शनिवार, 1 सितंबर 2012

बेटे नहीं बेटी के माथे पर पगड़ी

भारत में पगड़ी की रस्म से बेटियों को परे रखा जाता है. रस्म है कि पिता के अवसान के बाद पुत्र ही पिता की पगड़ी धारण करता है. लेकिन जयपुर की ज्योति माथुर ने पिता के निधन के बाद पगड़ी की रस्म ऐसे सम्पन्न की जैसे कोई बेटा करता है. ज्योति ने पिता की पगड़ी अपने सिर बाँध बदलाव की इबारत लिखी है. ज्योति कहती हैं वो चाहती है बेटियों को बराबरी का हक़ मिले. जयपुर के महेश नगर में धार्मिक विधि-विधान और मंत्रो के बीच रस्मो रिवाज के अंधेरो से निकली ज्योति यूँ प्रकट हुई जैसे वो बेटियों के लिए रोशनी लेकर आई हो. पिछले दिनों ज्योति के पिता का कैंसर से देहांत हो गया था और ज्योति अपने पिता की अकेली संतान है. लिहाज़ा परिवार की ज़िम्मेदारी ज्योति के कंधो पर ही रही है. मगर जब पगड़ी की रस्म का मौका आया तो सामाजिक रस्म आड़े आ गई. क्योंकि रस्मो रिवाज इस मामले में बेटो की हिमायत करते है. लेकिन ज्योति ने पगड़ी और बेटी के बीच सदियों से बने फासले को मिटा दिया.

पूर्ण समर्थन

नाते रिश्तेदारों की भीड़ जमा हुई और जब पगड़ी की रस्म का अवसर आया, ज्योति ने प्रचलित रस्म का प्रतिकार किया और परिवर्तन की प्रतिमा बन कर खड़ी हो गई. पुरोहित ने मंत्रोचारण किया और ज्योति के माथे पिता की पगड़ी बंधी तो उसके चेहरा बदलाव की रोशनी से दमक उठा. ज्योति ने कहा “मेरे पिता ने हमेशा मुझे बेटे से भी ज्यादा महत्व दिया.उन्होंने बेटी बेटो में कोई फर्क नहीं किया. मगर उनके निधन के बाद पगड़ी का सवाल आया तो मुझे लगा मेरे दिवगंत पिता की ख्वाहिश पूरी होगी, मैं ही पगड़ी की रस्म अदा करुँगी. ये सभी बेटियों के हको का सम्मान है”. ज्योति कहती है कि जब मेरे पिता ने कभी भेद नहीं किया तो समाज में ये बेटियों के साथ ये भेद क्यो? शायद ये पहला मौका था जब बेटी के सिर पिता की पगड़ी बंधी. ज्योति की इस परिवर्तनकारी पहल का परिवार और करीबी रिश्तेदारों ने समर्थन किया. ज्योति के मामा दिनेश कुमार कहते है “ज्योति ने जो किया है,वो सराहनीय है. ज्योति ने कदम बढाया तो उसके पति और ससुराल वालो ने पूरी मदद की और हौसला बढाया. हम ज्योति और उसके ससुराल वालो के जज्बे को सलाम करते है.”

‘धर्म के खिलाफ नहीं’

जयपुर में धर्म शास्त्रों के जानकार पंडित के के शर्मा कहते है कि शास्त्र कभी बेटे बेटी में भेद नहीं करते और ना ही बेटी के लिए पगड़ी पर कोई मनाही है. के के शर्मा के अनुसार “अब समय भी बदल गया है. बेटिया भी घर की जिम्मेदारी निभा सकती है.पहले बेटों को ही पगड़ी रस्म का दस्तूर था. क्योंकि पगड़ी की रसम का अर्थ है परिवार के मुखिया के निधन के बाद पगड़ी के जरिये जिम्मेदारी का अंतरण. पहले बेटिया घर से बाहर नहीं निकलती थी, अब वे बेटो के जैसे सभी जिमेदारियो का निर्वहन करने में सक्षम है. “ पगड़ी को इंसान के रुतबे और इज्जत का प्रतीक माना जाता है, पर जब भी पगड़ी सम्मान के लिए आगे बढ़ी, उसने दस्तार के लिए बेटो के माथे का ही वरण किया. मगर अब समय बदला है. इसीलिए ज्योति ने दस्तूर के माथे बेटियो की दस्तारबंदी की तो रस्मो रिवाज खुद ब खुद झुक गई.

