गुरुवार, 5 नवंबर 2015

वादे ! ......क्या अाएंगे 'अब'अच्छे दिन ?

'बेटी बचाओ' क्या सिर्फ 'नारा' ही है,
'नन्ही हथेलियाँ'', हो रहीं लहूलुहान हैं ।
नहीं लग रही अब,कोई कहीं लगाम है,
दिनों-दिन आदमी हो रहा यों हैवान है।
घूस, अपहरण और बलात्कार यहाँ वहाँ
हर रोज बनता 'फोकस' खबरों का जहां।
पीड़ित तो पीड़ित, परिजन होते शर्मसार,
रक्षकों की बातकरें,नहीं बदल रहेआसार।
भूखे भेड़िये से, गुंडे मिजाज गर्माते हैं,
जेल जाते भी अब, नहीं कतई शर्माते हैं।
समाज की तो , बडी निराली है रीत ही,
पचडों से दूर ही रहना,बन गया गीत है।
ना धर्म, न शर्म है, कर्म की बात क्या कीजे,
कलजुग है घोर,कहते शर्मिंदा होत दिन तीजे।
भृष्टाचार अक्सर, आ सामने खडा होता है,
बडा ऊंचा समझता, पडा जहाँ छापा होता है।
अस्पतालों की तो,बात ही मत कीजिए सर,
महंगी दवा और डॉक्टर ,जरा कसिये तो 'पर'।
दाल भात,तेल और, बिजली चढ़ रहे ऊँचे है,
गंगा मैली, कचरे के ढेरों पर बैठे गली कूँचे हैं।
आदमी तो खा रहा , रोज महगाई के कोडे़ है,
जनता के पसीने से,नेता खारहे तले पकौडे है।
काला धन, भला कैसे स्वदेशी हो जाएगा,
राज आपका , दाऊद क्यों मरने आएगा ?
दिल्ली से देश तक, हवा जो कभी तन जाए
रोक लीजिए पहले, कि 'धूंआ' आग बन जाए।
मोदी जी अब, सैल्फी से जरा बाहर आ जाईये,
"मन की बात" है, अच्छे दिन,अब ले हीआईये।
~~~~~~~~ ~~~~ * शमेन्द्र जड़वाल

अजमेर विकास प्राधिकरण की वेबसाइट पर जनहित की सूचनाएं डाली जाएं

अजमेर विकास प्राधिकरण (पूर्व यूआईटी) की वेबसाइट दो मायनों में त्रुटिपूर्ण है। पहली यह कि इसमें सूचनाएं या तो डाली नहीं जाती हैं या वे अपूर्ण/डिफेक्टिव डाली जाती हैं। दूसरी यह कि इस वेबारसाइट मे  सिटीजन चार्टर नहीं है जिसे किसी भी विभाग की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है।
विकास प्राधिकरण जनता व सरकार के साथ कई प्रकार से बेईमानी कर रहा है। एक तो यह कि रिकार्ड पर यह बताया ताजा है कि उसने कानूनी/विभागीय अनिवार्यता के कारण वेबसाइट का निर्माण कर लिया है ताकि सरकार यह न कहे कि प्राधिकरण की वेबसाइट क्यों नहीं बनी है। दूसरी यह कि इसमें जो आवश्यक व जनता की जानकारी के लिए जरूरी/महत्वपूर्ण जानकारियां/सूचनाएं हैं, वे नहीं डाली जाती।
किसी भी सरकारी या अद्र्ध सरकारी/स्वायत्तशाषी विभाग को अपनी वेबसाइट बनानी आवश्यक है। इस वेबसाइट के माध्यम से यह बताना भी आवश्यक है कि यह विभाग किस कार्य के लिए बनाया गया है तथा वह जनता के किस-किस काम को कितने समय में पूरा करेगा। इन कार्यों के लिए विभाग ने किस प्रकार से व्यवस्था कर रखी है। से सब बातें विभाग अपने सिटीजन चार्टर के माध्यम से जनता को बताता है, परन्तु खेद, दु:ख व शर्मिन्दगी का बात है कि यह जानकारी (सिटीजन चार्टर)अभी तक इस वेबसाइट पर डाली ही नहीं गई है। अभी तक सिटीजन चार्टर का चैप्टर बनाया ही नहीं गया है। यदि वेबाइट खोलकर देखेगें तो यह तो दिखाई देगा कि इस विभागर का सिटीजन चार्टर है, परन्तु जब अन्दर झांककर देखेगें तो मालुम होगा कि सिटीजन चार्टर का निर्माण प्रारम्भ से ही नहीं किया गया है। आज भी उस कॉलम में यही लिखा आता है कि इसका निर्माण कार्य चल रहा है। वेबसाइट को प्रारम्भ हुए पांच बरस बीत भी चुके हैं परन्तु यह पंचवर्षीय योजना से भी अधिक समय लेने  वाला कार्य बताया जा रहा है।
