शुक्रवार, 22 जून 2012

सूनी सूनी सी आँखे

क्यों इसकी आँखों में
उदासी की हैं झलक
क्यों इसका चहेरा ..
लगता हैं निहिर सा
एक बेचारगी लिए हुए 
इस छोटी सी उम्र में
कौन सा हैं दर्द.. ..
जो ये खुद में समेटे हुए हैं
आँखों में सपनों की जगह
क्यों हैं किस अपने के लिए
अश्को का बसेरा
इस बालपन में किसका
हैं इंतज़ार अब....
सूनी आँखे तकती हैं किस
राह को ...
किसका इसे अब हैं इंतज़ार....
कहाँ गई इसकी ...चिड़िया सी
चहचाहट ...
वो मस्ती का आलम ...
वो घर भर में धमा चौकड़ी करना
बात बात में ''अम्मा ..अम्मा ''
चिल्ला कर उसका पल्लू पकड़ना
कहाँ हैं इसके बचपन वो मासूमियत
क्यों इसकी सूनी आँखों में
प्यार की तड़प नज़र आती हैं
अब इसका ,किस दर्द से रिश्ता हैं
क्यों ,अपने ही दामन में अश्क बहाती हैं
वो एहसास उन हाथों के छूने का
जिस से ,इसकी दुनिया महफूज़ थी
आज इसकी इस खाली खाली सी जिंदगी में
इसके ''पितामहः'' की कमी
साफ़,नज़र आती हैं ||
अंजु (अनु) चौधरी ..करनाल..हरियाणा

मंगलवार, 5 जून 2012

काश तू आँचल का परचम बना लेती ......!

खातिर एकजुट हो रही हैं बांग्ला महिलाएं
उत्तर भारत के प्रमुख शहरों के घरों में काम करने वाली महिला कामगारों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. इनमे से ज्यादातर महिलाए बंगाल की है. जयपुर में ही इनकी संख्या कोई तीस हज़ार से भी अधिक है. इनके लिए कोई सेवा नियम नहीं है. लेकिन अब ये महिलाए अपने अधिकारों के लिए संगठित हो रही है.वे जगह-जगह बैठके कर रही हैं. इन महिलाओ के लिए उनकी पहचान बड़ा संकट बनी हुई है. उन्हें कई बार चोरी के इल्ज़ामों का सामना करना पड़ता है तो कभी उन्हें बांग्ला देशी करार दिया जाता है.घर-घर जाकर काम करती इन महिलाओं को समय मिला तो वे जमा हुई, सुख दुख बांटे और अपने हक़ के लिए नारे बुलंद किए.
किसी के भाल और कपाल पर उसकी राष्ट्रीयता नहीं लिखी होती. मगर जब भी कोई विवाद हुआ, इन महिलाओं को अपने ही वतन में बांग्ला देशी घोषित कर दिया गया.बिहार की गायत्री ने ये दंश कई बार झेला है.
पहचान
वो कहती हैं, ''मुझे दस बारह साल हो गए जयपुर में, मेरे पास न राशन कार्ड है , न मतदाता सूची में नाम है.मेरे जयपुर में रहने का कोई सबूत नहीं है.जहां भी काम करते है, हमें बांग्ला देशी कह कर पुकारा जाता है.आप बंगाल में जाकर पूछिए न हम कौन है, आप ममता बनर्जी से पूछिए ना."
गायत्री का कहना था कि जब महीने में चार छुट्टी की मांग करो तो बांग्लादेशी बता दिया जाता है.
यूं तो भूगोल ने बंगाल और राजस्थान में बहुत दूरिया पैदा की है.लेकिन इन घरेलू महिला कामगारों के जरिए एक बंगाल घरों के भीतर तक पहुंचा है.
कभी महारानी गायत्री देवी के वैवाहिक रिश्ते ने बंगाल और जयपुर के बीच संबधों का मजबूत सेतु खड़ा किया था क्योंकि वे कूच बिहार की थी मगर इन कामकाजी महिलाओं के लिए ये रिश्ता मजदूरी का है,मजबूरी का है.
बंगाल में कोलकात्ता से आई मंजू कहती है,''मुझे जयपुर में रहते सात साल हो गए ,लेकिन राशन कार्ड नहीं बनाया जा रहा है. हम चौबीस घंटे काम करते हैं,कभी यहां कभी वहां.एक एक औरत रोज़ पांच घरों में झाडु पोछा और चूल्हा चौका करती है.पहचान नहीं होने से बैंक खाता नहीं खुल सकता. मेरे परिवार में पांच लोग है. मकान मालिक डेढ़ दो हजार किराया ले लेता है. बच्चो को पढ़ाना मुश्किल है.''
हिकारत भरी निगाहें
गायत्री और मंजू बंगाल से हैं. मगर कमलेश तो राजस्थान की है. वो कहती है हमें बाई कह कर पुकारा जाता है और ये बड़ा अपमानजनक है. बैंक में खाता नहीं है लिहाजा दो तीन हज़ार जमा हो तो घर पर रखते है. मगर जब मकान मालिक के घर चोरी हो जाए तो वो पुलिस के साथ आते हैं और हमारी जमा पूंजी उठा ले जाते हैं. हम जानते है कि हम कैसे झूठन साफ़ कर पैसे जमा करते है. मकान मालिक लगातार किराया बढ़ाने का तकाजा करता रहता है.
भारत में कोई मोटर बंगला तो कोई सोने चांदी का तलबगार है. मगर इन औरतों की मुराद तो राशन कार्ड जैसे मुद्दों तक महदूद होकर रह गई है.
इन महिला कामगारों के संगठन की प्रमुख मेवा भारती कहती है, ''ये राशन कार्ड, वोटर कार्ड, बैंक में अकाउंट खुलवाने जैसी समस्याओ से जुझ रही हैं. इनके बच्चों के पास जन्म तिथि का सबूत नहीं होता, उन्हें बिना पहचान के स्कूल में दाखिला नहीं मिलता. महंगाई के हिसाब से मजदूरी नहीं बढती है. कार्य स्थल पर कई बार इन्हें बदसलूकी और इल्ज़ाम का सामना करना पड़ता है. इनकी संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. बंगाल से बराबर ऐसी घरेलू कामगारों का आना जारी है.''
इन महिलाओ का कहना था कि बंगाल में रोज़गार की कमी है.लिहाजा वो जयपुर जैसे शहरों का रुख करती है. ये महज औरत नहीं, उसकी हालत का बयान है. पर इसे कौन सुनेगा. काश, वो आँचल का परचम बना लेती और जमाना गौर से सुनता...
लेखक श्री नारायण बारेठ राजस्थान के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं और लंबे समय से बीबीसी से जुड़े हैं

