बुधवार, 28 सितंबर 2011

नारी को कितना सहना होता,सिर्फ नारी ही जानती


घर से बाहर निकलती,
मिठाई पर मक्खियाँ भिनकती
वैसे ही मनचलों की नज़रें
उसे घूरती
खाने को लपलपाती रहती
कहीं से सीटी बजती,
कभी कोई फब्ती सुनाई देती
हवास के दीवानों से बचती बचाती
सहमती हुयी,,किसी तरह बस पकडती
बस में भी बहुत कुछ सहती

उसके पास बैठे, उम्मीद में
हर निगाह गिद्ध सी द्रष्टि से देखती
कोई कोहनी शरीर को छूती
किसी हाथ की नापाक हरकत होती
वो निरंतर खून का घूँट पीती
किसी तरह बर्दाश्त करती
उसे नारी क्यूं बनाया
परमात्मा से सवाल करती
सकुशल गंतव्य पर पहुँचने की
दुआ करती
निरंतर आशंकित सहमती
जीवन जीती जाती
खुश किस्मत अपने को मानती
जब तक किसी गिद्ध के चंगुल में
ना फंसती
नारी को कितना सहना होता
सिर्फ नारी ही जानती
डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर" "GULMOHAR"
H-1,Sagar Vihar
Vaishali Nagar,AJMER-305004
(डा. राजेंद्र तेला निरंतर पेशे से दन्त चिकित्सक हैं। कॉमन कॉज सोसाइटी, अजमेर के अध्यक्ष एवं कई अन्य संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। समाज और व्यक्तियों में व्याप्त दोहरेपन ने हमेशा से उन्हें कचोटा है । अपने विचारों, अनुभवों और जीवन को करीब से देखने से उत्पन्न मिश्रण को कलम द्वारा कागज पर उकेरने का प्रयास करते हैं। गत 1 अगस्त 2010 से लिखना प्रारंभ किया है।) उनका संपर्क सूत्र है:- rajtelav@gmail.com www.nirantarajmer.com www.nirantarkahraha.blogspot.com

हमारे यहां शुद्ध व ताजा दूध मिलता है !