इस वेबसाइट में अनगिनत खामियां तो हैं हीं  इसके माध्यम से जनता से छुपाव का खेल भी खेला जा रहा है।  इस वेबसाइट पर न्यास/प्राधिकरण मीटिंगों (मिनिट्स), सम्पूर्ण बजट,  नियमन फाइलों की नाम, पते सहित पूरी सूची, संस्थाओं, व्यक्तियों, प्रतिष्ठानों आदि को रियायती, आधी/पूरी दर पर आवंटन भूखण्ड आदि अनेक जानकारियां डाली ही नहीं जाती। इसके पीछे यही मकसद है कि जनता को पता ही न चले कि उसके नगर के विकास का जिम्मा धारण करने वाली संस्था किस-किस का विकास और कैसे-कैसे कर ही है। बजट का पूरा विवरण न डालकार छुपाया जा रहा है कि किस कार्य के लिए कितना पैसा व किस शर्त पर खर्च किया जा रहा है।
खेद है कि अजमेर के राजनीतिक बंधुओं ने किसी प्रकार की कोई ऐसी पहल नहीं की है, जिससे अजमेर विकास प्राधिकरण (नगर सुधार न्यास) की वेबसाइट पर आवश्यक सामग्री प्रदर्शित हो और जनता को सही व सम्पूर्ण जानकारियां/सूचनाएं इस वेबसाइट के माध्यम से मिल सकें।
यदि हम अन्य नगर सुधार न्यास व जेडीए जयपुर की वेबसाइट का अवलोकन करें तो यह साफ हो जायेगा कि अजमेर की वेब साइट में वहां के मुकाबले शून्य के बराबर सूचनाएं हैं।
अजयमेरु टाइम्स ने ही प्रथम बार यह बात उजागर की कि नगर सुधार न्यास ने इस वेबसाइट को बनाने के लिए करीब 1 करोड़ खर्च किए हैं, परंतु जनता के लिए जो आवश्यक सामग्री है, वह इस वेबसाइट पर डाली नहीं जा रही है, जिसके कारण भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुंचा है और नरेन शाहनी जैसे साफ सुथरी छवि के व्यक्ति भी उससे बच नहीं पाए।
और जानकारियों की छोडिय़े, अकेले नियमन के मामले को ही लें तो, नियमन हेतु जो फाइल 15 वर्ष पूर्व लगी, वह आज भी वहीं की वहीं है जबकि उसके बाद की फाइलों को कभी का निपटा दिया गया है। यदि वेबासाइट पर यह सूचना डालदी जाती है तो सभी को पता चल जाता है कि नई फाइलें क्यों निपटाई जा रही और पुरानी फाइलें क्यों नहीं निपट रही हैं। ये सब घाल-मेल वेबसाइट की गड़बड़ी से आगे बढ़ रहा है।
यदि आज नियमन हेतु किसी ने 15 वर्ष पूर्व फाइल लगाई है और नियमन नहीं हो पाया है और यदि वह जानना चाहे कि उसकी फाइल की क्या स्थिति है, तो वह कितने भी प्रयास करले तो भी उसे न्यास से कोई जवाब नहीं मिलेगा। यानि कि न तो न्यास सीध तौर पर कोई जानकारी दे रहा है और न ही वेबसाइट पर जानकारी मुहैया करवा रहा है।
अफसोस तो इस बात का है कि आए दिन चौराहों पर धरना देने वाले, कांग्रेस के खिलाफ राष्ट्रवाद का ध्वज फहराने वाले भी कोई नेता इस प्रकरण में एक शब्द भी नहीं बोलते हैं।
