूल्यों की लड़ाई थी। भारत वर्ष मानता है सारी दुनिया अपनी है, सारी दुनिया अपना परिवार है, वसुधैव कुटुंबकम। भारत के बाहर के लोग ऐसा नहीं मानते। आज भी दुनिया को एक करने की बात को लेकर भारत के बाहर के लोग चलते हैं। तब वो कहते हैं कि सारी दुनिया को बाजार बनाएंगे। याने सबका आचरण बाजारू आचरण हो जाएगा। ईमान को भी खरीद सकेंगे, ऐसी दुनिया बन जाएगी। भारत वर्ष को ये मंजूर नहीं है, वो ये नहीं कहता सारी दुनिया को एक बाजार बनाकर एक करें। वो कहता है सारी दुनिया को एक परिवार के आत्मीयता के सूत्र में बांधेंगे। वसुधैव कुटुंबकम, ऐसा एक विश्व खड़ा करेंगे। और जहां परिवार है, वहां अलग-अलग होने के बाद भी एकता होती है। एक परिवार में 7 भाई हैं, सबके स्वभाव अलग हैं। सबका अपना अपना परिवार है। सबके अपने-अपने बाल बच्चे हैं। सबका अपना-अपना कारोबार है, लेकिन सब मानते हैं कि ये सब सबका है। ये सब मेरा ही है। और मेरा जो है, वो हम सबका है। उसमें विविधता में एकता रहती है। दुनिया इस एकता को देख नहीं पाती, क्योंकि उसको इन सब बातों को विविधताओं को जोडऩे वाला जो सूत्र है, वो केवल भारतीयों के पास है। भारतीय संतों ने उसको अभी तक सुरक्षित रखा है।
भारत में ये व्यवस्था है कि वो सत्य के साथ साक्षात होकर समाज में आम लोगों में रह कर आम लोगों के जीवन में उस सत्य को उतारने वाले संतों की पंरपरा अभी भी चल रही है। और भारत का यही काम है, सारी दुनिया जब भटक जाती है, भूल जाती है, तो याद दिलाना अपने जीवन से सिखाना, ये भारत को करना होगा। उस भारत की इस भारतीयता को, हिंदुत्व को, सनातनत्व को, नष्ट करने के लिए आक्रमण था। एक नई बात लेकर लोग आए थे कि हम ही सही है, बाकी सब गलत हैं। सबको सही होना है तो हमारे ही रास्ते पर आना पड़ेगा। हम कहते हैं ऐसा नहीं है भई अपने-अपने रास्ते से चलो। मिलजुल कर रहो किसी को दुख मत पहुंचाओ, अहिंसक बनकर रहो, किसी को बदलने की कोशिश मत करो, जो बदल चाहिए वो अपने आप में करो। अच्छा है तो वो सारी दुनिया अपने आप बदल लेगी। इस तरीके से चलो ये उपदेश करने वाले हम और नहीं सारी दुनिया केा एक रंग में रंग देंगे बाकी सबको नष्ट करेंगे। हमारी ही चलेगी, हमारे ही जैसा रहना पड़ेगा, ऐसा मानने वालों की लड़ाई थी। इसलिए राजा दाहर ने ये विचार नहीं किया कि ये मेरे राज्य पर आक्रमण है। उसने ये विचार किया यह हमारी जीवन पद्धति पर आक्रमण है। ये मानवता पर आक्रमण है। ये सनातन धर्म पर आक्रमण है। ये हिंदुत्व पर आक्रमण है। उन्होंने ऐसा विचार किया, मुझे सपने में आकर बताया, ऐसा नहीं। ये विचार केवल पुस्तकों में नहीं था। ये विचार केवल भाषणों में नहीं था। ये विचार राजा दाहर जैसे राजाओं के जीवन में था। राज्य करने की पद्धति में था।
आज तो उनकी पुण्यतिथि है, इसलिए उनके बलिदान का स्मरण विशेष रूप से हो रहा है, और होना भी चाहिए, लेकिन जो जीवन उन्होंने अपने देश, धर्म, संस्कृति की रक्षा के लिए दांव पर लगाया, वो जीवन उसी देश, धर्म, संस्कृति के उदाहरण का प्रत्यक्ष प्रतीक था। उन्होंने कैसा राज्य चलाया? उन्होंने धर्म का आचरण कैसे किया, लेागों के और स्वयं के धर्म को बचाकर कैसे चले? लेागों में और स्वयं के जीवन में उस धर्म को बढ़ाकर कैसे चले? ऐसे ये सारे राजा थे। और इसलिए उस धर्म के मूल में जो तत्व है जिसको कोई ईश्वर कहता है, काई जड़ मानता है, कोई चेतन मानता है, कोई आत्मा कहता है, काई नहीं कहता है। कोई शून्य कहता है। उस तत्व को साक्षात करने वाले के मार्गदर्शन में ये राजा चलते थे। इसलिए उनके साथ संतों के रुचियों के नाम अपरिहार्य रूप से आते हैं। इसको हम धर्मराज्य कहते हैं। धर्मराज्य यानि किसी पोथी के नियमों को मानकर चलना नहीं है। धर्मराज्य याने जिन्होंने उस तत्व को अपने जीवन में साक्षात किया है। और अपने जीवन से लेागों को सिखा रहे हैं। उनकी राय को सुनकर चलना। उस मानवता को मानकर चलना है। उन्नति सबकी करनी है, एक की नहीं है, एक के साथ सबकी, सबके साथ एक की। इस प्रकार विकास करना है। ये मानकर चलना है। ऐसा राजा दाहर का राज्य भी धर्मराज्य था और राजा दाहर का अपना जीवन भी हिंदु गृहस्थ के धर्माचरण का उदाहरण है। और जब ये बारी आई के अब उस जीवन को फेंक देना पड़ेगा रण मैदान में। उस वैभव को उस परिवार के सुख को मिट्टी में मिला देना पड़ेगा, तभी देश की रक्षा होगी। मेरे मरने से ही लोग जीने की प्रेरणा लेंगे। ये जब उन्होंने जाना तो इस नश्वर संसार के उस माया के खेल को उन्होंने उतना ही नश्वर मानकर अपने तलवार की नोंक पर लटका कर फेंक दिया। हिंदू ऐसे जीता है, जब जीता है। तब जीने में रस लेकर ऐसे जीता है कि लोग कहें कि जियो तो ऐसे जियो, और जब उस माया के खेल को अंतिम सत्य के लिए दांव पर लगा कर फेंकने की बारी है तो ऐसे फेंकता है कि जुआरी जुए का पासा भी फेंकने में थोड़ा हिचकिचाएगा। हिंदु अपने जीवन को फेंकने में हिचकिचाएगा नहीं। ये हिंदु जीवन का आदर्श बचाने के लिए राजा दाहर का बलिदान हुआ। और इसलिए राजा दाहर उनकी भूमि, उनकी प्रजा ये कौन है? ये सब भारत के हैं।
आज हम लोग सिंध की उस भूमि पर नहीं हैं। भारत अखंड नहीं है लेकिन भारत है। सिंध की भूमि पर आज भी सिंधी हिंदू रहते हैं। अधिकांश लोगों को इधर आना पड़ा है। लेकिन जैसे तैसे अपने को बचाकर वहां सिंधी अपने आप को कहते हुए, और हिंदू अपने आप को कहते हुए एक व्यक्ति जब तक जीवित है, तब तक वहां भी भारत जीवित है। और इसलिए मैं कहता हूं कि अखंड भारत है। भारत अखंड नहीं है, लेकिन अखंड भारत है। हम भारत को अखंड बनाएंगे। तो अखंड भारत दुनिया के वैभव को ज्ञयान की बुलंदी पर चढ़ कर सारी दुनिया को सुख शांति का रास्ता देने में समथ्य होगा, क्योंकि आखिर मैं संघ का कार्यकर्ता हूं। संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित करता हूं। तो छोटे सम्मेलनों में हम नहीं जाते। भाषाओं के, जातिपंथ विशेष के ऐसे सम्मेलनों में जाने के हमको रुचि नहीं रहती। लेकिन यहां मैं आया हूं, क्यों आया हूं, ये बताने के लिए आया हूं। जैसे बांग्लादेश के हिंदुओं की समस्या संपूर्ण हिंदू समाज की संपूर्ण भारत वर्ष की समस्या है। जैसे कश्मीर की समस्या, कश्मीरी पंडितों की समस्या संपूर्ण भारत की समस्या है, वैसे सिंध के हिंदुओं की समस्या चाहे वो यहां हो या वहां हो, वो संपूर्ण भारत की समग्र हिंदु समाज की समस्या है। ये हिंदू समाज के और भारत के विभाजन के कारण पैदा हुए। ये हिंदू समाज के और भारत के एकीकरण की समस्या है। और उसके वैभव संपन्नता को प्राप्त करने के मार्ग में आने वाली बाधाओं की समस्या है।