-नारायण बारेठ

सचिन पायलट का राजयोग काल सर्प दोष के कारण ही है

आज काल सर्प योग से हर व्यक्ति भयभीत है, मगर आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वर्तमान केन्द्रीय दूरसंचार राज्य मंत्री और अजमेर जिले के सांसद सचिन पायलट की कुण्डली में विद्यमान काल सर्प दोष ही उनके राज योग का कारक है। असल में काल सर्प योग के बारे में गलत धारणाएं स्थापित की गई हैं और इसके माध्यम से कथित ज्योतिषी अपना घर भर रहे हैं। यदि ये कहा जाए कि काल सर्प दोष बनाम एटीएम मशीन तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा।
आइये, जानें कि सच्चाई क्या है-
एक कहावत है कि संसार मेे उसी वस्तु की नकल होती है, जिसकी मांग अधिक होती है। पिछले कुछ वर्षों से देखने में आ रहा है कि काल सर्प दोष किसी अज्ञात भय के समान भारतीय फलित ज्योतिष पर छाया हुआ है। काल सर्प दोष की तथाकथित बनाई गई कलयुगी परिभाषा के अनुसार राहु-केतु के अलावा सभी सात ग्रह राहु-केतु के मध्य में आ जायें तो काल सर्प दोष का निर्माण होता है, जब कि वास्तविकता में इस तथाकथित योग का कोई भी शास्त्रीय आधार नहीं है। सम्पूर्ण भारतीय ज्योतिष में किसी भी ग्रंथ में इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता है। वराहमिहिर, पाराशर, वेदनाथ, मंगेशकर, कल्याण वर्मा आदि किसी ने भी इस योग का कहीं कोई नाम नहीं लिया है ।
 यहां तक कि सारावली, ब्रह्मजातक, पाराशर, होरा शास्त्र आदि में भी सिर्फ  सर्प दोष, नाग दोष आदि योग वर्णित है, जो बारह प्रकार के बताये गये हैं, जिनमें की मुख्यत: तक्षक सर्प योग, अनन्त सर्प योग, वासुकी नाग योग इत्यादि का ही वर्णन किया गया है। इसमें देष के कुछ पंडितों ने इसमें काल जोड़ कर इसे काल सर्प दोष बना दिया है, वहीं से यह बीमारी सम्पूर्ण भारत में आयी है, जिन्होंने की प्राचीन ज्योतिषीय सिद्वान्तों की महत्ता को नकार कर कपोल कल्पित सिद्धान्तों का निर्माण करके इस दोष को नोट उगलने की मषीन बना लिया है, समझ लिया है। इस बात को लेकर कुछ ज्योतिषियों ने यहीं पर सब्र नहीं किया। सर्प से काल सर्प, काल सर्प से विषधर काल सर्प, नागराज काल सर्प तक भी बना दिया है। लोगों के मन में इन लोगों ने इतना भय पैदा कर दिया कि अगर व्यक्ति के थोडी भी परेशानी हो जाये तो लगता है कि काल सर्प दोष आड़े आ रहा है, जब कि पुरातन शास्त्रों में तो यह भी लिखा हुआ है कि यदि कुण्डली में यह योग उपस्थित हो और अगर कुछ अच्छे सहायक योग भी उपस्थित हों तो यही योग सहायक राज योग बन जाता है।
ज्योतिष के योगों के अनुसार यदि बात की जाये तो दो ग्रहों के बीच में आने वाले तीसरे ग्रह को कर्तरी योग के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धान्त सिर्फ  एक ग्रह पर लागू होता है, जो ग्रह शुभ कर्तरी हो या पाप कर्तरी न कि सूर्य से शनि तक के सात ग्रहों पर। यदि कुण्डली में सिर्फ  राहु-केतु ही किसी व्यक्ति के भाग्य का निर्णय करने लग गये तो बाकी के सात ग्रह क्या असर दिखायेंगे, जब कि राहु-केतु भारतीय ज्योतिष के अनुसार मात्र छाया ग्रह है। यह जिस राशि पर बैठते हैं, जिन ग्रहों से दृष्ट होते हैं, जिस नक्षत्र में होते हैं, जिस भाव में होते हैं, उसके अनुसार फल देते हैं तो फिर मात्र ऐसे ग्रहों को विचार करके काल सर्प दोष जैसा भयानक नाम क्यों दिया जा रहा है। साधारणतया आम ज्योतिषी यदि राहु या केतु के साथ अन्य ग्रह भी बैठे हो तो और राहु-केतु से डिग्री में आगे हो तो भी काल सर्प दोष का नाम दे देते है जब कि कतिपय ग्रह राहु-केतु की परिधी से बाहर हो चुका होता है और यह योग भंग हो चुका होता है  इन सबके बावजूद भी कालसर्प दोष बुरा ही हो यह कतई सत्य नहीं है।
कथित काल सर्प योग वाले लाखों व्यक्ति यह योग होते हुए भी बहुत ऊंचे पदों पर पहुंचे हैं, जिसमे जवाहरलाल नेहरू, मोरारजी देसाई, चन्द्रशेखर, अमिताभ बच्चन, देवानंद, सचिन तेंदुलकर, अमेरिकन पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन, फिल्म अभिनेता राजकपूर, भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम। यहां तक कि हमारे देश के वर्तमान केन्द्रीय दूरसंचार राज्य मंत्री और  अजमेर जिले के सांसद सचिन पायलेट के भी कुण्डली में काल सर्प दोष विद्यमान है। उनकी कुुण्डली में तृतीय भाव से नवम् भाव के मध्य यह योग विद्यमान है, जिसे वासुकी नाग योग कहा जाता है। फिर पायलेट इस उंचाई तक कैसे पहुंच गये? वास्तविकता में यही योग इन लोगों के लिए राज योग बन गया। ज्योतिष के पुरातन शास्त्रो में तो यहां तक उल्लेख है कि यदि कुण्डली में ऐसा दोष हो किन्तु कुछ ऐसे अच्छे योग उपस्थित हों तो यहीं काल सर्प योग जीवन में अभिशाप की जगह वरदान बन जाता है। जैसा की ज्योतिष में सिद्धान्त है कि राहु जिसका बिगाड़े उसे कोई नहीं सुधार सकता और राहु जिसका सुधारे उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