अजमेर विकास प्राधिकरण के वर्तमान अध्यक्ष श्री हेमन्त गेरा साहब से इस सम्बन्ध में सुधार किए जाने की पूरी उम्मीद है, प्रार्थना यही है कि इस विभाग में कार्य करने का उन्हें इतना समय मिल जाए कि वे इस विभाग की न सिर्फ सम्हाल कर सकें बल्कि ऐसी व्यवस्था भी बैठा सकें कि आगे के लिए भी गाड़ी पटरी पर आ जाए।
एन. के. जैन सीए

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

अजमेर का अभेद दुर्ग है अनूठा तारागढ़

वर्ल्ड हेरिटेज डे पर विशेष
taragarh kila 3आक्रमण, सुरक्षा और स्थापत्य का अद्भुत नमूना है तारागढ़ दुर्ग! अजमेर में जाकर कहीं से देखिए लगता है, ऐसा लगता है मानो तारागढ़ हमें बुला रहा है। इस दुर्ग के पीछे छिपा है इसका गौरवशाली इतिहास। इसके खंडहर आज भी उतनी ही मजबूती से अपनी गाथा कह रहे हैं।
अजमेर की सबसे ऊंची पर्वत शृंखला पर स्थित तारागढ़ दुर्ग को सन् 1832 में भारत के गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक ने देखा तो उनके मुंह से निकल पड़ा- ''ओह दुनिया का दूसरा जिब्राल्टरÓÓ और मुगल बादशाह अकबर ने तो इसकी श्रेष्ठता भांप कर अजमेर को अपने साम्राज्य का सबसे बड़ा सूबा बनाया था। 1 हजार 885 फीट ऊंचे पर्वत शिखर पर दो वर्ग मील में फैले इस दुर्ग के चारों तरफ बनी बुर्जों पर से एक ओर गहरी घाटी, दूसरी ओर लगातार तीन पर्वत शृंखलाओं, तीसरी ओर सर्पाकार पहाड़ी मार्ग के सीधे ढलान व चौथी ओर पहाड़ी की तलहटी में बसे विशाल अजमेर शहर को देखते हैं तो बड़ा सुखद रोमांच होता है। मुगलकालीन उत्तर-मध्य भारत के सामरिक नियंत्रण और उत्तर मुगलकालीन राजस्थान में मराठों, राठौड़ों तथा अंग्रेजों की रक्तिम पैंतरेबाजी में तारागढ़ का सर्वाधिक महत्व रहा। तारागढ़ की प्राकृतिक सुरक्षा एवं अनूठे स्थापत्य के कारण ही मुगल साम्राज्य का सबसे बड़ा सूबा बनाया जिसमें उस समय साठ सरकारें व 197 परगने थे।
यह ऐतिहासिक दुर्ग अजमेर के चौहान राजा अजयराज द्वितीय ने 1033 ई. में बनवाया था। इससे पहले सयादलक्ष के चौहान नरेश अजयराज प्रथम ने छठी शताब्दी में यहां चौहानों की सैन्य चौकी स्थापित की थी। प्रारंभ में नाम अजयमेरू दुर्ग था। सन् 1505 में मेवाड़ के राजकुमार पृथ्वीराज ने इस पर अधिकार किया तथा अपनी रानी ताराबाई के नाम से दुर्ग का नाम तारागढ़ रख दिया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. पारसनाथ सिंह के अनुसार उत्तर भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) का वध इसी तारागढ़ में सुल्तान मुहम्मद गौरी ने किया था। तारागढ़ का स्थापत्य अनूठा है। दुर्ग स्थापत्य की दृष्टि से राजस्थान में कुम्भलगढ़, सिवाना, रणथम्भौर, चित्तौडग़ढ़ व तारागढ़ बेमिसाल है। इनमें भी तारागढ़ की विशिष्टता को अंग्रेज सेनापतियों ने भी खुली आंखों से स्वीकार किया। दुर्ग की अनूठी विशेषता उसके तोरणद्वार को ढकने वाली वर्तुलाकार दीवार है। ऐसा भारत के किसी भी दुर्ग में नहीं है। इसमें प्रवेश