हमारे सिंधी भाई अगर राजा दाहर को स्मरण करते हैं, सिंधी भाषा को बचाने का प्रयास करते हैं, सिंधी की भूमि पर फिर से हम बस जाएं, उसी तरह स्वतंत्र होकर अगर बस जाएं, ऐसा प्रयत्न करते हैं तो वो सिंधी भाइयों के हित का प्रयत्न नहीं है, वो भारत के हित का प्रयत्न है। हम सब सिंधी भाषी को लोगों को भी और भारत वर्ष के बाकी सब लोगों को भी इसको समझना चाहिए। ये सूत्र नहीं छूटना चाहिए। भारत की हर भाषा, भारतीय भाषा। भारत की हर भाषा मेरी मातृभाषा है, अगर मैं वहां रहता हूं।
हमारे संघ में परिचय चलता है। हर बार परिचय होता है। परिचित लोगों का भी फिर से परिचय होता है। तो परिचय में कभी कभी लोग बोलते हैं, जैसा रिवाज है, मूलत: मैं यहां का रहने वाला हूं, मूलत: मैं वहां का रहने वाला हूं मैं कहता हूं भई मूलत: तुम कहां के रहने वाले हो, मूलत: तो तुम भारत के रहने वाले हो। भारत का कोई व्यक्ति कहां जाएगा, वो भारत में कहीं भी जा सकता है। सिंध से उजड़ा गया तो कहां गया। हम अमरीका में नहीं गए, हम भारत की ओर, कुछ लोग गए, बाहर भी गए, लेकिन वहां जाने के बाद भी आने की चाह इधर ही रखते हैं और अधिकांश लोग तो इधर चले आए क्यों क्योंकि ये स्वाभाविक बात है।
सारा भारत मेरा घर है तो मूलत: भारत क्या है? लेकिन भारत क्या है? भारत एक भाषा नहीं है, भारत एक प्रांत नहीं है, भारत एक पंथ संप्रदाय नहीं है। सब पंथ संप्रदाय है, सब भाषा भाषी, सब प्रांत मिलकर भारत बनता है। भारत के वो अभिन्न जैसे पानी और पानी की बूंद अलग नहीं हो सकते। बूंद अलग हो गई बूंद सूख जाएगी पानी रहेगा। लेागों बूंदों का पानी नहीं कहेगे। पानी की बूंदें कहेंगे। पानी में बूंदें हैं। दिखती नहीं अलग लेकिन निकाल सकते हैं। निकालने के बाद उनका अस्तित्व नहीं रहता। मिलकर रहती हैं बूंदों से ही पानी बनता है। घड़े को भरना है तो बूंद बूंद से ही भरना पड़ता है। बूंद और पानी अलग नहीं हैं। आप बूंद को नकार के पानी को नहीं बना सकते। पानी को नकर के बूंद को जीवंत नहीं रख सकते। और इसलिए भारत वर्ष से कोई बूंद छिटक जाए, बिखर कर जाए, अलग हो जाए, भारत वर्ष अधूरा है। एक बूंद पानी कम हो जाएगा। वो कभी भी पूरा पानी नहीं कहलाएगा। एक बूंद कम पानी ही कहलाएगा। और इसलिए भारत को अखंड होना आवश्यक है। और ये अपरिहार्य भी है अनिवार्य भी ये होना ही है। क्यों, क्योंकि ये नहीं रहा तो दुनिया नहीं बचेगी। दुनिया चल पड़ी गलत राह पर, सुख के पीछे। और सुख के इतने सारे प्रयोग 2000 वर्षों में कर लिए लेकिन दुनिया को सुख नहीं मिल रहा है। इसलिए सारी दुनिया के समझदार लोग अब भारत वर्ष की ओर देख रहे हैं, कि भारत वर्ष खड़ा हो। लेकिन लंगड़ा लूला आदमी खड़ा नहीं हो सकता। दुर्बल आदमी खड़ा नहीं हो सकता। बीमार आदमी खड़ा नहीं हो सकता। वैसे बीमार देश, लंगड़ा लूला देश, दुर्बल देश खड़ा नहीं हो सकता। और इसलिए पूर्ण अंग बनकर अपने समस्त अंगों को फिर से जोड़कर भारत को खड़ा होना पड़ेगा। इस दृष्टि से आप यहां जो प्रयास कर रहे हो वो बहुत महत्वपूर्ण प्रयास है। आखिर भारत की हर भाषा भारत के स्वत्व तक पहुंचाती है। मूल एकता तक पहुंचाती है। भारत का हर प्रांत, भारत का हर पंथ संप्रदाय, भारत की हर जाति अपने में से भारत के मूल को पहुंचाती है। हर एक का सबल होना और सबल होते समय हम एक पूर्ण के घटक हैं। इसका भान रखना भारत की सबलता में मदद करना है। अब अपने स्वत्व की पहचान कर रहे हैं। आप अपनी मातृ भाषा का उद्धार करना चाहते हैं, करना हि चाहिए क्योंकि बिना मातृ भाषा के आदमी माता का पुत्र नहीं बन सकता। भाषा के साथ भाव आता है। हम चाहे जितनी अच्छी अंग्रेजी बोल लेंगे। हमारे भाव जगत को हम व्यक्त नहीं कर सकते। अंग्रेजी भाषा में हमारे कई भावों के लिए शब्द नहीं हैं। जैसे अंग्रेजी के कई भावों के लिए हमारे यहां शब्द नहीं हैं। हमारे मूल्यों और जीवन के जिन मूल्यों में से अंग्रेजी भाषा आई है, वो मूल्य अलग अलग हैं, इसलिए कई बातें वहां हो नहीं सकती। जो हमारे यहां होती है। जो हमारे यहां हो नहीं सकती, वहां जो होती है। कोई महिला अगर वहां जाएगी तो लोग उसकी सुंदरता की प्रशंसा करेंगे, सार्वजनिक रूप से, सबके सामने, उसके भी सामने। आंखें कितनी सुंदर हैं, बदन कितना कोमल है, कपड़े कितने अच्छे फबते हैं, ऐसा कहेंगे। तो वो महिला गुस्सा नहीं होगी, लोग भी गुस्सा नहीं होंगे, महिला उल्टा लेागों को धन्यवाद देगी, थैंक यू कहेगी। हमारे यहां महिला की अनुपस्थिति में भी चार सभ्य लेागों में ऐसी चर्चा कोई करे तो लोग जूता मारेंगे। चार लोगों में पति भी अपनी पत्नी को बच्चे की मां के नाम से पुकारता है। रामू की मां को बुलाओ ऐसा कहता है। वो चार लोगों में भी अपनी पत्नी को पत्नी नहीं कहता, क्योंकि हमारी धारणा है कि समस्त महिला वर्ग मातृ वर्ग है। हम महिलाओं में माता को देखते हैं। वहां महिलाओं को एक भोग की वस्तु मानते हैं, जिसके सिवाए जीवन का उपभोग पूर्ण नहीं होता, ऐसा एक अनिवार्य साथी है, इतना ही मानते हैं। हम ये नहीं मानते हम ये मानते हैं ये जगत जननी जगदम्बा का रूप है। इसलिए कुमारी