इतिहास गवाह है और भारतीय ज्योतिष के ग्रंथ भरे पड़े हैं कि जो कार्य राहु या केतु कर सकते हैं वह अन्य ग्रहों के बस की बात नहीं है । जितने भी बड़े और सम्मानजनक पदों पर व्यक्ति पहुंचे हैं, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनकी सफलता का कारण राहु या केतु ही रहे हैं। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार आकस्मिक लाभ, भू-संपदा, विदेश गमन या विदेश से पैसा और समुद्र का कारक राहु माना गया है तथा नौ ग्रहों में सिर्फ  केतु को ही मोक्ष प्रदाता माना गया है। जिस प्रकार मन्दिर पर ध्वजा फहरती है, उसी प्रकार किसी इन्सान की कीर्ति को मात्र केतु ही फैला सकता है। एक तरफ  जहां हमारे शास्त्रों ने इनकी इतनी तारीफ  और इनको इतना महत्व दिया है, वहीं हमारे ये आजकल के कुछ अपरिपक्व ज्योतिषी इन नामों से लोगों को डरा-धमका कर अपनी दुकानें चला रहे हैं। जब कि ज्योतिष ग्रंथों में स्पष्ट व्याख्यान है कि किसी भी कुण्डली में राहु शनि के समान और केतु मंगल के समान फल देता है। अब यदि कुण्डली में शनि की स्थिति खराब है तो राहु खराब फल देगा और अगर शनि की स्थिति अच्छी है तो अच्छा फल प्रदान करेगा। उसी प्रकार यदि मंगल की स्थिति खराब है तो केतु खराब फल देगा और अगर मंगल की स्थिति अच्छी है तो केतु अच्छा फल प्रदान करेगा। इनके अतिरिक्त भी और भी कई प्रकार के योग ज्योतिष ग्रंथों में दिये गये हैं, जिनसे की यदि यह योग वास्तव में कुण्डली में हो तो भी किसी भी प्रकार से नुकसानदायक नहीं हैं ।
जैसे की यदि राहु छठे भाव में स्थित हो और बृहस्पति केन्द्र में हो तो, जब राहु और चन्द्रमा की युति केन्द्र में हो, यदि शुक्र दूसरे या बारहवें घर में हो तो, यदि बुध आदित्य योग हो तो, यदि लग्न व लग्नेश बलवान हो, यदि कुण्डली में मात्र मंगल बली हो, यदि षनि अपनी राषि या उच्च राषि में केन्द्र में हो इत्यादि कई योग हैं इनमें से कोई भी योग स्थित हो तो यह काल सर्प दोष किसी भी प्रकार से नुकसान नहीं देता है ऐसी स्थितियों के बावजूद शहर एवं देश के कुछ ज्योतिषियों ने इसे कमाई का मोटा साधन बना रखा है, जो न सिर्फ  आम जनता के साथ बड़े-बड़े विज्ञापन एवं होर्डिंग लगा कर धोखा कर रहे हैं, आम जनता को ठग रहे हैं, बल्कि दुखियों को सताकर उनसे जबरदस्ती पैसा ऐंठ कर उन्हें और दुखी बना रहे हैं। इनसे उन जातकों का भला कतई नहीं हो सकता। हां, करवाने वाले कथित ज्योतिषियों का भला अवश्य हो सकता है, जो कि जाने-अनजाने में इस जीवन में झूठ फरेब से पैसा कमा कर स्वयं अपने लिए अगले जन्म में ये यह योग निर्मित कर रहे हैं। शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि यदि कुण्डली में सर्प दोष या नाग दोष हो तो इसका एक मात्र उपाय है भुजंग दान। भुजंग कहते हैं सांप को। अब यह भी सत्य है कि सांप का दान कौन लेगा, तो इसका सीधा सा मतलब है कि किसी सर्प को आजाद करवाये, सर्पों की सेवा करे, उनकी प्राण रक्षा करेे न कि बड़े-बड़े होर्डिंगों और विज्ञापनों के झांसेे में आकर किसी नदी किनारे या सामूहिक रूप से पूजा करके चांदी के नाग नागिन का जोड़ा दान देवे।
 इस लेख के माध्यम से हम आम जनता को सावधान करना चाहते हैं और सलाह देना चाहते हैं कि झूठे विज्ञापनों और कुछ अपरिपक्व ज्योतिषियों की बातों में आकर इस दोष के माया जाल में नहीं फंसे। मात्र भगवत भक्ति, मात्र पितृ भक्ति, अपने सद्कर्मों के द्वारा यदि यह योग उपस्थित भी हो तो भी इससे छुटकारा पाया जा सकता है। अमूमन देखा गया है कि यदि ज्योतिषी 100 लोगों की कुण्डली में इसे बताते हैं, 100 लोगों को इससे डराते हैं, तो उनमें से मात्र दो लोगों में यह योग वास्तव में पाया जाता है। वह भी शास्त्रों के अनुसार सर्प योग या नाग योग होता है, न कि काल सर्प दोष। उन दो लोगों को भी इस दोष का दुष्परिणाम तभी मिलता है, जब कि कुण्डली में राहु या केतु की महादशा चल रही होती है और गोचर में राहु-केतु खराब स्थिति में चल रहे होते हैं। अत: इस योग से घबराने की कतई जरूरत नहीं है। यह दोष न होकर योग है, अत: मेहनत की कमाई को झूठे भ्रम एवं माया के जाल में फंसकर व्यर्थ करने की आवश्यकता नहीं है। ज्यादा तो मैं कह नहीं सकता हूं, किन्तु इतना अवश्य कहूंगा कि यदि ये राहु-केतु के काल सर्प दोष की दुकानें इसी तरह चलती रहीं तो हर चौराहे पर सभी देवी-देवताओं के मन्दिरों की जगह राहु या केतु के ही मन्दिर होंगे। हर दिन नाग पंचमी होगी, नेता से अधिकारी, और गरीब से अमीर तक अपना कर्म छोड़ कर तीन-तीन बार काल सर्प दोष की पूजा करवाने में व्यस्त होगा।
 इस लेख के माध्यम से हम यह कहना चाहते हैं कि हमारी किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है। मात्र आम जनता को सावधान और काल सर्प योग से भयाक्रांत जनता को वास्तविकता बताने के उद्देश्य से ये लेख जनता की सेवा में उपस्थित है। फिर भी यदि इस लेख या इसके किसी भी भाग से किसी को कोई ठेस पहुंची हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं।
-राकेश गोयल
ज्योतिष अनुसंधानकर्ता