के लिए एक छोटा-सा द्वार है। उसकी बनावट भी ऐसी है कि बाहर से आने वाले दुश्मों को पंक्तिबद्ध करके आसानी से सफाया किया जा सके। मुख्यद्वार को ढकने वाली दीवार में भीतर से गोलियां और तीर चलाने के लिए पचासों सुराख हैं। किले के चारों तरफ 14 बुर्ज हैं जिन पर मुगलों ने तोपें जमा की थी। इन्हीं बुर्जों ने तो दुर्जेय तारागढ़ को अजेय बना दिया था। इसलिए तारागढ़ जिसके भी अधीन रहा, वह दुर्ग के द्वार पर कभी लड़ाई नहीं हारा। शताधिक युद्धों के साक्षी इस दुर्ग का भाग्य मैदानी लड़ाई के निर्णयों के अनुसार ही बदलता रहा। तारागढ़ के दुर्ग-स्थापत्य में चौदह बुर्जों का विशेष महत्व रहा। बड़े दरवाजे से पूरब की ओर जा रही किले की दीवार पर तीन बुर्जें हैं-घूंघट बुर्ज, गुमटी बुर्ज तथा फूटी बुर्ज। घूंघट बुर्ज इमारतनुमा है-दूर से यह नजर नहीं आती। आजकल इसमें सरकार का वायरलैस लगा हुआ है। बुर्ज की इस प्रकार की संरचना युद्धनीति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जाती है। आगे है नक्कारची बुर्ज, कहते हैं कि सैय्यद मीरान साहब के साथ युद्ध में नगाड़ा बजाते हुए हजरत बुलन्दशाह यहीं मारे गए थे, इसलिए बुर्ज का नाम नक्कारची बुर्ज पड़ गया। अब तो ध्वंसावशेष ही दिखते हैं। शहर जाने वाली गिब्सन रोड उसी के पास से गुजरती है। इस बुर्ज के बाद है शृंगार चंवरी बुर्ज। वह आजकल लोढ़ों की कोठी है। इसके आगे चार बुर्जें हैं-अत्ता बुर्ज, पीपली बुर्ज, इब्राहिम शहीद का बुर्ज व दौराई बुर्ज। इनके बाद बान्द्रा बुर्ज, इमली बुर्ज, खिड़की बुर्ज व फतह बुर्ज है। इन बुर्जों के अलावा दुर्ग का दो किलोमीटर लम्बा परकोटा भी इसकी विशेषता है। इस परकोटे पर दो घुड़सवार आराम से साथ-साथ दौड़ सकते थे। पहले पूरा शहर इसी परकोटे के भीतर रहा होगा।
तारागढ़ का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि 1832 से 1920 के बीच अंग्रेजों ने इसमें व्यापक तोडफ़ोड़ की, जिसके परिणामस्वरूप तोरणद्वार, टूटी-फूटी बुर्जों, मीरान साहब की दरगाह आदि के अलावा आज कुछ भी शेष नहीं है। अजमेर के विख्यात इतिहासकार दीवान हरबिलास शारदा के अनुसार 1832 में भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम मेंटिक ने तारागढ़ में व्यापक तोड़-फोड़ के आदेश देते हुए व्यवस्था कर दी कि यहां नसीराबाद छावनी के सैनिकों की चिकित्सा हेतु सेनिटोरियम स्थापित कर दिया जाए। अत: 1860 से 1920 तक यहां सेनिटोरियम रहा। सन् 1033 से 1818 तक इस दुर्ग ने शताधिक युद्ध देखे। चौहानों के बाद अफगानों, मुगलों, राजपूतों, मराठों और अंग्रेजों के बीच इस दुर्ग को अपने-अपने अधिकार में रखने के लिए जो छोटे-बड़े युद्ध हुए उनका अनुमान इन ऐतिहासिक तथ्यों से लगाया जा सकता है-