पई की पांच महिला पंचों की अनूठी पहल


ग्राम सभा की ताकत समझी और चल पड़ी बदलाव की ओर
इन्होंने घूंघट त्यागा, रूढि़वादी विचारों को त्यागा, सामाजिक कुरीतियों को छोड़ा, बैठक की, महिलाओं को संगठित किया, शिक्षित हुई, अपने अधिकारों को जाना और आज ग्राम पंचायत में भागीदारी सुनिश्चित कर गांव के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। हालांकि ये सब आसानी से नहीं हुआ, दहलीज लांगी तो समाज के बुजुर्गों ने बंदिशे लगाई, पतियों ने मारपीट की, देवली (देऊ) बाई के पति ने तो कुल्हाडी से उसके सिर पर वार कर दिया। आंखों के आगे घूंघट रूपी पर्दा तो पीढिय़ों से पड़ा ही था उनके, जो उजाले की ओर बढऩे नहीं देता था। बढ़ती भी तो ढोकर खाकर गिर जाती या गिरा दी जाती थी। पर्दे ने अभिव्यक्ति की आजादी को भी दबाए रखा। लेकिन इन महिलाओं पर तो जुनून सवार था बदलाव का सामाजिक संगठन के संपर्क में आई, शिक्षित हुई और ग्राम सभा व ग्राम पंचायत की ताकत को समझा। फिर पंचायतीराज व आरक्षण का लाभ लिया, वो न सिर्फ प्रयासों में सफल रही है बल्कि अपनी भागीदारी भी सुनिश्चित की। देवली बाई कहती है कि लोग देखे तो भले देखे, मैं तो ग्राम सभा में जो कहना होता है बिना घूंघट के खुलकर कहती हूं, मैं घूंघट नहीं निकालती हूं, घूंघट निकालूं तो बोल नहीं पाती हूं।
उदयपुर से 20-25 किलोमीटर दूर के पई गांव की आदिवासी समुदाय की 5 महिलाएं (देवली बाई, कडौली बाई, चौखी बाई, रोड़ी बाई व सोमुदी बाई) बदलाव के लिए सतत प्रयास कर रही है। दो दशक पूर्व वे एक सामाजिक संस्था से प्रेरणा लेकर, बंदिशों से आजाद हुई और चुप्पी तोड़कर घर से बाहर निकली। वर्तमान में पांचों महिलाएं पई ग्राम पंचायत में वार्ड पंच है। देवली बाई 3 बार, कडौली बाई 3 बार, रोड़ी बाई 2 बार, चौखी बाई 4 बार तथा सोमुदी बाई 2 बार वार्ड पंच रह चुकी है। कडौली बाई तो पंचायत समिति सदस्य भी चुनी गई। इन महिलाओं ने अन्य महिलाओं को भी आगे लाने का प्रयास किया। इस बार वेलकी बाई को भी वार्ड पंच का चुनाव लड़वाया। ग्राम पंचायत में इनकी पूर्ण भागीदारी नजर आती है। कोरम में इनका बहुमत है। सभी एक सूर में गांव के विकास के लिए प्रस्ताव रखती है।
देवली बाई कहती है गांवों में पुरूषों की राजनीति थी, पंचायतों में उनका राज था, महिलाएं कभी पंचायत में पहूंच भी जाती थी तो घूंघट तान चुपचाप एक तरफ बैठी रहती थी। जब हम पहली बार चुनाव लड़ी तो लोगों ने कहा कि ''क्या कर लेगी ये घाघरी वाली पंचायत में जाकर।�� नयाफला गांव के भैरूलाल का कहना है कि वार्ड पंच महिलाओं का यह ग्रुप सरकार की विकास योजनाओं का लाभ लोगों तक पहूंचाने में कार्य कर रहा है। ग्राम पंचायत के कार्यों पर निगरानी भी रखती है। अन्य दिनों में गांवों में जाना, लोगों की समस्याओं को जानना एवं कोरम में उन समस्याओं के निराकरण करवाना ही इनका मुख्य कार्य है।
असाक्षर थी, साक्षरता कार्यक्रम से जुड़कर पहले खुद अक्षर लिखना-पढऩा सीखी और फिर गांवों की महिलाओं को पढऩे के लिए प्रेरित किया, बच्चे बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। संघर्ष किया और ज्ञापन दे दे कर आंगनबाडिय़ा व स्कूल खुलवाए। जनसमस्याओं के समाधान करना ही इनका मुख्य ध्येय बन गया है। यहीं कारण है कि क्षेत्र की करीबन 3000 महिलाएं इनसे जुड़ी हुई है। इन सभी ने मिलकर शराबबंदी का महत्वपूर्ण कार्य किया है। वन भूमि अधिकार, सूचना का अधिकार, रोजगार का अधिकार जैसे मुद्दों पर पांचों महिला पंचों ने सक्रिय भूमिका निभाई है। देवली बाई ग्राम पंचायत व पंचायत समिति से सूचना के अधिकार के तहत सूचनाएं लेती रहती है। देवली बाई पूरजोर से सूचनाएं मांगती है वो कहती है कि सूचना दो, अगर नहीं देते हो तो लिखकर दो कि सूचनाएं नहीं दे सकता। उसके सवाल सुनकर अधिकारी भी झेंप जाते है। वो कहती है कि सूचना लेने का हमारा अधिकार है, सूचना देनी ही पड़ेगी। कई बार तो उसके आवेदन लेने से ही इंकार कर दिया गया, दो मर्तबा आवेदन की रसीद नहीं दी। विकास अधिकारी ने तो कह दिया कि सूचना लेकर क्या करोगी ? लेकिन देवली बाई की तर्कसंगत बहस एवं जागरूकता के आगे अधिकारियों को झूकना पड़ा और उन्होंने आवेदन लिए और सूचनाएं भी दी। देवली बाई ने हाल ही में 27 फरवरी को सूचना के अधिकार के तहत आवेदन करके सूचना मांगी है कि ''उदयपुर से सराड़ा तक कितने लोगों की जमीन अवाप्त की गई है?��
देहाती वेशभूषा में देवली बाई जब वन भूमि अधिकार के पट्टों आदि के आंकड़े बताती है तो हर कोई चकित रह जाता है। बताती है कि पात्र 103 लोगों को पट्टे दिलवाए है, लगभग 400 आवेदनों पर कार्यवाही चल रही है। पेंशन योजनाओं के लाभ दिलवाने में सराहनीय कार्य इन्होंने किए है। पात्र महिलाओं के आवेदन करवाए। 2000 मजदूरों को मनरेगा के तहत काम नहीं मिल रहा था, इन्होंने बैठक की और जिला कलक्टर को अवगत कराया, संघर्ष की बदौलत उन्हें रोजगार मिला।
सरकार के 'प्रशासन गांव के संग अभियान�� की तरफदारी करते हुए कड़ौली बाई कहती है इस अभियान के तहत आयोजित शिविरों में लोगों के प्रशासन से संबंधित अधिक से अधिक कार्य करवाए जा सकते है। देवली बाई ने बताया कि गांव वालों की समस्याओं के समाधान करने में इस प्रकार के अभियान महत्वपूर्ण है। हमने इस कार्यक्रम के तहत लोगों की राशनकार्ड, जॉब कार्ड, पेंशन, प्रमाण पत्र, बिजली कनेक्शन, जमीन संबंधीत समस्याओं के समाधान करवाए है।
सरकार द्वारा संचालित विभिन्न कार्यक्रमों पर निगरानी का कार्य भी करती है। गांव में प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक समय पर नहीं आते थे तथा पूरे समय पर विद्यालय में नहीं रूकता था। देवली बाई को गांव की महिलाओं से जब ये जानकारी मिली तो शिविर में इस मुद्दे को उठाया। शिविर प्रभारी ने उस अध्यापक को हटाकर दूसरे अध्यापक को नियुक्ति करवा दी। उसके बाद से विद्यालय समय पर खुलता है और अध्यापक भी पूरे समय विद्यालय में रूकता है। इसके अलावा वो आंगनबाड़ी केन्द्रों में पोषाहार व विद्यालयों में मिल डे मिल का अवलोकन भी करती है। यहीं नहीं इन महिला पंचों ने साझे प्रयास कर पिपलवास, कुम्हारिया खेड़ा, सूखा आम्बा, निचलाफल, पाबा, किम्बरी में प्राथमिक विद्यालय भी खुलवाए है। विद्यालय खुलवाने के लिए बार-बार ज्ञापन दिए, जिला अधिकारियों से पैरवी की।
ग्राम पंचायत के वार्ड नम्बर 8 में विद्यालय भवन नहीं है, अध्यापक बच्चों को पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाता है, वहीं इस वार्ड में 30 से अधिक बच्चे है लेकिन आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है। आजकल पांचों महिला पंच विद्यालय भवन व आंगनबाड़ी केंद्र के लिए भवन की मांग कर रही है। हाल ही में 14 फरवरी को उन्होंने जिला कलक्टर को ज्ञापन देकर भवन निर्माण की मांग की है। भ्रष्टाचार की घोर विरोधी है ये पांचो पंच। इन्होंने सूचना के अधिकार का उपयोग कर पई ग्राम पंचायत द्वारा किए गए फर्जीवाड़े को उजागर किया। फर्जीवाडे के जानकारी मिलने बाद इन्होंने सामाजिक अंकेक्षण करवाने का प्रस्ताव रखा। सामाजिक अंकेक्षण किया और पाया गया कि ग्राम पंचायत द्वारा नाली निर्माण नहीं करवाया जबकि नाली निर्माण के नाम फर्जी बिल बाउचर का संधारण कर लाखों रुपयों का गबन कर दिया गया।
कडौली बाई कहती है कि जब हम पहली बार वार्ड पंच बनी तो लोग कहते थे ये क्या कर लेगी घाघरी वाली। लेकिन हमनें जो काम अब तक किए है उन्हें देखकर अब वहीं लोग हमें र्निविरोध वार्ड पंच बनाने लगे है। देवली बाई 3 बार वार्ड पंच रह चुकी है इस बार उसे र्निविरोध वार्ड पंच बनाया गया। रोड़ी बाई का कहना है कि हम किसी से नहीं रूकने वाली है। हम ग्राम पंचायत में न तो कुछ गलत करती है और ना ही गलत होने देती है।
इन महिलाओं को यह डगर सामाजिक संगठन आस्था के कार्यकर्ताओं ने कोई 25 वर्ष पहले दिखाई थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर यह सामाजिक संगठन नहीं होता तो इन महिलाओं के जीवन में परिवर्तन शायद ही संभव हो पाता। संस्था के लोगों ने इन्हें इनके अधिकारों की जानकारी दी, पंचायतीराज की जानकारी दी और साथ दिया। आज ये महिलाएं पंच बनकर ग्राम का विकास करवा रही है। ये महिलाएं घर की दहलीज पार कर चुकी है, इन्होंने रूढि़वादी विचारधाराओं को तोड़कर मिसाल कायम की है। ऐसा लगता है कि - अब ना मूंडेगी, ना रूकेगी ये उड़ चली है खुले गगन में . . .
Lakhan Salvi
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मंगलवार, 29 मई 2012