पूजन होता है। कुंवारी कन्याओं को तो चरण स्पर्श भी नहीं करते देते। लोग उनका चरण स्पर्श करते हैं। ऐसे रिवाज अपने यहां पर हैं, अब ये मूल्यों का अंतर है। इसको भाषा में कहना है तो अंग्रेजी भाषा में व्यक्त नहीं कर सकते। उसके लिए हमारी ही भाषा चाहिए। हमारे भाव का विकास अगर करना हो तो हमारी मातृ भाषा को जीवित रहना चाहिए। आप यहां पर बुजुर्ग लोग बैठे हैं, उनको मुझे ये उपदेश करने की आवश्यकता नहीं। आप सिंधी भाषा को अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन अपने घर में ध्यान दीजिए, नई पीढ़ी उसको भूल रही है। भूलना नहीं है, आने वाली नई पीढ़ी अपने मूल निवास स्थान को नहीं भूले। अपने पूर्वजों को न भूले। अपनी भाषा को नहीं भूले। राष्ट्र इसी में से जीवित रहता है। और सिंधी भाषा की स्मृति, सिंधी भाषा का ज्ञान, सिंध की स्मृति और सिंध के महापुरुषों का इतिहास, ये भारतीय भाषा का ज्ञान है। भारतीय पूर्वजों का इतिहास है, भारत के भूभाग की स्मृति है। उसको भूल जाऊंगा, तो मैं अपने कंधों को भूल जाऊंगा। मैं मेरे पैर की चिंता करना भूल गया, बाकी सब अच्छा हूं और चल रहा रहा हूं। और पैरों को टेढ़ा मेढ़ा डाल दिया, तो पैर मोच खाता है और मेरे शरीर को बैठ जाना पड़ता है। बिस्तर में लेटना पड़ता है। दो तीन दिन चलने फिरने लायक नहीं रहता हूं। जब तक वो ठीक नहीं हेाता, तब तक मेरा चलना फिरना बंद हो गया। तो सभी को याद रखना है और हमको तो विशेष रूप से याद रखना है क्योंकि हमको सीधी वो विरासत मिली है। उस विरासत को याद रखना क्योंकि आज दुनिया में फिर से वो ही लड़ाई है। सारे दुनिया के मानव उसी लड़ाई को लड़ रहे हैं और उनको कोई सेनापति दूसरा मिलेगा नहीं भारत के सिवा। भारत को सेनापति बनकर खड़ा होना है।
सारी दुनिया में कट्टरपन और उदारता की लड़ाई चल रही है। दुनिया की जो लड़ाइयां चल रही हैं, वो कट्टरपन और उदारता की लड़ाई चल रही हैं। कपट और सरल धर्मयुद्ध की लड़ाई चल रही है। धर्मयोद्धा की और कपट योद्धा की लड़ाई चल रही है। सारी दुनिया में चल रही है। सारी दुनिया में एकांतिक कट्टरपन की दृष्टि और सबको साथ लेकर चलने वाली एक के साथ सबका और सबके साथ एक का विकास साधने वाली दृष्टि। उसकी लड़ाई चल रही है। सारी दुनिया में सब देशों के लोग लड़ रहे हैं, लेकिन उनको रास्ता दिखाने वाला, व्यूह रचना समझाने वाला, अपने युद्ध को जीतने के लिए अपनी कला कैसे हो ये समझाने वाला सेनापति नहीं है। सेनापति देने का काम भारत वर्ष का है। तो भारत वर्ष को खड़ा होना पड़ेगा। और भारत वर्ष बिना अपनी सब भाषाओं के बिना, अपने सब प्रांतों के लेागों के बिना, अपने सब प्रातों के भूभाग के खड़ा नहीं हो सकता। और इसलिए आज भारत अखंड नहीं है। लेकिन अखंड भारत है। वहां के हिंदुओं के हृदय में और हमारे हृदय में सुरिक्षत है। उसको इतना बलवान बनाना है कि अपने भौतिक रूप को भी भूमि सहित लेकर वो वैभव संपन्न, शक्ति संपन्न, समरस बनकर खड़ा हो।
हमको सत्य को प्रकट करना है। हमको और कुछ नहीं करना है। सत्य के पीछे हमारे जीवन की ताकत खड़ी रहेगी तो सत्य की विजय निश्चित है। सत्य कभी मरता नहीं। सत्य की जीवंत रहने की ताकत है। सत्य अमर है क्योंकि सत्य ईश्वर का अंश है। ईश्वर ही सत्य है, सत्य ही ईश्वर है। लेकिन उसको साकार रूप में दुनिया में सबल होकर खड़ा रहने की उसको शक्ति चाहिए। और शक्ति उसका आचरण करने वाले मनुष्यों की शक्ति होती है। वो हम लेाग मुनष्य है। संपूर्ण हिंदु समाज है। अपने सब भाषा भाषी लोगों के साथ वो हिंदू समाज खड़ा है। अपनी विरासत को ध्यान में रखे, अपनी विरासत के जीवन को आज के अपने जीवन से फिर से जीवित करे। अपने भूमि का प्रकट करे। अपनी भूमि पर खड़ा हो। ये हो जाए तो सारी दुनिया को सुख शांति देने वाला एक सेनापति मिल जाएगा। सारी दुनिया का जीवन सुंदर हो जाएगा। सारी दुनिया का जीवन अखंड हो जाएगा। मानवता सारी एक कुटुंब के रूप में आचरण करते हुए परमात्मा की ओर कदम बढ़ाएगी। यही बात अपने संत कहते हैं। अपने संतों की इच्छा सीमित नहीं रहती है, एक भूभाग की नहीं रहती है, देश के लिए नहीं रहती है। वो कहता है संपूर्ण विश्व सुखी होना चाहिए। सर्वे तु सुखि न संतु सर्वे संतु निरामया सर्वे भद्राणी पश्चंतु मा काश्चित दुख भाग भवेद। किसी को दुख न हो, सबको अच्छा ही देखने को मिले। द्यो: शांति, अंतरिक्ष शांति, पृथ्वी शांति, शांति भी शांत हो जाए। सारे विश्व के मंगल की कामना करने वाले ऋषि मुनियों के हम वंशज हैं। उनकी विरासत को अपने जीवन में उतार कर चलना है, ऐसा चलने में संघर्ष अपरिहार्य है। भगवान सबकी परीक्षा लेता है। हमारी भी ले रहा है और लेते रहेगा। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए पेपर को कैसे देना चाहिए, उत्तर कैसे लिखना चाहिए, राजा दाहरसेन जैसे हमारे महापुरुषों ने अपने जीवन से बताया है, उसको भूलना नहीं। ये जीवन हमको सिखाया अपने भूमि में। आप कल्पना कीजिए दुनिया में हमको जीना है, और अगर भूमि मिली है अरबस्तान जैसी और अगर भूमि कुछ नहीं दे रही तो हमारे सामने क्या चारा रहता? हम भी रेगिस्तान से आने जाने वाले व्यापारी काफिलों की सेवा करते, छोटे छोटे काम ईमानदारी से, सस्ते में ज्यादा समय लगाकर प्रामाणिकता से करते, क्योंकि वो कोई परमानेंट नौकरी नहीं है। आज का काम कल फिर से मिलना चाहिए। और ये नहीं करते बनता अहंकार प्रचंड है तो हाथ में तलवार लेकर उनका लूटते, हम लुटारू होते तो हमको भी लूटने वाले पैदा होते, तो हमको सदा तैयार रहना पड़ता। ऐसे ही हमारा स्वभाव बनता। हमारा स्वभाव ऐसा नहीं बना, क्यों नहीं बना? हिमायल की दोनों भुजाओं में सागर पर्यन्त फैली यह हमारी भारत भूमि विविधता से भरी हुई है। सब कुछ देती है, सबको देती है, सबके लिए पर्याप्त है। लड़ाई झगड़े करने की जरूरत नहीं है अपनी मेहतन