1192 गढ़ पर गौरी का अधिकार, 1202 राजपूतों का आधिपत्य, 1226 में सुल्तान इल्तुतमश के अधीन, 1242 में सुल्तान अलाउद्दीन मसूद का कब्जा, 1364 में महाराणा क्षेत्र सिंह का अधिकार, 1405 में चूण्डा राठौड़ का प्रभुत्व, 1455 में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी का अधिकार, 1505 में मेवाड़ के सिसोदिया राजपूतों का कब्जा, 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह का अधिकार, 1538 में जोधपुर के राजा मालदेव का प्रभुत्व, 1557 में हाजी खां पठान का कब्जा, 1558 में मुगलों का अधिकार, 1818 में अंग्रेजों का अधिकार। लेकिन वक्त की विडम्बना है कि इतना महत्वपूर्ण तारागढ़ दुर्ग पुरातत्व विभाग की उपेक्षा के कारण मिट्टी में मिलता जा रहा है। इसके मुख्य द्वार और परकोटे से पत्थर निकाले जा रहे हैं। बीच में राज्य सरकार ने इसे राजस्थान का ''मिनी माउण्ट आबूÓÓ बनाने का विचार किया था, लेकिन वह योजना भी कागजों तक ही सीमित रह गई।
-शिव शर्मा, रामगंज, अजमेर

मुगलकालीन भारत की धड़कन-दौलतखाना


वर्ल्ड हेरिटेज डे पर विशेष
बादशाह अकबर के समय यह दौलतखाना मुगल राजनीति व समर नीति का केन्द्र स्थल था। विश्व की सबसे लम्बी लड़ाई मुगल-मेवाड़ युद्ध यहीं से संचालित हुआ। गुलाब के इत्र का आविष्कार यहीं हुआ। जहांगीर की बेगम को 'नूरजहांÓ और पुत्र खुर्रम को 'शाहजहांÓ की उपाधि यहीं दी गई थी। ईस्ट इण्डिया को भारत में व्यापार की अनुमति भी यहीं मिली थी।
अजमेर के नया बाजार क्षेत्र में स्थित लगभग 425 वर्ष पुराना यह दौलतखाना, अकबरी महल, राजपूताना संग्रहालय व मेगजीन के नाम से ही जाना जाता है। मुगल बादशाह अकबर ने अजमेर को मुगल साम्राज्य का सबसे बड़ा सूबा बनाया था। बादशाह जहांगीर यहां तीन साल रहा। इस दौरान यहां एंग्लो-मुगल पेंटिंग का बहुत परिष्कार हुआ। सर टॉमस ने बेगम नूरजहां की  एक इतनी सुन्दर पेंटिंग तैयार कराई थी कि उसकी खूबसूरती परक कुर्बान बादशाह जहांगीर ने टॉमस से मिलना स्वीकार किया और बितानी कम्पनी को भारत में व्यापार करने की अनुमति दे दी। इतिहास साक्षी है कि इस छोटी से घटना ने पूरे हिन्दुस्तान की तकदीर उलट दी थी।
मुगल इतिहास में इस दौलतखाने के महत्व को जरा सिलसिलेवार देखें-
राजपुताना संग्रहालय (मेगजीन) वस्तुत: मुगल बादशाह अकबर का महल (दौलतखाना) है। इसका निर्माण 1571 से 1574 तक तीन वर्ष में हुआ था। इस आयताकार इमारत के प्रत्येक कोने में एक विशाल बुर्ज है। भूरे पत्थर से निर्मित इस भवन का मुख्य द्वार 84 फीट ऊंचा और 43 फीट चौड़ा है। मुगल बादशाह अपनी अजमेर यात्रा के दौरान अक्सर यहीं ठहरते थे। शहंशाह जहांगीर तो यहां 1613 से 1616 तक ठहरा था और यहीं नूरजहां की मां सलमा ने गुलाब के इत्र का आविष्कर किया था। सर टॉमस रो (ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम का दूत) ने यहीं सम्राट जहांगीर से ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए भारत में व्यापार की अनुमति प्राप्त की थी। कालान्तर में यह मराठों का मुख्यावास रहा और उन्होंने इसमें कुछ परिवर्तन किए। पश्चिमी बुर्ज के एक कक्ष की छत पर उन्होंने आनासागर से हटवाकर