ALL SINDHIS HOPE ASSOCIATION AGENDA FOR SINDHIS WELFARE IN INDIA

1. To work for and create unity amongst sindhi community through out world and in India.
2. To work for Social , Educational, Economical and Political Awareness and upliftment programs amongst sindhis
3. To preserve the Constitutional right of sindhis to be declared by the central govt. of India and other states as sindhi community constitutional minority and 8% OBC being linguistic minority in India by amending the constitution.
4. To suggest the central govt. of India to allow those sindhis who are residing in Pakistan to migrate to India without visa in lieu of british govt’s treaty of 1947 of partition of borders and land between India and Pakistan as the land of Sindh has been handed over to Pakistan and land of India have been allotted to hindus of Pakistan when a Pakistani citizen after 50 years coming to India can claim his properties by Enemy property act of India then why Hindus of Pakistan can’t claim their homeland in India as per conditions of british govt’s treaty of 1947.
5. To construct a big building for Sindhu Bhawan at All India Level in the India’s capital Delhi to solve the problems of sindhi community.
6. To suggest the central and state govts to form sindhi development board at central and state levels to solve the constitutional problems of Social, Educational, Economical and Political fields of sindhi community.
7. To suggest the central govt. and state govts. Through sindhi community proposal to declare Cheti Chand (Birthday of God Jhulelal of Sindhi Community) as national holiday just like mahavir jayanti, janmashtmi, gurunanak jayanti, guru govind singh jayanti, gud Friday, ramnovmi, durga ashtmi etc.
8. To form and get register “All India Sindhis Welfare Trust” to work for sindhi community for their awareness and upliftment in Social , Educational, Economical and Political fields.
9. To survey through out India to form sindhi community’s own political party in India for their legal and constitutional survival rights.
10. To work for to safe guard and protect the culture, civilization, heritage and language of sindhi community on this earth and must hope for creation, formation and existence with rebirth of sindh or sindhi state of sindhi community.

Agenda Narrated by : Ashok Matai
Advocate Notary Public, Ajmer

शुक्रवार, 25 मई 2012

दो बूँद पेट्रोल की

यूपीए सरकार ने सत्ता में तीन साल पूरे होने के उपलक्ष में इस देश की आम जनता को कभी ना भूला जाने वाली सौगात दे डाली. शाम को पार्टी में यूपीए के घटक दलों के नेताओ व सांसदों को बिरयानी खिलाई और अगले ही दिन "सुबह सवेरे जनता का पेट्रोल (तेल) निकाल दिया". ऊपर से शाम होते-होते दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के वित्त मंत्रीजी ने इस पर एक तडकता-भड़कता डायलोग दे मारा - "हमारे (सरकार के) हाथ में कुछ नहीं है, हम कुछ नहीं कर सकते. कीमतें तेल कम्पनियाँ तय करती हैं." बाय गोड हमने इतने जिगर वाले वित्त मंत्री आज तक नहीं देखे, जो खुद कबूल कर ले की - हमारे हाथ में कुछ नहीं है. खैर, जनता बेचारी किस्मत की मारी (सॉरी, मिसटेक हो गयी) "जनता बेचारी यूपीए के पेट्रोल की मारी", उस दिन को कोसकर चुपचाप सो गयी - जिस दिन उन्होंने पेट्रोल से चलने वाली गाड़ी खरीदी थी. जनता व विपक्षी दलों ने सरकार को कोसना व घेरना शुरू कर दिया. सरकार ने अपनी तीन साल की उपलब्धियां गिनाते-गिनाते अपनी मजबूरियाँ गिनना शुरू कर दिया.