करो, अपनी भूमि में। खूब कमाओ, खूब खाओ, सबको देते जाओ। बाहर से आए दो चार लोग तो हम पूछते नहीं तुम्हारी भाषा क्या है, तुम्हारा पंथ संप्रदाय क्या है? क्योंकि हमको विविध पंथ संप्रदायों में जीने की आदत है। विविध भाषाओं के बोलने वाले हम सब लोग एक कुटुंब के नाते इकट्ठा रह सकते हैं। ये हमारी आदत है। हम उनको भी नहीं पूछते, आओ बसो, तुम भी बसो, तुम भी खाओ। हमको मतांतरण करने की जरूरत नहीं है। सारी दुनिया मिलकर कैसे चल सकती है, इसका नमूना हमारा जीवन है, हमारे जीवन की विरासत है। क्यों, क्योंकि हमारी भूमि ऐसी है। उस मातृ भूमि को नहीं भूलना, उसके बिना हमारा धर्म संस्कृति भी नहीं है क्योंकि उसी ने हमको इस दिशा में भेजा। उसी ने हमको कहा कि बिना लड़ाई झगड़े के अगर जीवन चलता है तो क्यों खतरे में पड़ते हो? क्यों अपने मन को खराब करते हो कटुभावनाओं से। सत्य पर चलो, अहिंसा पर चलो, प्रेम से रहो, मिलजुलकर चलो, ऐसा करते करते हमने सारी दुनिया के मूल को, ईश्वर को साक्षात कर लिया। उस भूमि का प्रताप है। वो जगत जननी माता हमारा पोषण केवल देह का नहीं करती, हमारे मंद बुद्धि स्वभाव को भी उसी ने हमको दिया है। इसलिए हम भारत माता कहते हैं। उस भूमि को भूलना नहीं, उसका एक अंग उधर है आज। अपने बाजुओं के पुरुषार्थ पर कल उसको वापस लाएंगे। जैसा वापस ला सकते हैं, वापस लाएंगे। प्रेम से आ सकता है प्रेम से आएगा, नहीं संघर्ष करना पड़ेगा, संघर्ष करेंगे, लेकिन पहले हम तैयार तो हो जाएं। हम याद तो रखें, क्या क्या हमारा था। हम याद तो रखें कि हमारा जो था उसको हमारा ही रखने के लिए हमारे महापुरुषों ने कैसा-कैसा इतिहास रचा है। कैसे-कैसे बलिदान दिए हैं। नई पीढ़ी में ये ज्ञयान संक्रमित करना बहुत आवश्यक है। क्योंकि ये संघर्ष एक दो वर्षों का नहीं है। ये हजार वर्षों से चल रहा है। और आज मुझे लगता है, मेरा अपना हिसाब है, वो गलत भी हो सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि और 50-60 साल चलेगा। उसमें विजयी होना है, तो और आगे की दो-तीन पीढिय़ां इसी भावना से इस संघर्ष को करे। अपना जीवन जले। अपना जीवन जलाए। भारत वर्ष के जीवन में आज एक क्षरण नजर में आ रहा है। बाकी कोई खतरा हमारे लिए नहीं है। बाकी खतरे तो हमारे यहां हजार वर्षों से नाच रहे हैं। हमने उनको अपने इतिहास में और वर्तमान में दस-दस बार पछाड़ा है, और हमको समाप्त नहीं कर सकते, लेकिन जिस कारण हजार वर्ष के संघर्ष के बाद भी वो नाच रहे हैं, वो हमारी अपनी दुर्बलता है। वो दुर्बलता को दूर हटाना है। हमारी अपनी कमियों को दूर करना है। और हमारी अपनी कमियों को तभी दूर कर सकेंगे, जब हमारी कुलकीर्ति का ज्ञान हमको होगा। अपने पूर्वजों का ज्ञान हमको होगा। राजा जन्मेजय के सर्प यज्ञ में हिंसा हो रही थी, उस हिंसा को रोकने के लिए ऋषि आए उन्होंने उसको बंद करवाया और राजा जन्मेजय के यहां कथा करवाई। उस कथा में क्या बताया? राजा जन्मेजय के पूर्वजों की कथा पांडवों, कौरवों की कथा बताई। धर्म आचरण पर कैसे दृढ़ रहना उसके लिए संघर्ष कैसे करना फिर भी मन में अहिंसा प्रेम को ही कैसे पालना, कटुता कैसे नहीं आने देना ये बताया। राजा रामचंद्र को वनवास के दिनों में ऋषियों ने कहानियां बता बताकर रघुवंश की महत्ता बताई। हनुमान जी का बल जागृत करने में, हनुमान जी को जामवंत जी ने उन्हीं की कथा सुनाई। उन्हीं के पूर्व पराक्रम का ज्ञान दिया। हमको भी अपना पूर्व इतिहास याद करना है। अपने महापुरूषों को याद करना है। उनके जीवन को याद करके अपने जीवन में उतारना है। नई पीढ़ी में उतारना है। इस भावना को और इस संघर्ष को आगे बढ़ाते-बढ़ाते सारी दुनिया के सुख शांति के लिए, आज हमारी दुश्मन बनकर जो शक्तियां खड़ी हैं, उनकी भी भलाई के लिए, उसको यशस्वी करना है। इस दृष्टि से आपका यह प्रयास उस प्रयास में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान देने वाला प्रयास है। और इसलिए मैंने भारतीय सिंधु सभा के कार्यकर्ताओं ने एक-दो बार कहने पर अपेन कार्यक्रम को एक दिन कम करके यहां आना मान लिया। यहां आने पर जब मैंने देखा कि यहां सब सारे संत वृंद विद्यमान हैं तो मुझे लगा कि मैं यहां नहीं आता तो भी चलता, क्योंकि जो मुझ कहना है उसकी याद उन्होंने आपको दूसरे शब्दों में अभी मेरे सामने दी है। उनके इस संदेश को हृदयंगम कीजिए। अपने स्मृति को पूर्ण साबुत रखिए। आपने आरचण को उस स्मृति के अनुसार गढि़ए। और अपने नई पीढिय़ों को उस स्मृति के संस्कारों में पालिए। अपने देश के, दुनिया के और अपने स्वयं के उद्धार का यही मार्ग है। भूलना नहीं है इसलिए इस स्मारक पर हम आए हैं। स्मरण हमको करना है, याद दिलाने का काम स्मारक कर रहा है, बहुत अच्छी तरह बना है। सारा इतिहास यहां पर है, एक बार देख लेंगे तो तरोताजा हो जाएगा। लेकिन उस इतिहास को अपने हृदय में कायम रखकर नया इतिहास रचने के लिए उन ऐतिहासिक महापुरुषों जैसी जीवन की प्रखरता को तेजस्विता को उत्पन्न करना अपने हाथ में है। उसको उत्पन्न करने का और नई पीढिय़ों में भी उसका संस्कार डालने का संकल्प लेकर हम यहां से जाएं। संतों के आदेश को सिरोधार्य करके उसका पालन करें इतना एक और आपके प्रति अनुरोध करता हुआ, आपका धन्यवाद करता हुआ, संतों को नमन करता हुआ मैं अपने चार शब्द सामाप्त करता हूं।

-कंवल प्रकाश किशनानी
9829070059
599/9, राजेन्द्रपुरा हाथीभाटा, अजमेर

रब वसदा उस घर जिस घर होवे इक निक्की जई कुड़ी

रब वसदा उस घर
जिस घर विच होवे
इक निक्की जई कुड़ी
जेड़े वेले वेखो
खेडदी कुडदी
खिलदी खिलाँदी
रोन्दी पर रोण नीँ डेन्दी
वडे वडाँ वास्ते
तकलीफाँ दूर करण लई
इक इ दवा दी पुड़ी
इक निक्की जई कुड़ी
जेठ विच जदोँ तपदी दुपैरी
झल झल पखा
थक जान्दी दादी
राणी जगदी
सोन्दी बान्दी
वेड़े विच खेडदी
नचदी टपदी
बण आन्दी ठँडी हवा