एक बारहदरी स्थापित की जिसका उपयोग मंदिर के रूप में किया जाता था। फिर अंग्रेजों ने 1818 से 1863 ई. तक इसका उपयोग शास्त्रागार के रूप में किया और इसलिए इसे मेगजीन कहा जाने लगा। सन् 1863 में इस इमारत के केन्द्रीय कक्ष में तहसील कार्यालय खोला गया जिसे 1903 में एक बुर्ज में स्थानान्तरित कर दिया गया और 1971 तक यहीं रहा। फिर 19 अक्टूबर 1908 को यहां राजपूताना संग्रहालय खोल दिया गया तथा पं. गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा इसके अधीक्षक नियुक्त किए गए। सन 1857 की क्रांति के दौरान इसकी किलाबंदी की गई। बुर्जों पर तोपें तैनात की गईं। मुख्य द्वार को बंद कर दिया गया तथा आने-जाने के लिए एक छोटा सा द्वार दक्षिण में बनाया गया जो अब जानवरों के अस्पताल के परिसर में देखा जा सकता है। सन 1892 में यहां की दक्षिणी पूर्वी बुर्ज में नगर पालिका का कार्यालय स्थानान्तरित किया गया जो पहले बारहदरी पर था।
खाटू और आगरा के पत्थर से निर्मित इस दौलतखाना के मध्य में विशाल कक्ष था जहां शाही दरबार का आयोजन होता था।  उत्तर-पूरब और दक्षिण-पूरब वाली प्रत्येक बुर्ज की लम्बाई 74 फीट थी और इन बुर्जों के मध्य ऊंची दीवार के सहारे कक्ष बने हुए थे। केन्द्रीय सभाकक्ष के चारों तरफ बगीचा था। शहंशाह जहांगीर के समय यहां इण्डो-मुगल शैली की अनुपम पेंटिंग्स देखकर सर टॉमस रो भी विस्मित रह गया था। दौलतखाना के मुख्य द्वार के दोनों तरफ दो-दो झरोखे और एक शानदार गैलरी है। इन्ही झरोखों में बैठकर शहंशाह जहांगीर जनता की फरियाद सुनता था। इसी दौलतखाना में फरवरी 1576 में हल्दीघाटी युद्ध की योजना बनी थी और जनवरी 1615 में यहीं पर शहजादा खुर्रम का स्वागत किया गया, क्योंकि उसने महाराणा अमरसिंह को संधि के लिए सहमत करके हल्दीघाटी युद्ध या कहें कि मुगलों की मेवाड़ मुहिम को समाप्त किया।
पुरातात्विक वस्तुओं का संग्रह
मेगजीन के केन्द्रीय कक्ष में जो पुस्तकालय है उसमें इतिहास की प्राचीन पुस्तकों व दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह है। इस भवन में राजपूताना संग्रहालय है। उसमें अनेक प्राचीन शिलालेख, मूर्तियां व सिक्के सुरक्षित हैं। सबसे पुराना शिलालेख पांच सदी ई. पूर्व का है, जो बड़ली (अजमेर से दक्षिण-पूरब में 36 मील दूर) गांव के मिलोत माता मंदिर से प्राप्त हुआ है। जिसका वर्तमान नाम नगरी (चित्तौड़ से उत्तर में आठ छह मील दूर) है। इसी माह 646 ईं. का सिमोली का शिलालेखों में प्रसिद्ध है- हर्षनाथ मंदिर का अभिलेख ढाई दिन के झौपड़े से प्राप्त 12वीं सदी का शिलालेख (पत्थर की सात पट्टिïयों पर अभिलेख) आदि। ऐतिहासिक प्राचीन प्रतिमाओं का भी यहां अ'छा भंडार है। हर्षनाथ मंदिर से प्राप्त लिंगोदभव प्रतिमा, ढाई दिन के झौपड़े से प्राप्त नक्षत्रों की प्रतिमाएं गुप्तकालीन यम-सूर्य-शिव-पार्वती की प्रतिमाएं और पर्शिया से आए मेगाया मागा शिल्पकारों द्वारा निर्मित सूर्य प्रतिमाएं