आपतो जानते ही है कि आजकल नौकरियां आसानी से मिलती नही
इसलिए नई नई बन रही वैध-अवैध कॉलोनियों में मकान भी बन रहे है और
खूब दुकानें भी खुल रही है. संयोग की बात देखिए ऐसी ही एक नई बसने
वाली कॉलोनी में एक छोटा सा मार्केट बनना षुरू हुआ और उसमें नुक्कड से
छठंे नम्बर की दुकान में एक दूधवाले ने अपना काम धन्धा षुरू किया. धीरे-धीरे
वह मषहूर होने लगा और कॉलोनीवाले भी उसे छठे नम्बर की दुकान से जानने
लगे. कई लोगबाग, गृहस्थी की महिलाएं अक्सर ही अपने बच्चों को यह कह
कर दूध लेने भेज देती कि जा, छठी का दूध लेआ. हालांकि छठी का दूध याद
आ जाना मामूली बात नही है बहरहाल दुकानदार की दुकान चलने लगी तो पास
पडौसवालों ने सलाह दी कि दुकान का साइनबोर्ड बनवालो. रोज रोज की
टोकाटोकी से तंग आकर कुछ दिन बाद दुकानदार ने एक साइनबोर्ड बनवाने की
सोची जिस पर यह लिखा जाना था
‘हमारे यहां षुद्धुद्ध एवं ताजा दूध्ूध मिलता है’ै’
उसने पेंटर से बात की, पेंटर बोला लिखने को तो मैं आप जो कहोगे वह
लिख दूंगा लेकिन आपने दूध की दुकान खोली है तो दूध बेचोगे ही कोई खैरात
तो बांटोगे नही इसलिए मेरी राय में तो ‘मिलता है’ षब्द की जगह ‘बिकता है’
लिखवाये ंतो ज्यादा सही रहेगा, आगे जैसी आपकी इच्छा. दुकानदार को पेंटर
की सलाह जंच गई और उसी के अनुसार नया बोर्ड बनकर टंग गया जिस पर
लिखा था ‘हमारे यहां षुद्धुद्ध एवं ताजा दूध्ूध बिकता है’ै’
लेकिन जैसा कि आप जानते है भाई लोगों को किसी तरह भी चैन नही
है. आप दुनियां में चलकर देख लीजिए, जैसेही बोर्ड टंागा गया पास पडौसवाले
मांगे-बिन मांगे तरह तरह के सुझाव सलाह देने लगे. ऐसे ही एक सज्जन आए
और दुकानदार से कहा ‘मियां ! आपने यहां मार्केट में दुकान खोली है यह बात
सबको मालुम है और आप यहां दूध बेच रहे है यह भी सब जानते है फिर
आपने बोर्ड पर यह ‘हमारे यहां’ षब्द क्यों लिखवाया है ? जो कुछ है आपके
यहां ही है. कही और थोडेही है इसलिए मुझे तो यह अनावष्यक जान पडता हैकृ
पा करके ‘हमारे यहां’ं’ षब्द को हटवादे तो अच्छा रहेगादुकानदार
को यह बात जंच गई. उसने पेंटर को बुलाकर कहा ‘भाईजान
! इस साइनबोर्ड पर से ‘हमारे यहां’ षब्द को हटादेंपेंटर
अब बोर्ड पर लिख लाया ‘षुद्धुद्ध एवं ताजा दूध्ूध बिकता है’ै’
कुछ दिन ग्राहक आते जाते रहे. बोर्ड की तरफ देखते और मुस्कराते. एक
दिन इनमे से एक ग्राहक से रहा नही गया तो सौदा लेने के बाद उसने
दुकानदार से कहा कि यहां मार्केट में जितने भी दुकानदार है सभी अपना2 माल
बेचते है ऐसे ही आप भी दूध बेचते है कोई फोकट में तो देते नही फिर इसमे
लिखने जैसी क्या बात है ? दुकान परतो चीजें बेची ही जाती है अतः आप मेरी
मानो तो बोर्ड परसे ‘बिकता है’ षब्द हटवादें, नाहक ही इतना बडा बोर्ड बनवा
लिया है उल्टा भद्धा और लगता हैदुकान
मालिक भ्रम में पड गया. इतनी बडी सलाह और वह भी बिना
मांगे मुफत में, ऐसा तो मेरे देष में ही हो सकता हैं. उसने उसी समय पेंटर को
बुलाकर सारी बात समझाई और अब नया बोर्ड बनकर आ गया जिस पर लिखा
था ‘षुद्धुद्ध एवं ताजा दूध्ूध’
एक बात ओैर, आजकल हर कॉलोनी में कई छोटे मोटे छुटभैये नेता
कुकरमुत्तें की तरह पैदा होगए है. यह लोग आए दिन हर समस्या पर अखबारों
में स्टैटमेन्ट देते रहते है. हर किसी को तरह तरह की सलाह देना भी इनका
काम है. ऐसे ही एक नेता इस कॉलोनी में भी हैं. एक रोज वह दूध की इस
दुकान पर आ पहुंचें और दुकानवाले से बोले ‘भाई साहब ! आपने अपनी दुकान
पर लगे बोर्ड पर ‘दूध्ूध’ षब्द के पहले यह ‘षुद्धुद्ध एवं ताजा’ षब्द क्यों लिखवाया
है ? इससे तो उल्टा लोगो को षक हो रहा है कि गोया यह षख्स दुकानदार
षुद्ध एवं ताजा दूध ही देता हैे या इसका इरादा कुछ और ही हैे ? मेरी मानो तो
इस बोर्ड परसे ‘षुद्ध एवं ताजा’ षब्दों को हटवादें वरना खामेखा लोगों को षक
होगाअब
दुकानदार घबराया. उसे लगा कि नेताजी ठीक ही कह रहे होंगे
इसलिए उसने तुरन्त बोर्ड को उतरवाया और स्वयं ठेले पर लादकर पेंटर के
पास ले गया और इस बार जो बोर्ड लाकर टांगा गया उस पर लिखा था सिर्फ
एक षब्द ‘दूध्ूध’
अब ग्राहक आते और पहले दुकान के उपर झांकते जहां बोर्ड पर लिखा
था ‘दूध’ ओर उधर नीचे दुकानदार दूध बेच रहा होता. एक बार उसके पडौसी
ने उसे समझाया कि भाई साहब ! यह क्या नाटक कर रहे हो ?
क्यों क्या हुआ ? दूधवाले ने कहा
उपर बोर्ड पर आपने लिखा हुआ है ‘दूध्ूध’ और इधर नीचे आप दूध बेच
रहे है. सबको दिख रहा है, इसमें बोर्ड पर लिखवाने जैसी क्या बात है ? मेरी
मानो तो दूध षब्द लिखवाने की जरूरत ही नही हैइस
पर दुकानदार ने दूध षब्द ही क्या बोर्ड ही हटवाने का ईरादा बना
लिया क्योंकि बिना कुछ लिखवायें बोर्ड टंगवाता तो और किसी के षक के घेरें में
आता. इस तरह लोगों ने बेचारे का पूरा साइनबोर्ड ही हटवा दियाकुछ
दिनों तो ऐसे ही चला लेकिन पब्लिक कहां चुप बैठने वाली थी.उनमे
से कुछ ने पहले कानाफूसी की फिर दुकानदार से कहाकि मियां दुकान पर बोर्ड
तो लगवाइये बिना बोर्ड के दुकान का ‘षो’ नही आता. ग्राहकों को पता नही
पडता कि आपकी दुकान में क्या क्या बिकता है ?
अब आप ही बतायें कि बेचारा दुकानदार क्या करें ?
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 9873706333