दे जान्दी निन्दर दा झोँका
इक निक्की जई कुड़ी
निक्के काके दी हँसी
पापे दी खुशी
माँ दी लाड़ली
भरावाँ दी अखाँ दा तारा
बुआ लई गुड्डे दी गुड्डी
इक निक्की जई कुड़ी
ताँ ई ताँ केन्देन साडे बाबा
रब वसदा उस घर
जिस घर विच होवे
इक निक्की जई कुड़ी
-मोहन थानवी

सीमा की सुरक्षा के लिए शहीद हो गए महाराजा दाहरसेन

विशाल भारत की विशाल सीमाओं पर समय-समय पर घुसपैठ व अतिक्रमण होते-होते अब खंडित भारत का नक्शा हमारे सामने है। कितना संकुचित छोटा भारत जा कर बचा है। भारत की उत्तर-पश्चिम सीमा से प्राचीन समय से आक्रमण होते आए हैं। सिंध प्रांत पर खैबर से आक्रमण होते थे। इस कारण कहावत बन गई कि सिंधुड़ी सिंधुड़ी आप को खैबर से खतरा। 
327 वर्ष ईस्वी पूर्व अत्याचारी सिकंदर बादशाह ने अचानक सिंध पर आक्रमण किया। बादशाह सिकंदर बड़ा बलशाली था। उसकी सेना भी अन्य देशों को रौंधती सिंध प्रांत होते हुए सोने की चिडिय़ा भारत को निगलना चाहती थी। लेकिन सीमा पर सिंध और पंजाब की सेनाओं ने इनका कड़ा मुकाबला किया। सिकंदर को घायल कर दिया। अंत में उसने सीमा पर ही प्राण त्याग दिए।
सिकंदर के बाद 163 वर्ष ईस्वी पूर्व मगध, गुजरात, काठियावाड़, पंजाब, मथुरा, सिंध आदि पर मनिन्दर का आक्रमण हुआ। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार मनिन्दर के बाद सात यवन बादशाहों के आक्रमण हुए। उन सब को सिंध के प्राचीन महाराजाओं ने मौत के घाट उतार दिया। इन यवन राजाओं के अलावा तुषार (शक) जाति के राजाओं ने भी आक्रमण किया। संस्कृत ग्रन्थों में इन्हें तुषार, निशक और देवपुत्र के नाम से संबोधित किया गया है। उस समय हिंदुओं की पाचन क्रिया प्रबल थी। उन्होंने इन सब को परास्त कर आत्मसात कर लिया। 
सिंध पर अरबों के आक्रमणसे लगभग डेढ़ सदी पूर्व रायदेवल नामक एक हिंदू राजा सिंध पर राज करता था। उसके बाद राय सहरास पहला, राय सहरास दूसरा सिंहासन पर बैठे। राय घराने के उन राजाओं ने कुल 137 साल तक राज्य किया। चच, राय सहिरास दूसरे के मंत्री थे। राजा के मरने के बाद चच ने उनकी विधवा रानी संहदी से विवाह किया और सन् 622 ईस्वी में सिंहासन पर बैठे। राजा चच ने अपने छोटे भाई चंद को प्रधानमंत्री बनाया और स्वयं अपने राज्य की निगरानी करने और भारी सेना साथ लेकर राज्य की सीमाएं बढ़ाने निकल पड़े। थोड़े समय बाद राजा चच मकरान की ओर बढ़े। इस प्रांत पर भी अपना झंडा फहराया। सिंध पर राजा चच का राज्य सन् 671 ईस्वी तक बड़े न्याय, ठाठ और शांति से चला।
दाहरसेन ने बारह वर्ष की अल्पायु में बागडोर संभाली। उनकी तरुणावस्था होने तक उनके चाचा इन्द्र राज्य की व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने में सहयोग दे रहे थे, किन्तु ऐसा अधिक समय तक नहीं हो सका। दाहरसेन के सिंहासनारूढ़ होने के छह वर्ष बाद ही इन्द्र की मृत्यु हो गई। तब मात्र 18 साल की आयु में ही राज्य के संचालन की सम्पूर्ण जिम्मेदारी दाहरसेन पर आ गई।
सिंधुपति महाराजा दाहरसेन ग्रीष्मकाल का समय रावर नामक स्थान पर व्यतीत किया करते थे और सर्दी में ब्राह्मणवाद और बसंत ऋतु में अलोर (अरोद्रा) में बिताते थे। पांचवीं सदी से पहले अरब देशों की ओर से हिन्दुस्तान एवं सीमावर्ती प्रांत सिंध पर आक्रमण शुरू हो गए थे। उन दिनों आक्रमणकारियो को बार-बार मुंह की खानी पड़ती थी और जान से हाथ धोना पड़ता था। अंत में 710 ई. में अरब के खलीफा ने अपने नौजवान भतीजे व नाती इमाम अल्दीन मोहम्मद बिन कासिम को सिंध पर आक्रमण के लिए भारी सेना के भेजा। यह सेना कुछ समुद्री मार्ग से और कुछ मकरान के रास्ते सिंध की ओर बढ़ी। अंत में मोहम्मद बिन कासिम का भारी लश्कर 711 ईस्वी में मुहर्रम माह की दसवीं तारीख को सिंध के देवल बंदरगाह पर पहुंचा। धोखा देकर मोहम्मद बिन कासिम ने देवल बंदरगाह को अपने कब्जे में कर लिया। शिरोमणि सिंधुपति महाराजा दाहरसेन भारत के वीर, सरहद के राखा, हिंदू कुल के रक्षक तीरंदाजी में प्रसिद्ध थे। उनके पास भारी मजबूत शूल था, जिसमें सुदर्शन चक्र की तरह चक्र था, जो शत्रु का सिर काट कर वापस चुंबक की तरफ जैसे लोहा आता है, वैसे लौटता था। उन्होंने गांव-गांव संदेश भेज कर सेना बढ़ाई और मोहम्मद बिन कासिम का मुकाबला किया और उनका पीछे खदेड़ दिया। इस पर मोहम्मद बिन कासिम की अरब सेना के कुछ सैनिक महिलाओं के वस्त्र पहन कर सहायता के लिए चिल्लाने लगे। दाहरसेन से फरेब किया गया था। वे दयावश उनकी सहायतार्थ अपनी सेना को छोड़ कर उस करुणा भरी आवाज की ओर बढ़े। अरब सेना ने उन्हें अकेला देख कर उनके हाथी पर अग्नि बाण छोड़े। मस्त हाथी ने नदी में जा कर सम्राट को पटका। वहां अंधेरे में से आपको सैनिक महल में ले आए, जहां 16 जून 712 ईस्वी में आपने शहादत दी। उसके बाद उनकी पत्नी श्रीमती लाडली देवी, दो कन्याओं व बेटे जयसिंह कुमार ने भी बलिदान दिया। इस प्रकार प्रथम स्वतंत्रता सेनानी ने भारत मां को पूरे परिवार के साथ आहुति दी।
सन् 1997 में अजमेर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत के अथक प्रयासों वे अजमेर के हरिभाऊ उपाध्याय नगर विस्तार में सिंधुपति महाराजा दाहरसेन का स्मारक खड़ा करवाया। इस रमणीक स्थान पर स्वामी विवेकानंद, गुरु नानकदेव, झूलेलाल, संत कंवरराम एवं हिंगलाज माता की मूर्तियां भी अलग-अलग पहाडिय़ों पर स्थापित करवार्इं। दीर्घाओं में सम्राट दाहरसेन के बलिदानी संघर्ष की कहानी चित्रों में दर्शायी गई है। प्रत्येक प्रतिमा को कांच से ढ़का गया है। यहां आकर्षक फव्वारे और प्राकृतिक गुफाएं देखने लायक हैं। यहा हर साल दाहरसेन के बलिदान दिवस व जयंती पर कार्यक्रम होते हैं। इसके अतिरिक्त यह शहर का दर्शनीय स्थल भी है, इस कारण यहां पर्यटकों आना-जाना रहता है।
-कंवल प्रकाश किशनानी
9829070059
599/9, राजेन्द्रपुरा हाथीभाटा, अजमेर

बना दे बहरा मुझे भगवान, बना दे बहरा!