ज्योतिष अनुसंघानकर्ता श्री राकेश गोयल पुत्र श्री ओम प्रकाश गोयल ने डीएलएल की शिक्षा अर्जित की है।
उनका संपर्क सूत्र:-
संस्थान-भव्य ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान केन्द्र,
3, ब्रह्मपुरी, कचहरी रोड, अजमेर-305001
निवास-प्रेम प्रतीक, कुमार कोठी, कचहरी रोड,
अजमेर-305001
फोन नं.- 0145-2620890
मोबाइल नं.- 09413039949
ईमेल पता-rakeshgoyalastro@gmail.com

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

वीर शिरोमणी महाराजा दाहिर


महाराजा दाहिर की जयंती पर 25 अगस्त को विशेष
पुण्य सलिला सिंध भूमि वैदिक काल से ही वीरों की भूमि रही है। वेदों की ऋचाओं की रचना इस पवित्र भूमि पर बहने वाली सिंधु नदी के किनारों पर हुई। इस पवित्र भूमि पर पौराणिक काल में कई वीरों व वीरांगनाओं को जन्म दिया है, जिनमें त्रेता युग में महाराज दशरथ की पत्नी कैकेयी सिंधु देश की पुत्री थी। द्वापर युग में महाराजा जयदरथ का नाम भी सुनहरी अक्षरों में लिखा हुआ है।
कलियुग में ईसवी शताब्दी प्रारम्भ होने के छह सौ वर्ष के बाद के इतिहास पर नजर डालते हैं तो सिंधु देश पर राजपूत वंश के राजा राय साहसी का राज्य था, जिन्होंने अपने पिता राजा राय साहरस की ईरान के राजा शाह नीमरोज के साथ युद्ध में मृत्यु के बाद 624 ई. में सिंधी कलेंडर के स्थापना की थी। राजा राय साहसी की मृत्यु लम्बी बीमारी के बाद हुई। राय साहसी का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। अत: उन्होंने अपने प्रधानमंत्री, कश्मीरी ब्राह्मण चच को अपना राज्य सौंपा । राजदरबारियों एवं रानी सोहन्दी की इच्छा पर राजा चच ने रानी सोहन्दी से विवाह किया। राजा दाहिर चच के पुत्र थे। राजा चच ने राज्य संभालते ही सिंध के लोहाणा, गुर्जर ओर जाटों को पदच्युत करके उन्हें राज्यसभा से निलंबित कर दिया था। राजा चच की मृत्यु के बाद उनका शासन उनके भाई चन्दर ने संभाला, जो कि उनके राजकाल में प्रधानमंत्री थे। राजा चन्दर ने ब्राह्मण समाज का होने के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार किया ओर बौद्ध धर्म को राजधर्म घोषित किया। राजा चन्दर ने सात वर्शो तक सिंध पर राज्य किया।
राज्य की बागडोर संभालते समय ही महाराजा दाहिर को कई प्रकार के विरोधों का सामना करना पड़ा। अपने पिता द्वारा पदच्युत किए गए गुर्जर, जाट और लोहाणा समाज शासन से नाराज थे तो ब्राह्मण समाज बौद्ध धर्म को राजधर्म घोषित करने के कारण नाराज थे। राजा दाहिर ने सभी समाजों को अपने साथ लेकर चलने का संकल्प लिया। महाराजा दाहिर ने सिंध का राजधर्म सनातन हिन्दू धर्म को घोषित कर ब्राह्मण समाज की नाराजगी दूर कर दूरदर्शिता का परिचय दिया। साथ ही संदेश दिया कि देश में बौद्ध मत के मानने वालों को अपने विहार व मन्दिर बनाने की पूर्ण छूट होगी। इस निर्णय से उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि वे सभी को अपने साथ लेकर चलने में विश्वास करते हैं।
सिंध का समुद्री मार्ग पूरे विश्व के साथ व्यापार करने के लिए खुला हुआ था। सिंध के व्यापारी उस काल में भी समुद्र मार्ग से व्यापार करने दूर देशों तक जाया करते थे और इराक-ईरान से आने वाले जहाज सिंध के देवल बन्दर होते हुए अन्य देशों की तरफ जाते थे। ईरानी लोगों ने सिंध की खुशहाली का अनुमान व्यापारियों की स्थिति और आने वाले माल अस्बाब से लगा लिया था। हालांकि जब कभी वे व्यापारियों से उनके देश के बारे में जानकारी लेते तो उन्हें यहीं जवाब मिलता कि पानी बहुत खारा है, जमीन पथरीली है, फल अच्छे नहीं होते ओर आदमी विश्वास योग्य नहीं है। इस कारण उनकी इच्छा देश पर आक्रमण करने की नहीं होती, किन्तु मन ही मन वे सिंध से ईष्र्या अवश्य करते थे।
महाराजा दाहिर अपना शासन राजधानी अलोर से चलाते थे और देवल बन्दरगााह पर प्रशासन की दृष्टि से अलग सूबेदार नियुक्त किया हुआ था। एक बार एक अरबी जहाज देवल बन्दरगाह पर विश्राम के लिए आकर रुका। जहाज में सवार व्यापारियों के सुरक्षा कर्मियों ने देवल के शहर पर बिना कारण हमला कर दिया और शहर से कुछ बच्चों ओर औरतों को जहाज में कैद कर लिया। जब इसका समाचार सूबेदार को मिला तो उसने अपने रक्षकों सहित जहाज पर आक्रमण कर अपहृत औरतों ओर बच्चों को बंधनमुक्त कराया। अरब जान बचा कर अपना जहाज लेकर भाग छूटे।
उन दिनों ईरान में धर्मगुरू खलीफा का शासन था। हजाज उनका मंत्री था। खलीफा के पूर्वजों ने सिंध फतह करने के मंसूबे बनाए थे, लेकिन अब तक उन्हें कोई सफलता नहीं मिली थी। अरब व्यपारी ने खलीफा के सामने उपस्थित होकर सिंध में हुई घटना को लूटपाट की घटना बताकर सहानुभूति प्राप्त करनी चाही। खलीफा स्वयं सिंध पर आक्रमण करने का बहाना ढूंढ़ रहा था। उसे ऐसे ही अवसर की तलाश थी। खलीफा ने हजाज को सिंध पर आक्रमण का आदेश दिया। हजाज धर्म गुरू के आदेश की पालना करने को मजबूर था। उसे अब्दुल्ला नामक व्यक्ति के नेतृत्व में अरबी सैनिकों का दल सिंध विजय करने के लिए रवाना किया।
जब देवल के सूबेदार ने अरब जहाज पर सवार व्यापारियों के कारनामे का समाचार महाराजा दाहिर को भेजा तो वे तुरन्त समझ गए कि इसी बहाने अरब सेना सिंध पर आक्रमण अवश्य करेगी। उन्होंने अपनी सेना को तैयार रहने का आदेश दिया। दरबार में उपस्थित राजकुमार जयशाह के नेतृत्व में सेना की एक टुकड़ी देवल बन्दरगाह पर पहुंच गई। अनुमान के मुताबिक अरबी सेना ने देवल के बन्दरगाह पर आक्रमण किया। सिंधी वीरों की सेना ने अरबी सैनिकों के युद्ध भूमि में छक्के छुड़ा दिए। अरब उलटे पांव लौटे। युद्ध में अरब सेनापति अब्दुल्ला को जान से हाथ धोना पड़ा। नेतृत्वहीन सेना को उलटे लौटने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं था। सिंधी वीर राजकुमार जयशाह मातृभूमि की जयजयकार करता हुआ महल की ओर लौटा। रास्ते में सिंधी वीरों की आरती उतार कर स्वागत किया गया।
खलीफा अपनी हार से तिलमिला उठा और हजाज को काटो तो खून नहीं। दोनों ने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उनकी सेना की ऐसी गति हो सकती है। खलीफ ने खुदा को याद करते हुए कहा कि क्या इस भूमि पर ऐसा कोई वीर नहीं जो महाराजा दाहिर का सिर ओर छत्र लाकर मेरे कदमों में डाल सके। हजाज के दरबार में उपस्थित दरबारियों में से एक नवयुवक मौहम्मद बिन कासिम ने इस काम का बीड़ा उठाया और खुदा को हाजिर नाजिर मान कर कसम खाई कि वह दाहिर को अवश्य परास्त करेगा। दरबार में उपस्थित एक दरबारी ने महाराज दाहिर के शरणागत गए एक अरब सरदार अलाफी की याद दिलाते हुए उससे धर्म के नाम पर मदद की मांग की। तजवीज पेश की, जिसे स्वीकार कर एक गुप्तचर सिंध देश को रवाना किया गया। दस हजार सैनिकों का एक दल ऊंट, घोड़ों के साथ सिंध पर आक्रमण करने के लिए भेजा गया। सिंध पर ईस्वी सन् 638 से 711 ई. तक के 74 वर्षों के काल में नौ खलीफाओं ने 15 बार आक्रमण किया। पन्द्रहवें आक्रमण का नेतृत्व मौहम्मद बिन कासिम ने किया। सुसज्जित और दस हजार सैनिकों की सेना के साथ हमले का समाचार जब सिंध में पहुंचा तो महाराजा दाहिर ने भी अपनी सेना को तैयार रहने का हुक्म दिया। पदच्युत किए गए गुर्जर, जाट और लोहाणों को पुन: सामाजिक अधिकार देते हुए सेना में सम्मिलित किया गया। महाराजा दाहिर की दोनों पुत्रियों राजकुमारी परमाल और सूर्यकुमारी ने सिंध के गांव-गांव में घूम कर सिंधी शूरवीरों को सेना में भर्ती होने ओर मातृभूमि की रक्षा करने के लिए सर्वस्व अर्पण करने का आह्वान किया। कई नवयुवक सेना में भर्ती किए गए।