हैं। जैन धर्म से संबंधित तीर्थंकरों की भी अनेक प्राचीन प्रतिमाएं तथा लरकाना जिले में खुदाई से प्राप्त सिंधु सभ्यता के समय की सीलें भी यहां सुरक्षित हैं। इसी तरह क्षत्रिय, शक, कुषाण, हूण व चौहान कालीन सिक्के भी इस संग्राहलय की शान हैं। अब इस भवन के मुख्य भाग में पुस्तकालय है। इस पुस्तकालय में इतिहास और पुरातत्व से संबंधित मूल्यवान प्राचीन ग्रंथ सुरक्षित हैं। विख्यात लिपि विशेषज्ञ एवं इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा सन 1908 में यहां के क्यूरेटर थे। इसी भांति दाहिनी तरफ के हिस्से में एक दर्शन-दीर्घा है, जिसमें पुरा महत्व की अनेक वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया है। इस भवन का अब केन्द्रीय सरकार ने अधिग्रहण कर लिया है।
-शिव शर्मा, रामगंज, अजमेर

बुधवार, 21 नवंबर 2012

दोहरा भेदभाव झेल रहे 'पाकिस्तानी हिंदू'


नारायण बारेठ
-नारायण बारेठ-
भारतीय उपमहाद्वीप में दलित, आदिवासी और समाज के वंचित वर्ग के साथ भेदभाव की शिकायतें सुनते रहते हैं, मगर पाकिस्तान में इन वर्गों के लोगों को दोहरे भेदभाव की प्रताड़ना से गुज़रना पड़ता है.
पाकिस्तान के दलित और आदिवासी समुदाय के लोगों का कहना है कि उनके साथ दोहरा पक्षपात होता है. पहले उनके साथ अल्पसंख्यक होने के नाते भेदभाव किया जाता है, फिर उनके अपने हिन्दू समाज में छुआछूत उनका पीछा नहीं छोड़ती.
ये लोग कहते हैं कि धरती पर खींची गई एक लकीर भले ही हिंदुस्तान और पाकिस्तान को बांटती हो. लेकिन भेदभाव इधर भी है और उधर भी बस इसमें फर्क दर्जे का है.
65 साल के अर्जुन भील आदिवासी समुदाय से हैं
अर्जुन भील: होटलों में अलग बर्तन
पैंसठ साल के अर्जुन भील पाकिस्तान के पंजाब में बहावलपुर ज़िले में पैदा हुए हैं और हाल ही में हमेशा के लिए भारत आए हैं. वे कहते हैं पाकिस्तान में जो हिन्दू आबाद हैं, उनमें से ज़्यादातर या तो आदिवासी भील हैं या फिर दलित बिरादरी के मेघवाल और कोली है, इन्हीं के साथ बावरी जाती के लोग भी हैं.
हम हिंदुओं के लिए पाकिस्तान के होटलों और चाय-पानी की दुकानों पर अलग से बर्तन रखे होते हैं. हम लोग अपने इस्तेमाल के लिए बर्तन अपने साथ एक थैली में रखते है.
हमें ऐसे बर्तनों को साझा करने का कोई हक़ नहीं है जो बाकी लोग इस्तेमाल करते हैं क्योंकि हम अछूत हैं. हम होटल वाले या दुकानदार से कहते है हमें इसी थैली में खाने पीने का सामान दे दो. अगर हमारे पास बर्तन नहीं हों तो हम जैसे वर्गों के लिए होटलों पर अलग से बर्तन रखे होते है जिन्हें इस्तेमाल के बाद हमें सुरक्षित कोने में धोकर रख दिया जाता है.
पूनाराम मेघवाल: दोहरा भेदभाव
पूनाराम भी जातिगत भेदभाव के शिकार रहे हैं
पाकिस्तान के सूबा सिंध से आए पूनाराम मेघवाल खुद दलित है और सिंध के सांगड़ ज़िले में उनकी परवरिश ऐसे ही माहौल में हुई है. पूनाराम ने वहां धार्मिक और जातिगत दोनों तरह का भेदभाव अपनी आंखों से देखा है.