शहर के कई मंदिरों एवं देवालयों में आजकल यह भजन अकसर सुनने को मिल रहा है. इसमें भक्तगण माईक लगाकर जोर जोर से समवेत स्वरों में ईश्वर से यह मांग करते है कि तू हमें बहरा बना दे. इन भक्तों में उम्र के दूसरे पड़ाव के वह लोग भी शामिल हैं, जिनके सिर पर हालांकि बाल नहीं हैं लेकिन उनकी मांग है कि हे परमेश्वर! हमें बहरा बना दे. बिना बालों के मांग? थोडा अजीब तो लगता है लेकिन मांग है तो है। खैर, ऐसे भजन कीर्तन में जाकर बैठने से कई गुर की बातें पता पडी. बिना कोई स्टिंग आपरेशन अथवा सीबीआई जांच किए कई रहस्योदघाटन हुए.
मसलन यहां बताया गया कि बहरा बनने की मांग के पीछे स्वान्तह सुखाय अर्थात खुद का सुख का सिद्धांत भी है और यह भी कि जो सुख चावै जीव को तो बुद्धु बन कर रह. थोडी देर के लिए मान लीजिए कि भगवान ने आपकी प्रार्थना सुन ली तो सबसे बड़ा फायदा तो आपको अपने घर में ही होगा. बीबी आप पर लाख चिल्लायें, झल्लायें लेकिन आप पर उसका कोई असर नही होगा, उल्टे आप मुस्कराते रहेंगे. इससे आपका स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा वह आपको सब्जी लाने के लिए कुछ कहती रहेगी, लेकिन आप झूठ-मूठ समझने की ऐक्टिंग करते हुए गरदन हिलाते रहेंगे. यह बात दीगर है कि भलेही आप बाजार से अपनी मन मरजी या दुकानदार की इच्छा से आलू की जगह प्याज या प्याज की जगह टमाटर उठा लाएं, आखिर सब्जी ही तो बननी हैं.
घर में सास-बहू दोनों इस फंडे पर चलने लगें तो सोने में सुहागा वरना दोनों में से कोई एक भी इसे अपना ले तो कलह धीरे धीरे कम होते होते समाप्त प्राय: हो जायेगी. मुझे यह रहस्य जिस व्यक्ति ने बताया उसका दावा था कि यह नुस्खा आजमूदा है अर्थात आजमाया हुआ है. उसने तो यहां तक दावा किया कि भगवान तो सुनेगा जब सुनेगा आपतो आजसे ही यह मानकर चले कि आपको कम सुनाई देता है. फिर देखना आप इसका आनंद!
कीर्तन मंडली में बैठे एक अन्य सज्जन, जो हाव-भाव से सरकारी अफसर-कर्मचारी लग रहे थे, हमारी बातचीत के बीच में ही कूद पडे और बोलें, आप क्या बात करते हैं? बहरा बनने का सबसे बडा फायदा जनसेवा से जुड़े सरकारी विभाग के लोगों को है. यह लोग इस फंडे पर बिलीव करते है कि लोगों का काम है शिकायत करना, करते रहेंगे. शहर में पानी नहीं आ रहा है, बार बार पावर कट हो रहा है, नगर में गुंडागर्दी बढ़ रही है इत्यादि और न जाने क्या क्या समस्याएं हैं, जिनके लिए दफतर में टेलीफोन आ रहे हैं, लोग दफतरों के चक्कर लगा रहे है, धरना-जुलूस हो रहे हैं, परन्तु आपको इससे क्या? आपको तो कुछ सुनाई ही नहीं देता, है ना?
इतना ही नहीं पास ही बैठे एक बुजुर्ग से सज्जन ने तो यह रहस्योदघाटन तक कर दिया कि मैं तो इस थ्योरी पर विश्वास करता हूं, जिसमें कहा गया है कि नशा करै तो ऐसा कर, जैसे पीली भंग. घर के जाणै चला गया आप करै आनंद।
बुद्धिमानों, जानकारों की कहीं कोई कमी नही हैं. षासकीय हलकों से जुड़े एक सज्जन, जो कीर्तन में जोर जोर से ताली बजा रहे थे, हालांकि आंखें मूंदे हुए थे लेकिन कभी कभी कनखियों से मेरी तरफ देख लेते थे, बोले कि अधिकांश जनप्रतिनिधि, मंत्री, पार्षद इत्यादि भी उस फार्मूले पर काम करते हैं, जिसका वर्णन एक कवि-श्री कृष्ण कल्पित- ने अपनी निम्न कविता में किया है:-
राजा रानी प्रजा मंत्री, बेटा इकलौता,
मां से सुनी कहानी जिसका अंत नहीं होता.
...............................
राजा राज किया करता था,
राजा राज करै प्रजा
भूख मरा करती थी,
प्रजा भूख मरै मैं
भी अब इस कहानी का दर्द नही सहता. राजा रानी....
और इस फंडे पर तब ही काम किया जा सकता है जब कि हम बहरे बन जाएं और जब तक भगवान हमारी सुने कम से कम तब तक हम बहरा बनने का नाटक तो करें। मैंने उन्हें कहा, नहीं, नहीं वह सबकी सुनता है, अत: आपकी भी सुनेगा आप तो गाते रहिए-बना दे बहरा मुझे भगवान, बना दे ....
ई. शिव शंकर गोयल
फलेट न. 1201, आई आई टी
इंजीनियर्स सोसायटी, प्लाट न. 12,
सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 9873706333

सूनी सूनी सी आँखे

क्यों इसकी आँखों में
उदासी की हैं झलक
क्यों इसका चहेरा ..
लगता हैं निहिर सा
एक बेचारगी लिए हुए 
इस छोटी सी उम्र में
कौन सा हैं दर्द.. ..
जो ये खुद में समेटे हुए हैं
आँखों में सपनों की जगह
क्यों हैं किस अपने के लिए
अश्को का बसेरा
इस बालपन में किसका
हैं इंतज़ार अब....
सूनी आँखे तकती हैं किस
राह को ...
किसका इसे अब हैं इंतज़ार....
कहाँ गई इसकी ...चिड़िया सी
चहचाहट ...
वो मस्ती का आलम ...
वो घर भर में धमा चौकड़ी करना
बात बात में ''अम्मा ..अम्मा ''
चिल्ला कर उसका पल्लू पकड़ना
कहाँ हैं इसके बचपन वो मासूमियत
क्यों इसकी सूनी आँखों में
प्यार की तड़प नज़र आती हैं
अब इसका ,किस दर्द से रिश्ता हैं
क्यों ,अपने ही दामन में अश्क बहाती हैं
वो एहसास उन हाथों के छूने का
जिस से ,इसकी दुनिया महफूज़ थी
आज इसकी इस खाली खाली सी जिंदगी में
इसके ''पितामहः'' की कमी
साफ़,नज़र आती हैं ||
अंजु (अनु) चौधरी ..करनाल..हरियाणा

मंगलवार, 5 जून 2012

काश तू आँचल का परचम बना लेती ......!