देवल का सूबेदार बौद्धमत के ज्ञानबुद्ध को नियुक्त किया गया था। जब ज्ञानबुद्ध को अरबी आक्रमण का समाचार महाराज से मिला तो वे उदास हो गए। बौद्धमत हिंसा में विश्वास नहीं करता। धर्म उसे लडऩे की इजाजत नहीं देता और कर्तव्य युद्ध भूमि से विमुख होने की इजाजत नहीं देता। महाराज के दूत को वह युद्ध की तैयारी से मना नहीं कर सकता था। उसे एक युक्ति सूझी। उसने धर्म गुरू का सहारा लिया, जिनसे वार्ता कर युद्ध नहीं करने के निर्णय के तर्क को सुसंगत बनाने का प्रयास किया। किन्तु सन्यासी सागरदत ने उपदेश देते हुए कहा कि बौद्धमत मैत्री, करुणा का उपासक है, जिन कर्मों से मैत्री नष्ट हो, करुणा के स्थान पर अत्याचार घर कर ले, उन्हें कभी भी ठीक नहीं समझा जा सकता। भगवान बुद्ध ने विश्व बन्धुत्व का सन्देश दिया है। अरबियों ने मकरान प्रदेश में बौद्ध मठों का नाश कर दिया है। इसलिए वे यहां आकर भी ऐसा ही विनाश करने वाले हैं, उनके राज्य में हम भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। अत: सुख और शान्ति के लिए महाराजा दाहिर का साथ देना ही श्रेयस्कर है। किन्तु ज्ञानबुद्ध की बुद्धि मंद पड़ गई थी और उसने अपने मंत्री मोक्षवासव से समझौता करके खलीफा से सिंध के देवल और अलोर की राजगद्दी के बदले में उन्हें सहायता देने के सन्देश भेजा। शत्रु के खेमे में विश्वासघाती से अरब सरदार फूले नहीं समाए और हजाज ने सकारात्मक संदेश ज्ञानबुद्ध के पास भेजा।
अरब सेना देवल के निकट आने का समाचार मिलते ही, महाराज दाहिर ने अपनी सेना को सुसज्जित होकर कूच करने का आदेश दिया। सिंधी वीरों ने राजकुमार जयशाह के नेतृत्व में युद्धभूमि की ओर प्रस्थान किया। सिंधु देश की जय, महाराज दाहिर की जय, राजकुमार जयशाह की जय के नारे बुलन्द करते हुए सिंधी वीर देवल के तट पर आ पहुंचे। सिंधी वीरों को अपने शौर्य का प्रदर्शन करने के लिए अधिक समय तक इन्तजार नहीं करना पड़ा। अरबी सेना देवल के किले के बाहर ही डेरा डाले हुए थी। दोनों सेनानायक आक्रमण करने के लिए तैयार थे। रणभेरी के बजते ही दोनों ओर से आक्रमण प्रारम्भ हो गया। एक-एक सिंधी वीर दो-दो अरबों पर भारी पडऩे लगा। सूर्यास्त तक अरबी सेना हार के कगार पर खड़ी थी। सूर्यास्त के समय युद्ध विराम हुआ। दोनों सेनाऐं अपने-अपने शिविरों को लौट गई। रात्रि विश्राम का समय था। रात्रि के काले अंधेरे में ज्ञानबुद्ध और मोक्षवासव ने मानवता के मुख पर कालिख पोतने का काम कर दिया और देवल किले के पीछे के द्वार से पूर्व योजना अनुसार अरब सैनिकों का प्रवेश करा सिंधी वीरों पर आक्रमण करा दिया। सिंधी वीर बिस्तर छोड़ शस्त्र संभाले तब तक काफी देर हो चुकी थी। देवल पर दुश्मनों का कब्जा हो गया। राजकुमार जयशाह घायल हो गए। उन्हें मजबूरन देवल का किला छोड़ जंगलों की ओर जाना पड़ा।
अलोर मेें बैठे महाराज दाहिर को जब देवल पर दुश्मनों के कब्जे का समाचार मिला तो अलोर के किले की जिम्मेदारी रानी लाडीबाई के कंधों पर डालकर तुरन्त अपनी सेना को तैयार कर युद्ध भूमि की ओर प्रस्थान किया। अपने महाराज को युद्धभूमि में पाकर सिंधी वीरों में नई उर्जा संचारित हुई। युद्ध के मैदान में हा-हाकार मच गया। अरबी सैनिकों के पांव उखडऩे लगे, वे पीछे हटे तो उन्हीं के साथियों ने उन पर हमला बोल दिया। विश्वासघातियों ने यहां भी घात लगाई और पहले ही से बिछाए विस्फोटक में आग लगा दी। रणभूमि में उपस्थित हाथी, घोड़े, ऊंठ बिदक गए। महाराज दाहिर जिस हाथी पर सवार थे, उसके होदे में आग लग गई। हाथी चिंघाड़ता हुआ दौडऩे लगा, जिसे महावत ने सिंधु नदी की ओर मोड़ दिया। नदी के तट पर पहुंचते ही हाथी पानी में कूद पड़ा। महाराज दाहिर ने अपने शस्त्र संभाले और पानी में छलांग दी। महाराज जब तक संभलते तब तक तट को अरब सैनिकों ने घेर लिया और तीरों ओर भालों की वर्षा कर महाराज का शरीर छलनी कर दिया। एक वीर योद्धा ने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
महाराज की वीर गति और अरबी सेना के अलोर की ओर बढऩे के समाचार से रानी लाडी सावचेत हो गई। सिंधी वीरांगनाओं ने अरबी सेनाओं का स्वागत अलोर में तीरों ओर भालों की वर्षा के साथ किया। कई वीरांगनाओं ने अपने प्राण मातृभूमि की रक्षार्थ दे दिए। जब अरबी सेना के सामने सिंधी वीरांगनाएं टिक नहीं पाई तो उन्होंने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए जौहर किया।
दोनों राजकुमारियां युद्ध क्षेत्र में दोनों ओर के घायल सैनिकों की सेवा में लगी हुई थी, तभी उन्हें दुश्मनों ने पकड़ कर कैद कर लिया। सेनानायक मोहम्मद बिन कासिम ने अपनी जीत की खुशी में दोनों राज कन्याओं को भेंट के रूप में खलीफा के पास भेज दिया। खलीफा दोनों राजकुमारियों की खूबसूरती पर मोहित हो गया और दोनों कन्याओं को अपने जनानखाने में शामिल करने का हुक्म दिया। राजकुमारियों के दिल में बदले की ज्वाला पहले ही धधक रही थी। खलीफा के इस आदेश ने आग में घी का काम किया। राजकुमारी परमाल ने रोते हुए शिकायत की कि हुजूर आपके पास भेजने से पहले आपके सेना नायक ने हमारा शील भंग किया है। यह सुनते ही खलीफा आग बबूला हो गया। खलीफे ने सेनानायक मौहम्मद बिन कासिम को चमड़े के बोरे में कैद कर मांगवाने का आदेश दे दिया।
खलीफा का आदेश लेकर सेना की टुकड़ी सिंध रवाना हुई। अरब सैनिक देवल और अलोर को कब्जे में करने के बाद उत्तर की तरफ  बढ़ रहे थे। खलीफा के आदेश ने उनके कदम रोक दिए। मौहम्मद बिन कासिम को चमड़े के बोरे में कैद कर खलीफ के सामने पेश किया गया। हजाज ने मौहम्मद बिन कासिम को कैद करके लाए गए सैनिकों से खलीफा के आदेश पर सेनापति के व्यवहार की दास्तान सुनाने का आदेश दिया । सैनिकों ने बताया कि हुजूर सेनानायक ने घुटने टेक कर हुक्म पर अपना सिर झुका दिया। हमने उनके हाथ पैर और मुह बांध कर बोरे में बन्द कर दिया। रास्ते में ही कहीं इसने अपने प्राण छोड़ दिए। यह वाक्य सुनते ही खलीफा दंग रह गया। उसने गुस्से में दोनों राजकुमारियों से सच बोलने का आदेश दिया। प्रसन्न मुद्रा में खड़ी राजकुमारी सूर्य और परमाल ने कहा कि हमने अपने देश पर आक्रमण करने वाले और हमारे माता-पिता और देशवासियों के कातिल से अपना बदला ले लिया। खलीफा ने दोनों राजकुमारियों का कत्ल करने का आदेश दिया। जब तक अरब सैनिक उन तक पहुंचते, अपने कपड़ों में छुपाए खंजर को निकाला और दोनों बहिनों ने एक दूसरे के पेट में घोंप कर आत्म बलिदान दिया। एक परिवार की अपनी मातृभूमि पर बलिदान की यह गाथा इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। ऐसे बलिदानों से प्रेरित होकर ही सिंधी लेखक ने यह पंक्तियां लिखी हैं-
हीउ मुहिजो वतन मुहिजो वतन मुहिजो वतन,
माखीअ खां मिठिड़ो, मिसरीअ खां मिठिड़ो,
संसार जे सभिनी देशनि खां सुठेरो।
कुर्बान तंहि वतन तां कयां पहिंजो तन बदन,
हीउ मुंहिजो वतन मुहिजों वतन मुहिजो वतन।