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

कुछ कुंठाएं जीवन भर दबी रहती


कुछ कुंठाएं
जीवन भर दबी
रहती
बुल बुले सामान
उठती फूटती रहती
निरंतर मन को
विचलित करती
कैसे बाहर निकले?
कोशिश चलती रहती
कोई पथ दिख दे
मन की बात समझ ले
इच्छाएं पूरी करा दे
आँखें निरंतर
खोज में लगी रहती
कुंठा रहित
जीवन की इच्छा
अंतिम सांस तक
समाप्त नहीं होती
कुछ कुंठाएं
जीवन भर दबी
रहती
डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर" डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर" (डा. राजेंद्र तेला निरंतर पेशे से दन्त चिकित्सक हैं। कॉमन कॉज सोसाइटी, अजमेर के अध्यक्ष एवं कई अन्य संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। समाज और व्यक्तियों में व्याप्त दोहरेपन ने हमेशा से उन्हें कचोटा है । अपने विचारों, अनुभवों और जीवन को करीब से देखने से उत्पन्न मिश्रण को कलम द्वारा कागज पर उकेरने का प्रयास करते हैं। गत 1 अगस्त 2010 से लिखना प्रारंभ किया है।) उनका संपर्क सूत्र है:- rajtelav@gmail.com www.nirantarajmer.com www.nirantarkahraha.blogspot.com

रविवार, 25 सितंबर 2011

ऐसे थे हमारे हैड साहब !