खातिर एकजुट हो रही हैं बांग्ला महिलाएं
उत्तर भारत के प्रमुख शहरों के घरों में काम करने वाली महिला कामगारों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. इनमे से ज्यादातर महिलाए बंगाल की है. जयपुर में ही इनकी संख्या कोई तीस हज़ार से भी अधिक है. इनके लिए कोई सेवा नियम नहीं है. लेकिन अब ये महिलाए अपने अधिकारों के लिए संगठित हो रही है.वे जगह-जगह बैठके कर रही हैं. इन महिलाओ के लिए उनकी पहचान बड़ा संकट बनी हुई है. उन्हें कई बार चोरी के इल्ज़ामों का सामना करना पड़ता है तो कभी उन्हें बांग्ला देशी करार दिया जाता है.घर-घर जाकर काम करती इन महिलाओं को समय मिला तो वे जमा हुई, सुख दुख बांटे और अपने हक़ के लिए नारे बुलंद किए.
किसी के भाल और कपाल पर उसकी राष्ट्रीयता नहीं लिखी होती. मगर जब भी कोई विवाद हुआ, इन महिलाओं को अपने ही वतन में बांग्ला देशी घोषित कर दिया गया.बिहार की गायत्री ने ये दंश कई बार झेला है.
पहचान
वो कहती हैं, ''मुझे दस बारह साल हो गए जयपुर में, मेरे पास न राशन कार्ड है , न मतदाता सूची में नाम है.मेरे जयपुर में रहने का कोई सबूत नहीं है.जहां भी काम करते है, हमें बांग्ला देशी कह कर पुकारा जाता है.आप बंगाल में जाकर पूछिए न हम कौन है, आप ममता बनर्जी से पूछिए ना."
गायत्री का कहना था कि जब महीने में चार छुट्टी की मांग करो तो बांग्लादेशी बता दिया जाता है.
यूं तो भूगोल ने बंगाल और राजस्थान में बहुत दूरिया पैदा की है.लेकिन इन घरेलू महिला कामगारों के जरिए एक बंगाल घरों के भीतर तक पहुंचा है.
कभी महारानी गायत्री देवी के वैवाहिक रिश्ते ने बंगाल और जयपुर के बीच संबधों का मजबूत सेतु खड़ा किया था क्योंकि वे कूच बिहार की थी मगर इन कामकाजी महिलाओं के लिए ये रिश्ता मजदूरी का है,मजबूरी का है.
बंगाल में कोलकात्ता से आई मंजू कहती है,''मुझे जयपुर में रहते सात साल हो गए ,लेकिन राशन कार्ड नहीं बनाया जा रहा है. हम चौबीस घंटे काम करते हैं,कभी यहां कभी वहां.एक एक औरत रोज़ पांच घरों में झाडु पोछा और चूल्हा चौका करती है.पहचान नहीं होने से बैंक खाता नहीं खुल सकता. मेरे परिवार में पांच लोग है. मकान मालिक डेढ़ दो हजार किराया ले लेता है. बच्चो को पढ़ाना मुश्किल है.''
हिकारत भरी निगाहें
गायत्री और मंजू बंगाल से हैं. मगर कमलेश तो राजस्थान की है. वो कहती है हमें बाई कह कर पुकारा जाता है और ये बड़ा अपमानजनक है. बैंक में खाता नहीं है लिहाजा दो तीन हज़ार जमा हो तो घर पर रखते है. मगर जब मकान मालिक के घर चोरी हो जाए तो वो पुलिस के साथ आते हैं और हमारी जमा पूंजी उठा ले जाते हैं. हम जानते है कि हम कैसे झूठन साफ़ कर पैसे जमा करते है. मकान मालिक लगातार किराया बढ़ाने का तकाजा करता रहता है.
भारत में कोई मोटर बंगला तो कोई सोने चांदी का तलबगार है. मगर इन औरतों की मुराद तो राशन कार्ड जैसे मुद्दों तक महदूद होकर रह गई है.
इन महिला कामगारों के संगठन की प्रमुख मेवा भारती कहती है, ''ये राशन कार्ड, वोटर कार्ड, बैंक में अकाउंट खुलवाने जैसी समस्याओ से जुझ रही हैं. इनके बच्चों के पास जन्म तिथि का सबूत नहीं होता, उन्हें बिना पहचान के स्कूल में दाखिला नहीं मिलता. महंगाई के हिसाब से मजदूरी नहीं बढती है. कार्य स्थल पर कई बार इन्हें बदसलूकी और इल्ज़ाम का सामना करना पड़ता है. इनकी संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. बंगाल से बराबर ऐसी घरेलू कामगारों का आना जारी है.''
इन महिलाओ का कहना था कि बंगाल में रोज़गार की कमी है.लिहाजा वो जयपुर जैसे शहरों का रुख करती है. ये महज औरत नहीं, उसकी हालत का बयान है. पर इसे कौन सुनेगा. काश, वो आँचल का परचम बना लेती और जमाना गौर से सुनता...
लेखक श्री नारायण बारेठ राजस्थान के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं और लंबे समय से बीबीसी से जुड़े हैं

पई की पांच महिला पंचों की अनूठी पहल


ग्राम सभा की ताकत समझी और चल पड़ी बदलाव की ओर
इन्होंने घूंघट त्यागा, रूढि़वादी विचारों को त्यागा, सामाजिक कुरीतियों को छोड़ा, बैठक की, महिलाओं को संगठित किया, शिक्षित हुई, अपने अधिकारों को जाना और आज ग्राम पंचायत में भागीदारी सुनिश्चित कर गांव के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। हालांकि ये सब आसानी से नहीं हुआ, दहलीज लांगी तो समाज के बुजुर्गों ने बंदिशे लगाई, पतियों ने मारपीट की, देवली (देऊ) बाई के पति ने तो कुल्हाडी से उसके सिर पर वार कर दिया। आंखों के आगे घूंघट रूपी पर्दा तो पीढिय़ों से पड़ा ही था उनके, जो उजाले की ओर बढऩे नहीं देता था। बढ़ती भी तो ढोकर खाकर गिर जाती या गिरा दी जाती थी। पर्दे ने अभिव्यक्ति की आजादी को भी दबाए रखा। लेकिन इन महिलाओं पर तो जुनून सवार था बदलाव का सामाजिक संगठन के संपर्क में आई, शिक्षित हुई और ग्राम सभा व ग्राम पंचायत की ताकत को समझा। फिर पंचायतीराज व आरक्षण का लाभ लिया, वो न सिर्फ प्रयासों में सफल रही है बल्कि अपनी भागीदारी भी सुनिश्चित की। देवली बाई कहती है कि लोग देखे तो भले देखे, मैं तो ग्राम सभा में जो कहना होता है बिना घूंघट के खुलकर कहती हूं, मैं घूंघट नहीं निकालती हूं, घूंघट निकालूं तो बोल नहीं पाती हूं।
उदयपुर से 20-25 किलोमीटर दूर के पई गांव की आदिवासी समुदाय की 5 महिलाएं (देवली बाई, कडौली बाई, चौखी बाई, रोड़ी बाई व सोमुदी बाई) बदलाव के लिए सतत प्रयास कर रही है। दो दशक पूर्व वे एक सामाजिक संस्था से प्रेरणा लेकर, बंदिशों से आजाद हुई और चुप्पी तोड़कर घर से बाहर निकली। वर्तमान में पांचों महिलाएं पई ग्राम पंचायत में वार्ड पंच है। देवली बाई 3 बार, कडौली बाई 3 बार, रोड़ी बाई 2 बार, चौखी बाई 4 बार तथा सोमुदी बाई 2 बार वार्ड पंच रह चुकी है। कडौली बाई तो पंचायत समिति सदस्य भी चुनी गई। इन महिलाओं ने अन्य महिलाओं को भी आगे लाने का प्रयास किया। इस बार वेलकी बाई को भी वार्ड पंच का चुनाव लड़वाया। ग्राम पंचायत में इनकी पूर्ण भागीदारी नजर आती है। कोरम में इनका बहुमत है। सभी एक सूर में गांव के विकास के लिए प्रस्ताव रखती है।