-सुरेश बबलाणी,
प्रेम प्रकाश कुंज,
ए-239,पंचषील नगर,
अजमेर
9414314572
suresh_bablani@yahoo.com

(सुरेश बबलाणी जाने माने सिंधी साहित्यकार हैं-संपादक)

बुधवार, 4 जुलाई 2012

कहीं रेन फिक्सिंग तो नहीं हो गई है?


खबर है कि मानसून इस बार फिर बेईमानी पर उतर आया है. भगवान जाने इस खुफिया सूचना में कितना दम है? लोगों का कयास है कि इस देश में पहले ही तरह तरह की फिक्सिंग चल रही हैं, इसी कडी में रेन फिक्सिंग भी हो गई होगी? कुछ दिनों पूर्व आपने उत्तरप्रदेश के कन्नोज में लोकसभा के लिए हुई चुनाव फिक्सिंग की चर्चा सुनी होगी। वहां के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी और समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार डिंपल यादव के विरुद्ध कांग्रेस ने तो बाकायदा वाक ओवर दिया ही, उनकी धुर विरोधी कहाने वाली मायावती भी अज्ञात कारणों से नदारद हो गई। इतना ही नहीं अपने आपको विरोधी दल का दावा करने वाली बीजेपी भी बड़े नाटकीय ढंग से चुनाव से भाग खड़ी हुई और जनता ठगी की ठगी रह गई। वैसे ऐसी घटना सन 2009 के लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश के विदिशा में घटित हो चुकी है, जहां बीजेपी प्रत्याशी सुषमा स्वराज के विरुद्ध कांग्रेस के प्रत्याशी ने बड़े रहस्यमयी तरीके से ऐन वक्त पर अपना नाम वापस ले लिया।
इसी श्रंखला में अब चर्चा है कि मानसून ने इस बार कहीं रेन फिक्सिंग तो नहीं कर ली है। इस बारे में और अधिक जानकारी सीबीआई की जांच से ही पता लगेगी, अगरचे वह वर्षा बोर्ड, जिसके अध्यक्ष इन्द्र और सचिव वरुण देवता हैं, से इस बारे में पूछताछ करें। कहा तो यहां तक जा रहा है कि स्वयं इन दोनों देवताओं को ही पता नही हैं कि इस वर्ष मानसून का आगमन कब और कहां-कहां होगा। तभी तो इनके नुमाइन्दे-मौसम विभाग वाले कभी कुछ कहते है, कभी कुछ कहते हैं। कई बार तो इनकी भविष्यवाणियों से उलट बात घटित होती है। ऐसा लगता है कि वर्षा बोर्ड और मौसम विभाग में ही आपस में पटती नहीं है। विशेषज्ञों का ख्याल है कि जिस तरह बालीबुड की नूपुर मेहता को बुला कर क्रिकेट में स्पॉट फिक्सिंग की जांच का नाटक किया गया, वैसे ही इन्द्र के दरबार की अपसराओं-मेनका, रम्भा और उर्वषी इत्यादि- को बुला कर जांच नहीं तो कम से कम जांच का नाटक तो किया जाए। कुछ को तिहाड़ जेल भिजवाया जाए। भले ही वह बाद में एक एक करके सब छूट जाएं। जनता का क्या, वह तो थोड़े दिन बाद जैसे टूजी स्पैक्ट्रम, कामन वैल्थ गेम्स, आदर्श सोसाइटी आदि घोटालों को भूल रही है, यह भी भूल जायगी।
इ. शिव शंकर गोयल 
फ्लेट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी, 
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, 
दिल्ली- 75. 
मो. 9873706333