तभी, मुझे याद आया की हमरी सरकार के प्रधानमंत्रीजी तो दुनिया के सबसे बढ़िया वित्त मंत्रियों में से एक रह चुके हैं और उनकी अर्थशास्त्र का लोहा तो अच्छे-अच्छे मानते हैं. उनका साथ देने के लिए दादा प्रणब मुखर्जी , पी. चिदंबरम व कपिल सिबल सरीखी गुणी-विद्वानों की फ़ौज है. फिर भी हमारी और हमारे देश की अर्थव्यवस्था की यह हालत कैसे? चारों ओर महंगाई मूंह फाड़ रही है, सोने के भाव माथे पर चढ़ कर बैठे हैं, शेयर बाजार औंधा पड़ा है, रुपया बेचारा गिरता ही जा रहा है, पेट्रोल तोह आये दिन मूंह चिड़ाता रहता है - क्या इनका जवाब भी सरकार के पास यही है - हमारे हाथ में कुछ नहीं है.
भाईसाहब, सब्जी या फल-फ्रूट लेने जाओ तो ऐसा लगता है, मानो दुकानदार इनके भाव बताकर इस देश के आम नागरिक की माली हालत की हंसी उड़ा रहा हो. दूधवाला जब दूध का भाव बताता है तो खुद उसमे पानी मिला कर पीने का मन करता है. दालो-मसालों के भाव तो मानो मिर्ची लगाते प्रतीत होते हैं. आम आदमी तो चलो जैसे-तैसे जुगाड़ कर के दिन-पर-दिन गुजार रहा है, मगर गरीबों का हाल तो पूछो ही मत. हमारे देश में रोजाना ना जाने कितने ही लोग भूखे सोते हैं, मगर हमारे देश की धरती जो सोना उगलती है (अनाज) वो खुले में पड़ा सड़ रहा है. सरकार अनाज को खुल्ले में सड़ने देगी, बारिश में भीगने देगी, बोरियों के आभाव में गलने देगी - मगर इस देश की अभागी व भूखी जनता को नहीं देगी. ख़ैर, वित्त मंत्री साहब ने समझाया ना - सरकार के हाथ में कुछ नहीं है.
पहले ही महंगाई इस देश के आम आदमी का खून STRAW लगा-लगा कर चूस रही है. ऊपर से रुपया भी डॉलर के सामने सरेंडर हो चुका है. अब भैया, रूपये का भाव गिरेगा तो हिंदुस्तान का भाव कैसे बढेगा - समझाइये भला.रूपये का भाव गिरेगा तो भैया इलेक्ट्रोनिक आइटम्स, कच्चे तेल, मोबाइल, फ्रिज, टीवी इत्यादि के भाव तोह बढेंगे ही. उसके भी ऊपर, यदि पेट्रोल का भाव बढेगा तो भैया - अपनी तो टाय-टाय फिस्स. पेट्रोल के भाव के बढ़ते ही ट्रांसपोरटेशन कास्ट बढेगी जिससे आना और जान महंगा होगा, माल की आवाजाही महंगी होगी - फिर आम आदमी की जरुरत की हर चीज़ महंगी होगी. कल टीवी पर एक अंकलजी बोल रहे थे - "यह पेट्रोल किसने बनाया था? और बनाया भी तो बनाते ही उसमे आग क्यों नहीं लगा दी?" अब, उन अंकलजी को कौन समझाए की अगर पेट्रोल को बनाते ही उसमे आग लगा दी जाती, तो हमारी सरकार हमें कैसे चिढाती ? पेट्रोल (के भाव) में आग लगाने का काम तो सरकार का है, अंकलजी.
खैर, भैया यदि ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पल्स-पोलियो की खुराक की तरह पेट्रोल की खुराक भी दो बूँद में ही नसीब होगी - क्यूंकि उससे ज्यादा खरीदने की तो हैसियत नहीं रह जायेगी ना. पेट्रोल के भाव इसी तरह बढेंगे तो पोलियो रविवार की तरह पेट्रोल रविवार मनाने के दिन दूर नहीं रह जायेंगे. तब भैया, आप और हम पेट्रोल पम्प जाकर कहेंगे - "भाईसाहब, आज दिल बहुत खुश है और किसी महंगी चीज़ पर पैसे उड़ाने का मन कर रहा है इसलिए - दो बूँद पेट्रोल की टपका दो".
सादर अपील:- यदि लेख अच्छा लगा हो तो शाबाशी की जगह थोडा सा पेट्रोल भिजवा दें कम से कम गाडी तो चल जायेगी.
साकेत गर्ग लेखक, युवा ब्लोगर व सीए,सीएस के विद्यार्थी हैं
इ-मेल: sketgarg@gmail.कॉम / ब्लॉग: gargsaket.blogspot.com