देवली बाई कहती है गांवों में पुरूषों की राजनीति थी, पंचायतों में उनका राज था, महिलाएं कभी पंचायत में पहूंच भी जाती थी तो घूंघट तान चुपचाप एक तरफ बैठी रहती थी। जब हम पहली बार चुनाव लड़ी तो लोगों ने कहा कि ''क्या कर लेगी ये घाघरी वाली पंचायत में जाकर।�� नयाफला गांव के भैरूलाल का कहना है कि वार्ड पंच महिलाओं का यह ग्रुप सरकार की विकास योजनाओं का लाभ लोगों तक पहूंचाने में कार्य कर रहा है। ग्राम पंचायत के कार्यों पर निगरानी भी रखती है। अन्य दिनों में गांवों में जाना, लोगों की समस्याओं को जानना एवं कोरम में उन समस्याओं के निराकरण करवाना ही इनका मुख्य कार्य है।
असाक्षर थी, साक्षरता कार्यक्रम से जुड़कर पहले खुद अक्षर लिखना-पढऩा सीखी और फिर गांवों की महिलाओं को पढऩे के लिए प्रेरित किया, बच्चे बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। संघर्ष किया और ज्ञापन दे दे कर आंगनबाडिय़ा व स्कूल खुलवाए। जनसमस्याओं के समाधान करना ही इनका मुख्य ध्येय बन गया है। यहीं कारण है कि क्षेत्र की करीबन 3000 महिलाएं इनसे जुड़ी हुई है। इन सभी ने मिलकर शराबबंदी का महत्वपूर्ण कार्य किया है। वन भूमि अधिकार, सूचना का अधिकार, रोजगार का अधिकार जैसे मुद्दों पर पांचों महिला पंचों ने सक्रिय भूमिका निभाई है। देवली बाई ग्राम पंचायत व पंचायत समिति से सूचना के अधिकार के तहत सूचनाएं लेती रहती है। देवली बाई पूरजोर से सूचनाएं मांगती है वो कहती है कि सूचना दो, अगर नहीं देते हो तो लिखकर दो कि सूचनाएं नहीं दे सकता। उसके सवाल सुनकर अधिकारी भी झेंप जाते है। वो कहती है कि सूचना लेने का हमारा अधिकार है, सूचना देनी ही पड़ेगी। कई बार तो उसके आवेदन लेने से ही इंकार कर दिया गया, दो मर्तबा आवेदन की रसीद नहीं दी। विकास अधिकारी ने तो कह दिया कि सूचना लेकर क्या करोगी ? लेकिन देवली बाई की तर्कसंगत बहस एवं जागरूकता के आगे अधिकारियों को झूकना पड़ा और उन्होंने आवेदन लिए और सूचनाएं भी दी। देवली बाई ने हाल ही में 27 फरवरी को सूचना के अधिकार के तहत आवेदन करके सूचना मांगी है कि ''उदयपुर से सराड़ा तक कितने लोगों की जमीन अवाप्त की गई है?��
देहाती वेशभूषा में देवली बाई जब वन भूमि अधिकार के पट्टों आदि के आंकड़े बताती है तो हर कोई चकित रह जाता है। बताती है कि पात्र 103 लोगों को पट्टे दिलवाए है, लगभग 400 आवेदनों पर कार्यवाही चल रही है। पेंशन योजनाओं के लाभ दिलवाने में सराहनीय कार्य इन्होंने किए है। पात्र महिलाओं के आवेदन करवाए। 2000 मजदूरों को मनरेगा के तहत काम नहीं मिल रहा था, इन्होंने बैठक की और जिला कलक्टर को अवगत कराया, संघर्ष की बदौलत उन्हें रोजगार मिला।
सरकार के 'प्रशासन गांव के संग अभियान�� की तरफदारी करते हुए कड़ौली बाई कहती है इस अभियान के तहत आयोजित शिविरों में लोगों के प्रशासन से संबंधित अधिक से अधिक कार्य करवाए जा सकते है। देवली बाई ने बताया कि गांव वालों की समस्याओं के समाधान करने में इस प्रकार के अभियान महत्वपूर्ण है। हमने इस कार्यक्रम के तहत लोगों की राशनकार्ड, जॉब कार्ड, पेंशन, प्रमाण पत्र, बिजली कनेक्शन, जमीन संबंधीत समस्याओं के समाधान करवाए है।
सरकार द्वारा संचालित विभिन्न कार्यक्रमों पर निगरानी का कार्य भी करती है। गांव में प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक समय पर नहीं आते थे तथा पूरे समय पर विद्यालय में नहीं रूकता था। देवली बाई को गांव की महिलाओं से जब ये जानकारी मिली तो शिविर में इस मुद्दे को उठाया। शिविर प्रभारी ने उस अध्यापक को हटाकर दूसरे अध्यापक को नियुक्ति करवा दी। उसके बाद से विद्यालय समय पर खुलता है और अध्यापक भी पूरे समय विद्यालय में रूकता है। इसके अलावा वो आंगनबाड़ी केन्द्रों में पोषाहार व विद्यालयों में मिल डे मिल का अवलोकन भी करती है। यहीं नहीं इन महिला पंचों ने साझे प्रयास कर पिपलवास, कुम्हारिया खेड़ा, सूखा आम्बा, निचलाफल, पाबा, किम्बरी में प्राथमिक विद्यालय भी खुलवाए है। विद्यालय खुलवाने के लिए बार-बार ज्ञापन दिए, जिला अधिकारियों से पैरवी की।
ग्राम पंचायत के वार्ड नम्बर 8 में विद्यालय भवन नहीं है, अध्यापक बच्चों को पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाता है, वहीं इस वार्ड में 30 से अधिक बच्चे है लेकिन आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है। आजकल पांचों महिला पंच विद्यालय भवन व आंगनबाड़ी केंद्र के लिए भवन की मांग कर रही है। हाल ही में 14 फरवरी को उन्होंने जिला कलक्टर को ज्ञापन देकर भवन निर्माण की मांग की है। भ्रष्टाचार की घोर विरोधी है ये पांचो पंच। इन्होंने सूचना के अधिकार का उपयोग कर पई ग्राम पंचायत द्वारा किए गए फर्जीवाड़े को उजागर किया। फर्जीवाडे के जानकारी मिलने बाद इन्होंने सामाजिक अंकेक्षण करवाने का प्रस्ताव रखा। सामाजिक अंकेक्षण किया और पाया गया कि ग्राम पंचायत द्वारा नाली निर्माण नहीं करवाया जबकि नाली निर्माण के नाम फर्जी बिल बाउचर का संधारण कर लाखों रुपयों का गबन कर दिया गया।
कडौली बाई कहती है कि जब हम पहली बार वार्ड पंच बनी तो लोग कहते थे ये क्या कर लेगी घाघरी वाली। लेकिन हमनें जो काम अब तक किए है उन्हें देखकर अब वहीं लोग हमें र्निविरोध वार्ड पंच बनाने लगे है। देवली बाई 3 बार वार्ड पंच रह चुकी है इस बार उसे र्निविरोध वार्ड पंच बनाया गया। रोड़ी बाई का कहना है कि हम किसी से नहीं रूकने वाली है। हम ग्राम पंचायत में न तो कुछ गलत करती है और ना ही गलत होने देती है।
इन महिलाओं को यह डगर सामाजिक संगठन आस्था के कार्यकर्ताओं ने कोई 25 वर्ष पहले दिखाई थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर यह सामाजिक संगठन नहीं होता तो इन महिलाओं के जीवन में परिवर्तन शायद ही संभव हो पाता। संस्था के लोगों ने इन्हें इनके अधिकारों की जानकारी दी, पंचायतीराज की जानकारी दी और साथ दिया। आज ये महिलाएं पंच बनकर ग्राम का विकास करवा रही है। ये महिलाएं घर की दहलीज पार कर चुकी है, इन्होंने रूढि़वादी विचारधाराओं को तोड़कर मिसाल कायम की है। ऐसा लगता है कि - अब ना मूंडेगी, ना रूकेगी ये उड़ चली है खुले गगन में . . .
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