पचास से अधिक जिलों में फैली है डायन प्रथा

भारत में कानून की हुकुमत और सामाजिक चेतना के बावजूद डायन प्रथा और उसके हिमायती हार मानने को तैयार नहीं है. राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक भारत में विभिन्न प्रदेशों के पचास से अधिक जिलों में डायन प्रथा सबसे ज्यादा फैली है. इन जिलों में ऐसी औरतों की सूची लंबी है जो डायन करार दे दी गई और जुल्मों का निशाना बनी. ये सिलसिला अब भी जारी है. भारत के गांव-देहातों और छोटे कस्बों में अब भी कोई ओझा, भोपा और तांत्रिक किसी सामान्य औरत को कभी भी डायन घोषित कर रहा है. औरत की विडम्बना ये है कि इसमें उसके अपने घर परिवार और रिश्तेदार भी शामिल हो जाते है.
दर-दर की ठोंकरे
राजस्थान में टोंक जिले की कमला मीना तीन बच्चो की माँ है. पति ने ताउम्र साथ निभाने का वादा किया था.मगर एक दिन उसने कमला को डायन करार दे दिया और दूसरी शादी कर ली. कमला ने जब अपना दर्द बयान किया,गला भर आया. कुछ आंसू दामन पर गिरे,कुछ भीतर दिल के दालान पर. कमला ने कहा, � दस साल हो गए मुझे दर-दर की ठोकरें खाते हुए. पति बदला तो पीहर भी बदल गया. जिसके भी दरवाजे पर दस्तक दी, खाली हाथ लौटा दी गई. कसबे में कोई मकान तक किराये पर नहीं देता. जैसे ही पता चलता है ,मुझे मकान खली करने के लिए कह दिया जाता है�. कमला बताती है कैसे उसे आधी रात को घर से निकाल कर मारा पीटा गया, उसने अपने जिस्म पर उभरे कुल्हाड़ी की मार के जख्म के निशान भी दिखाए. कमला कहती है, �मेरी जान खतरे में है, न उसे पुलिस ने न्याय मिला न किसी इंसाफ के मंदिर से.�. इन औरतों के लिए कोई खाप पंचायत खड़ी नहीं होती.कोई रहनुमा भी मदद नहीं करता.
पति मरा,जिंदगी खत्म
हिमाचल प्रदेश की निर्मल चंदेल को उस वक्त सहारे की दरकार थी जब अकस्मात पति का निधन हो गया. इसके बाद जमाना बेदर्द निकला. निर्मल बताती हैं, � उस समय मेरी उम्र चौबीस साल थी, तब भी लोगों ने कहा इसने ही ऐसे कर्म किये जिससे पति की मौत हो गई. मुझे ही इसके लिए जिम्मेदार बताया गया.� निर्मल अब ऐसी ही प्रताड़ित औरतों के लिए काम करती है. वह बताती हैं, �जब मेरे भाई की शादी होने लगी तो सब लोगों ने कहा इसे दूर रखना ,मगर मेरे भाई ने इसे नहीं माना. दिक्कत ये है कि बाकि लोग इस तरह सामने नहीं आते जैसे मेरे भाई खड़े हुए.�
ओझा अपराधी
महाराष्ट्र में सामाजिक कार्यकरता विनायक तावडे़ और उनका संगठन कई सालों से डायन प्रथा के विरुद्ध अभियान चला रहे है. तावडे़ के मुताबिक आदिवासी इलाकों में ये प्रथा एक बड़ी समस्या बनी हुई है.वह बताते हैं कि कैसे एक ओझा गाव में एक महिला को डायन करार देने का उपक्रम करता है. तावड़े उदहारण देते हैं, �जैसे गांव में कोई बीमार हो गया,तो कुछ लोग जवार के दाने बीमार के ऊपर सात बार घुमाकर ओझा के पास ले जाते है. ओझा एक दाना इस तरफ, एक उस तरफ रख कर मन्त्र बोलना शुरू करेगा,कहेगा हाँ, .उसे डायन ने खाया है. उस डायन का घर नाले के पास है, उसमे पेड़ है, इतने जानवर है.आम के पेड़ है, महू का पेड़ है ,इतने बच्चे है, � वह आगे बताते हैं, �इनमे जो बातें अनुमान से किसी पर लागु हो जाऐ, उस औरत को डायन करार दिया जाएगा. हमने ऐसे ही एक ओझा को गिरफतार करवाया है. � राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य निर्मला सावंत प्रभावलकर ने स्वीकार किया, � देश के पचास से साठ के बीच ऐसे जिले है जहाँ इस कुप्रथा का बड़ा जोर है. कही महिला को डायन, कही डाकन, तेनी या टोनी, पनव्ती ,मनहूस और ऐसे ही नामों से लांछित कर उसे बहिस्कृत किया जाता है� प्रभावलकर के अनुसार ये समस्या शिक्षित वर्ग में भी है. जब कोई महिला राजनीती में आती है तो लोग कहने लगेगे ये जहां भी हाथ लगाएगी, नुकसान हो जायेगा. आप चुनाव हार जायेगे, ऐसा कह कर लांछित किया जाता है. पीड़ित महिलाओं में ज्यादातर दलित, आदिवासी या पिछड़ा वर्ग से है. सामाजिक कार्यकर्ता तारा अहलुवालिया ने राजस्थान में आदिवासी बहुल इलाकों में ऐसी पीड़ित महिलाओं की मदद की है. वह बताती है, �कोई 36 ऐसे मामले मेरे पास है जिनमें औरत को डायन घोषित कर दिया गया. मगर पुलिस ने कोई मदद नहीं की. फिर बताये कैसे इस कुप्रथा पर लगाम लगेगी. इन पीड़ित औरतों में कई इस कद्र टूट चुकी हैं कि जीने की ललक कम होने लगी है. �
डायन विरोधी कानून जरूरी
अहलुवालिया ने कहा, � ये समय है जब डायन विरोधी कानून बनना चाहिए. अकेले भीलवाड़ा जिले में ही कोई ग्यारह स्थान ऐसे है जो औरत के शरीर से डायन निकालने के लिए जाने जाते है. वहां हर सप्ताह भीड़ लगती है. इन औरतों के साथ हर तरह की हिंसा होती है�. दक्षिण राजस्थान की सुन्दर बाई विधवा है. उन्हें उनके भतीजे ने ही डायन घोषित कर दिया. सुन्दर बाई बताती हैं, � पहले मुझे डायन करार दिया,फिर एक दिन मृत घोषित कर पेंशन बंद करा दी. क्योंकि वो मेरी सम्पति हड़पना चाहता है. पेंशन वापस शुरू हो गई है.मगर अब भी मैं डरी हुई हूँ.�
लेखक श्री नारायण बारेठ राजस्थान के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं और लंबे समय से बीबीसी से जुड़े हैं

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

धरती पकड़ नहीं, इस बार आसमान पकड!