हमारे दफतर के बडे बाबूजी यानि हैड साहब यथा नाम तथा गुण थे. हैड
साहब नौकरी लगने के दिनों से ही हर काम में अपनी दिमागी कसरत किया
करते थे. अकसर सरकारी कार्यालय की परम्परा के अनुसार नए नए लगे
बाबूओं को रिसिप्ट-डिस्पैच-पत्र भेजने व प्राप्त करने-के कार्य में लगाया जाता हैं,
इसलिए जब हैड साहब को, हालांकि तब वह हैड नही थे, इस काम में लगाया
गया तो उन्होंने यहां भी अपना दिल दिमाग एक कर दिया. ष्यहां तक कि
उसका असर उनके घर पर भी पडने लग.
एक बार वह किसी के निमंत्रण पर सांयकाल का भोजन करने कही गए,
जाते वक्त घरवाली से कह गए कि तुम खाना खा लेना. जब वह वापस लौटे तो
घरवाली भी खाने के काम से निपट चुकी थी. हैड साहब जब सोने की तैयारी
कर रहे थे, तभी उनका कोई मित्र बाहर से उनके घर आ गया. हैड साहब ने
औपचारिकतावष उससे खाने का आग्रह किया और इस बाबत अपनी बीबी से
बात की. जब उन्हें मालूम हुआ कि बीबी ने कोई रोटी बचाकर नही रखी है तो
वे काफी नाराज हुए. उन्होंने चिल्ला चिल्लाकर सारा पास पडौस इकटठा कर
लिया. उनका कहना था कि जैसे ऑफिस में पत्रों की ‘ओसी’ -ऑफिस कॉपी
अर्थात बचा हुआ पत्र- रखी जाती है तो घर में भी रोटियों की ‘ओसी’ रखी
जानी चाहिए ताकि सनद रहे और वक्त बेवक्त काम आएंरिसीप्ट-
डिस्पैच के बाद उन्हें कार्यालय की लेखा षाखाके बजट बनाने के
काम में लगाया गया था. उन्ही दिनों एक अन्य सैक्षन के ऑफीसर ने इन्हें
बुलाकर पूछा कि तुम क्या काम करते हो ? इस पर इन्होंने तत्काल अपनी बुद्धि
का परिचय देते हुए उत्तर दिया कि सर ! मुझे ‘बुडजट’-बजट- बनाने का कार्य
दिया गया हैं. ऑफीसर ‘बुडजट’ षब्द सुनकर पहले तो थोडा अचकाया लेकिन
बाद में उसे जब बात समझ आई तो वह मुस्कराए बिना नही रह सका और
बोला कि अच्छा-अच्छा आप ‘बुडजट’ बनाते हैं.
पहले नौकरी, फिर षादी की सीढी दर सीढी चढते हुए जब उन्हें पुत्र रत्न
की प्राप्ति हुई तो उन्होंने बडे जोष-खरोष से अपने साथियों को दोपहर के खाने
पर न्यौता दिया. प्रत्येक को निमंत्रण देते हुए कहा कि कल दोपहर हमारे यहां
‘डिनर’ हैं आपको जरूर आना हैं. इधर दोस्तों ने भी जवाब दिया ‘आएंगे भई,
जरूर आएंगे. कल आपके यहां ‘दोपेपहर के डिनर’ पर अवष्य आएंगे’.
नौकरी के ही षुरूआती दिनों की बात है, एक बार एक ऑफीसर को
किसी सरकारी आदेष की प्रति देखनी थी. उन्होंने अपने हैड साहब को बुलाकर
कहा कि आप 5 मई 1969 का सर्कुलर लेकर आओ. अब हैड साहब सारे
कार्यालय में इधर उधर खूब घूम लिए लेकिन उन्हें ऐसा कोई भी पत्र नही मिला
जो, उनकी समझ से, सर्कुलर-गोलाकार- हो, सारे सरकारी कागज पत्र
आयताकार थे. आखिर हार थककर उन्होंने अपनी षंका अपने एक साथी से
जाहिर की कि फाइलों में तो सभी पत्र आयताकार है, सर्कुलर तो एक भी पत्र
नही है, जबकि साहब 5 मई का सर्कुलर मांग रहे है. उनके साथी ने मुस्कराते
हुए उन्हें समझाया कि सरकार के किसी आदेष विषेष को जो सब कार्यालयों
को भेजा जाता है उसे सर्कुलर कहते हैं.
एक बार हैडसाहब को बस द्वारा नजदीक ही किसी जगह जाना था.जब
उस जगह बस पहुंची, तभी वहां उतरने के लिए वे अपनी सीट से उठे. उसी
समय उनके ऑफीसर जिन्हें अचानक किसी काम से कही जाना था बस में घुसेऑफीसर
ने ज्योंही उन्हें सीट से उठते हुए देखा तो षिष्टाचारवष कन्धा
पकडकर बैठा दिया कि अरे-अरे बैठो-बैठो. आग्रह के बावजूद ऑफीसर खडे
रहे. थोडी देर बाद बस अगले स्टॉप पर पहुंची तो हैड साहब फिर उतरने के
लिए अपनी सीट से उठे, लेकिन इस बार फिर ऑफीसर ने उन्हें फिर सीट पर
बैठा दिया. जब बस रवाना हुई तो उन्होंने हैड साहब से पूछा कि ‘आप कहां
जा रहे है ?’
इस पर हैड साहब ने बताया कि ‘मुझे तो पिछले स्टॉप पर ही उतरना
था, आपने मुझे जबरदस्ती वापस बैठा दिया’.
उन दिनों हैड साहब की पोस्टिंग विभाग के मुख्यालय में थी औेर विभाग
में आमूलचूल परिवर्तन होने वाले थे. विभाग बोर्ड के रूप में बदलनेवाला था. जो