वे कहते हैं दलितों और भीलों के साथ ऊंची जाति के हिंदू और मुसलमान दोनों भेदभाव करते हैं. किसी भी की चाय की दुकान या होटल पर जाते ही हमें कहा जाता है कि आपके लिए अलग से बर्तन रखा है, उसे उठाओ काम में लो और साफ़ कर के वापिस रख दो. मुसलमान हमारे साथ मज़हब के आधार पर और हिन्दू जाति के हिसाब से भेद करते थे. ये सब भील, मेघवाल और कोली जातियों के साथ होता है. वहां ऊँची जाति के हिन्दू और मुसलमानों में मेल मिलाप होता है.
लूना बाई: घूंघट की ओट से देखी पक्षपात
लूना बाई जोधपुर में एक शिविर में रह रही हैं
लूना बाई क़रीब दो महीने पहले सिंध के मटियारी ज़िले से भारत आईं और फिर जोधपुर में सीमांत लोक संगठन द्वारा संचालित शिविर में पनाह ली है. वो जाति से भील हैं. बातचीत के दौरान लूना बाई का चेहरा परदे में रहा मगर उन्होंने घूँघट की ओट से भी इस भेदभाव को अपनी आँखों में दर्ज किया है. वो कहती हैं उनके साथ हिन्दू और मुसलमान दोनों ही भेदभाव करते थे. हिन्दुओं में व्यापारिक और शासक वर्ग की जातीयां उनके साथ भेदभाव किया करतीं थीं.
उनके अनुसार, '' 'हमें तो सभी हिक़ारत की नज़र से देखते थे चाहे हिन्दू हो या मुसलमान. हम जहां भी जाते हमसे कहा जाता है आगे चलो. चाहे वो गांव हो या अस्पताल हमसे से दूरी रखी जाती थी. बस में सफर के दौरान भी हमसे दूर बैठने को कहा जाता.
प्रकाश मेघवाल: छोटी जातियों के साथ परेशानी
प्रकाश भारत की नागरिकता पाने की कोशिश में हैं
सरहद के उस पार पाकिस्तान का मीरपुर ख़ास ज़िला है. वहां पले-बढ़े प्रकाश मेघवाल अब भारत की नागरिकता पाने की कोशिश कर रहे हैं. वे कहते हैं उन्होंने अपनी बिरादरी के साथ मज़हब और जाति के आधार पर भेदभाव को शिद्दत से महसूस किया है.
वे कहते हैं, ''छोटी जातियों को हर स्तर पर भेदभाव झेलना पड़ता है. मुसलमान कहते हैं तुम हिन्दू हो, ऊँची जाति के हिन्दू कहते हैं तुम नीची जाति के हो. वहां ये दोहरा भेदभाव महसूस किया है तभी तो यहां आए हैं.चाय की दुकान पर छोटे शहरो में जाते ही जाति के बारे में पूछा जाता है, फिर बताया जाता कि आपके लिए कप वहां रखे हैं. हां बड़े शहरों में ये पता नहीं चलता कि हम किस जाति के हैं इसलिए वहां ये दिक्कत नहीं आती थी.''
चेतनराम भील: कारोबार में भी भेदभाव
चेतनराम भील सिंध प्रांत में टेंपो चलाया करते थे
चेतनराम भील पाकिस्तान के सिंध में हैदराबाद ज़िले में रहते थे. उन्होंने भी हाल ही में भारत का रुख़ किया है. वे वहां दो टेंपो के मालिक थे. वे कहते हैं उनके वाहनों में अगर कोई सवारी बैठती तो कट्टर धर्मिक मिजाज़ के लोग कहते कि काफ़िर की गाड़ी में नहीं बैठना चाहिए. भारत आने के हफ्ते भर पहले उनके पिता का निधन हो गया था. चेतनराम कहते हैं कि उनके पिता के पार्थिव शरीर के लिए दो गज ज़मीन के लिए बहुत मिन्नतें करनी पड़ीं थी.
पाकिस्तान से आए इन दलितों में कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने ने ये कहते हुए अपना दर्द साझा नहीं किया कि ऐसा करने से पाकिस्तान में उनके रिश्तेदारों पर ज़ुल्म ढाया जाएगा.