मंगलवार, 22 मई 2012

रूहानियत के बादशाह ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती

अजमेर का नाम दुनिया भर में रोशन कर देने वाले सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का जन्म तो सीस्तान (अब अफगानिस्तान में) हुआ था लेकिन इनकी दरगाह इसी शहर में है। यहीं इनका सालाना उर्स मनाया जाता है जिसमें लाखों जायरीन अकीदत के फूल चढ़ाने आते हैं। आपका जीवनकाल सन् 1133 से 1243 ई. बताया जाता है (टेल्स ऑफ मिस्टिक ईस्ट, राधास्वामी प्रकाशन, पृ. 284) आपकी पीर परस्ती बेमिसाल थी। अपने पीर हजरत हारून चिश्ती को आपने अल्लाह मानकर उनकी खिदमत की।
एक बार हजरत उस्मान हारूनी अपने अनेक शिष्यों को लेकर धार्मिक यात्रा पर निकले। बीच में कहीं एक मंदिर आया। आप बोले - मैं भीतर जा रहा हूँ, तुम लोग बाहर मेरा इन्तजार करना। उधर आधे मुरीद तो उनके मंदिर में जाने से ही खफा होकर चले गए। फिर हुआ यह कि वे नौ माह तक भीतर ही रहे। उनकी प्रतीक्षा करते-करते बचे हुए सारे शिष्य थक कर चले गये, केवल मोईनुद्दीन चिश्ती ही वहां डटे रहे। मंदिर से बाहर आने पर उन्हें सच्चाई का पता चला। अपने उस अडिग मुरीद को उन्होंने गले लगाया और तत्काल भीतर से रोशन कर दिया। पीर ने उनको धीरे-धीरे रूहानियत के उच्चतम मुकाम पर पहुँचा दिया। यही कारण है कि आज लगभग आठ सौ साल बीत जाने के बाद भी दुनिया उनकी दीवानी है। एक लाख जायरीन प्रतिमाह उनके मजार पर सिर झुकाने आते हैं। हर शख्स की मुराद यहां पूरी होती है।
सुना जाता है कि एक बार आपने बड़े पीर साहब अब्दुल कादिर गिलानी के समक्ष कव्वाली सुनने की इच्छा जाहिर की। बड़े पीर साहब के कादरिया सिलसिले में कव्वाली का रिवाज नहीं था फिर भी उन्होंने ख्वाजा साहब की तमन्ना पूरी की - एक मृत कव्वाल की कब्र खोली, उसकी देह में रूह प्रविष्ट की, नहलाकर कपड़े पहनाए और उसे कव्वाली सुनाने का आदेश दिया। उस कव्वाल की अदायगी इतनी असरदार थी कि ख्वाजा साहब पर रूहानी मस्ती चढ़ गई। वे मस्ती में नाचने लगे। उनके 'हाल� से जमीन कांपने लगी। तब बड़े पीर साहब ने अपनी छड़ी जमीन पर टिकाकर धरती के कम्पन को स्थिर किया। ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व होने के फलस्वरूप ही ख्वाजा साहब का रूहानी वर्चस्व आज भी कायम है। अजमेर स्थित आपकी दरगाह का जर्रा-जर्रा चैतन्य है। यहां 800 वर्ष से लगातार विस्तारीकरण व सौन्दर्यीकरण का कार्य चल रहा है।