भी मुख्यालय में आता बोर्ड की ही चर्चा करता और पूछता कि बोर्ड कब तक
बन जायगा. संयोग से उन्ही दिनों मुख्यालय में भंवरलाल नामक कारपेंटर भी
काम कर रहा था. उसे चीफ इंजीनियर के कमरे में टांगने हेतु लकडी का एक
बोर्ड बनाने हेतु कहा गया था. एक रोज बाहर से एक अधिकारी आया और
बोर्ड के बारे में पूछने लगाा कि बोर्ड कब तक बनेगा ? इस पर हैड साहब ने
बताया कि पिछवाडे भंवरलाल से जाकर पूछ लो कि बोर्ड कब तक बन जाएगाहैड
साहब अपने ऑफीसरों के आदेषों का पालन करने में बडे पाबंद थे
ओैर अक्षर-अक्षर उनका पालन करते थे. एक बार उनके ऑफीसर ने उन्हें
किसी दूसरें स्थान से टं्ककॉल पर कहा कि मैं बस से आ रहा हंू या तो मैं
सांयकाल 6.00 बजे पहुंचूंगा या रात 9.00 बजे, इसलिए ड्ाईवर को बस
स्टैन्ड भेज देना वह देख लेगा. हैडसाहब ने ड्ाईवर को बुलाकर आदेष दिया कि
तुम्हें साहब को लेने बस स्टैन्ड जाना हैे तथा साहबने सांय 6.00 बजे अथवा
रात्रि 9.00 बजे आने को कहा हैं. दोनो ही समय जाकर देखना हेैं. ड्ाईवर
द्वारा यह कहने पर कि मैं 6.00 बजे साहब को लेने पहुंच जाउॅगा और साहब
आ गए तो ठीक वर्ना 9 बजे जाकर देख लूंगा तो हैड साहब ने उससे कहा कि
6.00 बजे भी जाना हेै और 9.00 बजे भी. चाहे साहब 6.00 बजे आएं
चाहे न आएं, साहब का आदेष हैंसमय
के साथ साथ हैडसाहब का काम बढने लगा. वह अक्सर
मिलने-जुलने वालों से कहा करते थे कि ‘मैं आजकल बहुत बूषी-बिजी-हूं’.
इंगलिष में ‘व्यस्त’ माने ‘बिजी’ इस तरह लिखा जाता है कि कम पढा लिखा
व्यक्ति उसे ‘बिजी’ की जगह ‘बूषी’ पढ सकता हैंउन्ही
दिनों उनके मातहत एक बाबू को कार्यालय में मच्छर दिखाई दिए,
उसने अपनी षिकायत लिखकर हैडसाहब को भिजवादी. हैडसाहब ने जब यह
नोटषीट देखी तो उस पर कई प्रष्न पूछ डाले. मसलन मच्छर एक था या कई
कई थे ? वे आज ही दिखाई दिए या पहले भी दिखाई दिए थे ? वे गजेटेड थे
या नान गजेटेड थे ? सीधी भर्ती वाले थे या प्रमोटी थे ? वे कही से ट्ांसफर
होकर तो यहां नही आए ? उनकी ज्वायनिंग रिर्पोट कहां है ? इत्यादि इत्यादि
कई प्रष्न उन्होंने पूछ डाले और मसला फाइलों में ही दबकर रह गयाइसी
तरह एक बार कार्यालय के रिकार्डकीपर को कार्यालय में एक चूहा
दिखाई दिया. उसने पहले तो मौखिक रूप् से हैड साहब को बताया लेकिन उनके
द्वारा जाकर दिए जाने पर रिकार्डकीपर ने उन्हें लिखकर दिया कि रिकार्ड में एक
चूहा दिखाई दिया हैं. अगर वह ऑफिस का रिकार्ड खा गया तो उसकी समस्त
जिमेवारी आपकी, यानि हैड साहब की, होगीहैड
साहब ने इस मामले को गंभीरता से लिया. उन्होंने ऑफीसर को
नोटषीट पर लिखकर भेजा कि कार्यालय के रिकार्ड में एक चूहा देखा गया है,
हो सकता है कि वहां चूहों ने कोई अवैध कॉलोनी बना ली हो अतः इस बारें में
नगर परि द तथा यूआइटी को तत्काल कार्यवाही के लिए लिखना उचित होगाहैड
साहब ने सोचा कि एक बार वहां से जवाब आ जाए तो आगे कार्यवाही
करें. इधर दूसरें ही रोज सफाई करते हुए रामू सफाई वाले को रिकार्डरूम में
चूहा दिखई दिया तो उसने अपनी झाडू से तत्काल उसे ठन्डा कर दियाकायर्
ालय की चाहरदिवारी पर प्रवेष हेतु एक बडा गेट एवं उसके साथ ही
एक छोटा गेट भी था. अकसर बडे गेट से वाहन एवं छोटे गेट से पैेदल लोग
प्रवेष किया करते थे. एक बार की बात है कि छोटे गेट की चाबी चौकीदार से
खोगई इसलिए वह उसे खोल नही पाया सिर्फ बडा गेट ही खुला था. जब हैड
साहब कार्यालय आए तो रोज की तरह उन्होंने छोटेगेट से प्रवेष करना चाहा
लेकिन वह बन्द था. उन्होंने चौकीदार को बुलाया और गेट नही खुलने का
कारण जानना चाहा जब चौकीदार ने उन्हें बताया तो उन्होंने कहा कि अब
लोग अंदर कैसे आएंगे ?
इस तरह के सैकडों किस्सें लिए हैड साहब कुछ ही दिनों पूर्व रिटायर हुए हैंई.
षिव षंकर गोयल
फलेट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स
सोसायटी, प्लाट न. 12, सैक्टर न.10,
द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 9873706333