आरम्भ में यहां ख्वाजा साहब का केवल एक कच्चा मजार था। अजमेर के लोक समाज में ऐसी मान्यता है कि उस समय आसपास कुछ बड़े मंदिर व हिन्दू भवन थे जिन्हें पहले एबक और बाद में इल्तुतमश ने नष्ट कर दिया। ख्वाजा की मजार पन्द्रहवीं (1469 ई.) सदी के पूर्वाद्र्ध तक गुमनाम थी किन्तु 1455 ई. में यहां माण्डू के सुल्तान महमूद खिलजी ने 85 फीट ऊँचा बुलन्द दरवाजा बनवाया, फिर उसके पुत्र गियासुुद्दीन खिलजी ने गुम्बद बनवाया। सन्दलखाना व मस्जिद का निर्माण भी उसी समय हुआ बताते हैं। इसके बाद मुगलकाल में यहां का काया कल्प हुआ। बादशाह अकबर ने यहां एक विशाल मस्जिद बनवाई, लंगरखाना बनवाया और बड़ी देग भेंट की, छोटी देग जहांगीर ने नजर की जो ताम्बे की थी। शाहजहां ने जामा मस्जिद बनवाई और जहांआरा ने बेगमी दालान का निर्माण कराया। सन् 1915 में हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खां ने निजाम गेट बनवाया। बड़ी व छोटी देग में क्रमश: 120 मन व 80 मन चावल पकने की क्षमता है। बड़ी देग का घेरा 13 फीट व गहराई दस फीट है तथा चार सूत मोटी लोहे की चद्दरों से इसे बनाया गया था। सन् 1567 व 1612 तक लगातार प्रति वर्ष उर्स के दौरान यह देग शाही खर्च से पकवाई गई थी। इस तरह दरगाह का जो वर्तमान रूप है वह विगत 500 वर्ष के दौरान होते रहे निर्माण कार्य का परिणाम है। यहां चादर चढ़ाने की भी अनूठी प्रथा है जो ईरान, इराक व अरब देशों में भी नहीं है। अपने खादिम के जरिये जायरीन अपनी हैसियत के अनुसार मजार शरीफ पर कीमती चादरें चढ़ाते हैं। बेहद कीमती चादरें दरगाह के तोशाखाना में रख दी जाती है। यहां बादशाह औरंगजेब द्वारा अपने हाथ से लिखी गई कुरान सुरक्षित है। बेगमी दालान से पूरब दिशा में भिश्ती का मजार है। यह मकबरा उसी दिन के बादशाह भिश्ती का है जिसने चौसा के युद्ध के दौरान नदी में डूब रहे हुमायूं की जान बचाई थी। दरगाह के पिछवाड़े झालरा है। अकबर बादशाह के समय तारागढ़ पहाड़ी के उत्तरी उभार और दरगाह के बीच दो बांध बनाकर झालरे का निर्माण किया गया था जिसकी मरम्मत कर्नल डिक्सन के समय (1843-57) कराई गई थी। जामा मस्जिद, दरगाह परिसर में (1638 ई. में) शाहजहां द्वारा दो लाख चालीस हजार रुपए खर्च करके बनवाई गई थी। मस्जिद की जालीदार दीवार पर नुकीले ग्यारब मेहराब हैं। इस मस्जिद के भीतर इमामशाह में स्वर्णाक्षरों से कलमें उत्कीर्ण हैं। यह सम्पूर्ण दरगाह संगमरमर से निर्मित और नयनाभिराम है।
प्रतिवर्ष रजब की एक से छह तारीख तक यहां ख्वाजा साहब का सालाना उर्स मनाया जाता है। विशाल दरगाह में पांच छोटे दरवाजे हैं, दो पूरब में व तीन पश्चिम में। इसका मुख्य द्वार निजाम गेट उत्तर में है। दरगाह सूफी चेतना का शिल्पधाम है। यहां हिन्दू जायरीन अधिक आते हैं। विश्व की और भारत की अनेक नामी हस्तियां यहां की जियारत कर चुकी हैं।
दरगाह शरीफ में दर्शनीय निर्माण कार्य
1. मजारे मुबारक व दरबार शरीफ का निर्माण सुल्तान महमूद खिलजी ने 859 हिजरी में कराया। अकबर बादशाह ने सीपी का कटहरा बनवाया और बाद में शहंशाह शाहजहां ने कटहरे को चांदी का करवा दिया। गुम्बद के ऊपर सोने का कलश रामपुर के नवाब सालवली खान ने पेश किया।
2. जन्नती दरवाजा ख्वाजा साहब के हुजरे (कमरे) में आने-जाने का द्वार था। इस द्वार का यह नाम बाबा फरदुद्दीन गंज शकर ने अपनी अकीदत से रखा था। यह जन्नती दरवाजा ईद व बकरा ईद के अवसर पर एक-एक दिन के लिए खुलता है। ऐसे ही ख्वाजा साहब के उर्स के दौरान एक से छह तारीख तक खुला रहता है। जायरीन इस दरवाजे के सात चक्कर लगाते हैं।
3. बुलन्द दरवाजा सुल्तान महमूद खिलजी ने 1455 ई. में बनवाया। यह जमीन से 75 फीट ऊँचा है।
4. बड़ी देग 1567 ई. में बादशाह अकबर ने भेंट की और उनके पुत्र जहांगीर ने 1613 ई. में छोटी देग नजर की।
5. सुल्तान महमूद खिलजी ने ही मस्जिद संदल खाने का निर्माण करवाया। मजार शरीफ पर पेश करने के लिए संदल यहीं घोटा जाता था।
6. लटियों वाला दालान दरगाह में वह जगह है जहां अकबर ने जहांगीर के मन्नती बाल कटवाये थे।
7. 1570 ई. में अकबर ने विशाल अकबरी मस्जिद का निर्माण करवाया।
8. लंगरखाना वाली जगह पर स्वयं बादशाह अकबर ने फकीरों की पंक्ति में खड़े रहकर मिट्टी के बर्तन में लंगर कबूल किया था। 9. शाहजहां ने यहां सफेद संगमरमर से बेहद खूबसूरत शाहजहांनी मस्जिद का निर्माण कराया। इसी शंहशाह ने 1047 हिजरी में शाहजहांनी गेट बनवाया जहां आजकल नौबतखाना है।
10. मजार शरीफ के पूर्वी दरवाजे से लगा हुआ बेगमी दालान है। इसका निर्माण शहजादी जहांआरा ने 1053 हिजरी में करवाया था। इसके सामने वाले सेहन को आहाता-ए-नूर कहते हैं।
11. अर्काट के नवाब ने 1793 ई. में अर्कट का दालान बनवाया जो कि मजार शरीफ के दक्षिण है।
12. महफिल खाने का निर्माण हैदराबाद के नवाब बशीरूद्दौला ने 1891 ई. में करवाया था।
13. औलिया मस्जिद का निर्माण 1358 हिजरी में कटिहार के रईस चौधरी मोहम्मद बक्ष ने करवाया था। यह वही स्थान है जहां ख्वाजा साहब ने अजमेर में पहले दिन नमाज पढ़ी थी।
14. 1911 ई. में इंग्लैण्ड की क्वीन मैरी ने यहां मजार शरीफ पर हाजरी दी और एक हौज का निर्माण करवाया जिसे क्वीन मैरी हौज कहते हैं।
15. निजाम गेट का निर्माण हैदराबाद के निजाम ने बीसवीं सदी के आरंभ में कराया था।
इस तरह अजमेर स्थित ख्वाजा साहब की दरगाह जन-जन का आस्था धाम है; यह आपसी सद्भाव का मूर्तिमान रूप है; और सूफी चेतना का कालजयी स्मारक है।
-शिव शर्मा
101-सी-25, गली संख्या 29, नई बस्ती, रामगंज, अजमेर
मोबाइल नंबर- 9252270562

रविवार, 20 मई 2012

Plancess EduSolutions Pvt. Ltd.

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We are looking forward to have an article in your esteemed newspaper so as to create the Awareness.
Vivek Gupta
4th year B-Tech Student
IIT Bombay
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