कोई मोहब्बत ना करे


आशिक ने दम तोड़ा
लोगों ने घर का
दरवाज़ा तोड़ा
लाश को बाहर निकाला
दाढी बड़ी हुयी थी ,
सूरत पिचक गयी थी
आँखें गड्डे में धंस गयीं थी
निरंतर भूखे रहने से
जिस्म कंकाल हो गया था
कमरे में देखा तो
चंद सूखे हुए फूल
करीने से रखे थे
ढेर सारे खत कमरे में
बिखरे पड़े थे
हर दीवार पर माशूक का
नाम लिखा था
कमरा उसकी
तस्वीरों से भरा था
अंतिम इच्छा का
एक खत
अलग से पडा था
उसमें लिखा था
सारे फूल ,
सारे खत,सारी तसवीरें
मेरे साथ दफ़न कर देना
मेरी मज़ार पर लिख देना
कोई मोहब्बत ना करे
करे तो बेवफायी से ना डरे
अंजाम के लिए तैयार रहे
मेरी कब्र की बगल में
तुम्हारी भी कब्र बना लेना
मोहब्बत की कीमत
तुम भी चुका देना

डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"
डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर" (डा. राजेंद्र तेला निरंतर पेशे से दन्त चिकित्सक हैं। कॉमन कॉज सोसाइटी, अजमेर के अध्यक्ष एवं कई अन्य संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। समाज और व्यक्तियों में व्याप्त दोहरेपन ने हमेशा से उन्हें कचोटा है । अपने विचारों, अनुभवों और जीवन को करीब से देखने से उत्पन्न मिश्रण को कलम द्वारा कागज पर उकेरने का प्रयास करते हैं। गत 1 अगस्त 2010 से लिखना प्रारंभ किया है।) उनका संपर्क सूत्र है:- rajtelav@gmail.com www.nirantarajmer.com www.nirantarkahraha.blogspot.com

शनिवार, 24 सितंबर 2011

मेरी बात सुनकर दांत मत दिखाइये

बताते हैं कि किसी स्थान पर एक परिवार की चार पीढिय़ां गुजर गईं, लेकिन परिवार वालों के दांत नहीं उगते हैं। यह बडी दिलचस्प खबर है। आप तो जानते ही हैं कि दांत शरीर के अन्य अवयवों के मुकाबले में ज्यादा ही धोखेबाज होते हैं। जन्म के समय आपके साथ आयेंगे नहीं, चोला छोड़ोगे तब तक साथ रहेंगे नहीं और तो और बीच में भी एक-दो बार अपना रंग-रूप बदल देंगे। अब आप ही बताइये ऐसों का क्या विश्वास, क्या ठिकाना?
इस बारे में गोस्वामीजी ने रामायण के सुन्दर कांड में इसका खुलासा किया है। जब हनुमानजी सीता माता की खोज में लंका गए थे, तब वहां उनकी मुलाकात विभीषण से होती है। दोनों में वार्तालाप होता है। पहले हनुमानजी अपना परिचय देते हैं, उसके बाद विभीषण अपनी बात उनको बताता है और कहता है:-
'सुनउं पवनसुत रहिन हमारी,
जिमि दसनन्हि महु जीभ बिचारीÓ
अर्थात हे! हनुमानजी हमारा रहना भी क्या रहना? हम तो लंका में ऐसे रहते है जैसे दांतों के बीच में जीभ रहती है। विद्वान लोग इस बात का कई प्रकार से गूढ़ अर्थ निकालते हैं और बताते हैं कि विभीषण ने अपनी उपमा जीभ एवं दांतों की उपमा राक्षसों से क्यों की? सब जानते हैं कि दांत दगाबाज होते हैं, सर्वथा साथ नहीं देते और बीच-बीच में अपना स्वरूप बदलते रहते है। दांतों का काम चीरना, फाडऩा, कुचलना है और ये सभी लक्षण राक्षसों के हैं। अब बताइये कि अगर किसी परिवार को अपने आप दांतों अर्थात राक्षसों से छुटकारा मिल गया तो उसे तो अल्लाह का शुक्रगुजार होना चाहिए न?
यह भी सब जानते हैं कि दांत नहीं होने की वजह से व्यक्ति को अधिकतर किसी न किसी पेय पर निर्भर रहना पड़ता है। यह तो उल्टे अच्छी बात है। इक्कीसवी सदी में चारों तरफ तरह-तरह के पेय पदार्थों का जोर है। आए दिन टी.वी. पर अपने फिल्मी और क्रिकेट सितारे विभिन्न पेय की बोतलें लिए उछलकूद करते रहते हैं और कहते है 'ये दिल मांगे मोरÓ। इतना ही नहीं, एक टी. वी. विज्ञापन में तो विशेष पेय पदार्थ 'सोमरसÓ के लिए एक सितारा दावा करता है कि 'हम सोमरस पीनेवालों की बात ही कुछ और है।Ó हां भाई, वास्तव में आप पीने वालों की तो बात ही कुछ और है। सोमरस पीकर ही कई लोग बड़ी बडी 'बहादुरीÓ के कारनामे कर रहे हैं।
अगर किसी व्यक्ति के दांत नहीं हैं तो बचपन में किसी से झगड़ा होने पर किसी ने उसे धमकी नहीं दी होगी कि तेरी बत्तीसी तोड़ दूंगा क्योंकि जब कोई चीज होगी ही नहीं तो तोड़ेगा क्या?
बत्तीसी की बात पर एक किस्सा याद आ गया। दो व्यक्ति लड़ रहे थे। तीसरा व्यक्ति आया और बीच में पड़ कर उन्हें छुड़ाने लगा। लड़ते-लड़ते पहला बोला मैं तेरे बत्तीस तोड़ दूंगा तो दूसरे ने कहा कि मैं चौंसठ तोड़ दूंगा। इस पर वहां खड़े तमाशबीनों में से एक ने पूछा कि दांत तो बत्तीस ही होते हंै, आप चौंसठ कैसे तोड़ दोगे तो उसने जबाब दिया कि बत्तीस मुझसे लडऩे वाले के और बत्तीस बीच में टपकने वाले के।
यह परिवार तो भाग्यशाली है जो इन सब से बच गया वर्ना रोज-रोज की धमकियां कौन सुने? बिना दांत वाला किसी पर भी चाहे जितना हंस ले, उसे कौन डांट पिला सकता है कि 'क्यों बत्तीसी दिखा रहे हो ?Ó उसे तो खूब जम कर हंसना चाहिए। दस तरह की स्टाइल है, किसी भी हास्य क्लब में जाकर यह स्टाइल सीख लें।
आदमी की जिन्दगी में दांतों की अमूमन एक उम्र मुकर्रर है। पहले दूध के दांत आयेंगे, फिर दूसरे दांत आयेंगे, फिर 16 से 18 की उम्र के बीच अक्ल दाढ़ आयेगी अर्थात उसमें अक्ल आनी शुरू होगी। बिना दांत वाले इस परिवार पर यह कोई पाबंदी नही है। सबसे बड़ा फायदा तो इस परिवार वालों को यह है कि यह हाथी और नेताओं की पंक्ति में नही हैं। हाथी के दो तरह के दांत होते हैं, खाने के और दिखाने के और। जैसे कई नेताओं के दो रूप होते हैं, दिखने के और एवं असली में कुछ और।
कहते हैं कि आदमी गुस्से में दांत पीसता है, लेकिन जब दांत होंगे ही नहीं तो क्या पीसेगा? और जब दांत पीसेगा नहीं तो गुस्सा जहां से आया था, वही चला जायेगा। बंदर और कभी-कभी आदमी दांतों से ही घुड़की, झूठ-मूठ का गुस्सा दिखाता है। दांत न होने की अवस्था में इस समस्या से भी बच गए। इन सब के अलावा बचपन में दांत निकलने से लेकर बुढ़ापे में दांत गिरने की अनगिनत-सी तकलीफों से भी सामना नहीं होगा., क्योंकि न होगा बांस तो न बजेगी बांसुरी। इसलिए अगर किसी परिवार में किसी के दांत नहीं आए हैं तो यह सुनकर आपको दांत दिखाने, खीसें निपोरने, की आवश्यकता नही है।
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 9873706333

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

कोई मेरे पंख लगा दे


कोई मेरे
पंख लगा दे
मुझे उड़ना सिखा दे
सपनों की दुनिया से
यथार्थ की दुनिया में
पहुंचा दे
मेरा भ्रम मिटा दे
मुझे सत्य से अवगत
करा दे
उद्वेलित ह्रदय को
प्रेम से भर दे
उदिग्न मन को
शांत कर दे
निरंतर चैन से
जीने दे
कोई मेरे

पंख लगा दे
मुझे उड़ना सिखा दे


कुछ लोग छिप कर मुस्काराते
कुछ लोग
छिप कर मुस्काराते
अकेले में याद करते
ख़्वाबों में खोते हैं
निरंतर खुद भी तड़पते
चाहने वालों को भी
तड़पाते
किस बात से शरमाते ?
क्यों इतना घबराते हैं ?
ज़ज्बात को छिपाते
कोई समझाए उन्हें
क्यों दर्द-ऐ-दिल
बढाते ?

जाने से अनजाने अच्छे जाने से
अनजाने अच्छे
देख कर मुस्काराते
ना शक रखते
ना कयास लगाते
ना खार खाते
ना मतलब ढूंढते
दिल की बात को
ध्यान से सुनते
निरंतर तहजीब से
पेश आते
ना उम्मीद करते ,
ना उम्मीद देते
खुशनुमा बातों से
होंसला बढाते
कुछ लम्हों के लिए
ही सही
दिल को सुकून देते
डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर" (डा. राजेंद्र तेला निरंतर पेशे से दन्त चिकित्सक हैं। कॉमन कॉज सोसाइटी, अजमेर के अध्यक्ष एवं कई अन्य संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। समाज और व्यक्तियों में व्याप्त दोहरेपन ने हमेशा से उन्हें कचोटा है । अपने विचारों, अनुभवों और जीवन को करीब से देखने से उत्पन्न मिश्रण को कलम द्वारा कागज पर उकेरने का प्रयास करते हैं। गत 1 अगस्त 2010 से लिखना प्रारंभ किया है।) उनका संपर्क सूत्र है:- rajtelav@gmail.com www.nirantarajmer.com www.nirantarkahraha.blogspot.com