चुनाव के इस मौके पर आज फिर रह रहकर धरती पकड की याद आ रही है और क्यों न आए? उन्होंने ही हर चुनाव को रोचक बनाया था। उन्हें चुनाव में खड़ा होने का शौक था और हर बार जब भी मौका मिलता वह चुनाव दंगल में कूद जाते। उस समय अधिक से अधिक एक फार्म ही तो भरना होता था, परन्तु बाद में सरकार ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए संविधान में संशोधन कर फार्म के साथ 50 प्रस्तावक-एमपी अथवा एमएलए- एवं 50 समर्थक वोटर आवश्यक कर दिए तो वहां उनका स्कोप खत्म हो गया। वह रह रहकर उस घड़ी को कोसते रहते थे। इधर देश भी उनकी सेवाओं से वंचित रह गया।
उनका नाम धरती पकड़ कैसे पड़ा यह एक खोज का विषय है। कुछ लोगों का अनुमान है कि चूंकि वह हर चुनाव में खड़े हो जाते थे और फिर नतीजे में धरती पकड़ लेते थे, इसलिए कालांतर में वह धरती पकड़ कहलाए, जबकि कुछ अन्य लोगों का कयास है कि नाम तो इनका शुरू से ही धरती पकड़ था लेकिन चुनाव में यह आसमान पकडऩा चाहते थे, लेकिन हर बार चित्त होकर वापस धरती पकड़ लेते थे इसलिए धरती पकड़ के नाम से मशहूर हो गए।
वैसे चुनावों में तरह तरह की हस्तियां मैदान में आ चुकी हैं। एक बार एक ऐसे सज्जन आए जो किसी न किसी तरह मीडिया की चर्चा में रहना चाहते थे। यह उनका शौक था और आप जानो शौक में आदमी क्या नहीं करता?
एक हस्ती ऐसी भी उम्मीदवार बनती रही है, जिन्होंने साहित्य में घुसपैठ की है और ऐसा उन्होंने किया है एक किताब लिख कर, जिसका शीर्षक है हाउ टू क्रियेट प्रोब्लम यानि समस्याएं कैसे पैदा या खड़ी की जाएं? इस विधा में उन्हें बडा मजा आता है। ऐसा करके वह न केवल अपनी पार्टी के लिए बल्कि स्वयं अपने और अपने परिवार के लिए भी जब तब समस्याएं खड़ी करते रहते हैं, मजा जो आता है!
उम्मीदवारों की लिस्ट लम्बी है। कोई कहां तक गिनवाएं? एक सज्जन यशपाल की एक कहानी के उस पात्र की तरह थे, जो अखबारों में अपना नाम छपवाने की गरज से एक बार एक सड़क पर जानबूझ कर एक वाहन से टकरा गए ताकि दूसरे रोज उनका नाम छप जाए, लेकिन मीडिया वाले भी अजब गजब हैं। नगर संवाददाता ने इस घटना पर सिर्फ यह लिख दिया कि कल दिन में एक अनजान व्यक्ति आगरा गेट के बाहर एक वाहन से टकरा गया। उसे अस्पताल में भरती कराया गया है। इधर अस्पताल में शैया पर पड़े पड़े यह खबर पढ़ते हुए उन्हें अपनी चोट का दुख कम और यह दुख ज्यादा सता रहा था कि हाय! हाथ-पांव भी तुड़वाये और नाम भी नहीं छपा। इससे तो धरती पकड़ ही अच्छा रहा, कम से कम नाम तो छपता था।
एक बार एक उम्मीदवार अपने शहर की नगर परिषद के चुनाव में अपने वार्ड से खड़े हो गए। जितना जोर लगाना था लगा दिया और जब चुनाव का नतीजा आया तो पता लगा कि इन्हें सिर्फ एक वोट मिला है। खैर, चुनाव तो हो गए लेकिन फिर उनके घर-बाहर चर्चा शुरू हो गई। मियां बीबी ही क्या आस-पास वाले सब शक करने लगे कि सिर्फ एक ही वोट कैसे? कम से कम दो वोट तो होने ही चाहिए, या तो मियां ने स्वयं को ही वोट नहीं दिया या बीबी ने नहीं दिया। लोग बाग महीनों इसकी खोजबीन में लगे रहे लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।
इ. शिव शंकर गोयल
फ्लेट न. 1201, आई आई टी
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रविवार, 1 जुलाई 2012

'स्वांग' के वजूद पर है गहरा संकट

नारायण बारेठ
उत्तर भारत के अनेक भागों में सांस्कृतिक बदलाव और दबाव के बीच एक लोक कला स्वांग अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही है. उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में स्वांग एक सदियों पुरानी परंपरा है. रियासत काल में इसके कलाकार राजा - महाराजाओं और पौराणिक पात्रो के किरदार का स्वांग रचते, लोगों का मनोरंजन करते और इसके साथ अच्छाई का संदेश देते.
हरियाणा में तो अब भी स्वांग देहात-कस्बो में मंचित होता है और कलाकार सियासी सभा महफिलों और मेलों में रौनक बिखेरते है. मगर दूसरे हिस्सों में इसका दायरा सिमट रहा है.
स्वांग के मंचों पर सिनेमा जैसी भव्यता नहीं होती, लेकिन जब स्वांग के कलाकार अपनी विधा का प्रदर्शन करते है तो लोग उसे तल्लीनता से देखते, सुनते है. स्वांग के कलाकार खुद को 'सांगी' कहते है. वे स्वांग करते है और गांव कस्बो की थकी-हारी जिन्दगी का दिल बहलाते है. सुरेन्द्र कुमार करनाल में एक नाट्य संस्था का संचालन करते है और वो स्वांग के आयोजन से जुड़े हैं. वे कहते हैं, ये एक पारंपरिक लोक कला है.
राजा-महाराजाओं के दरबार में भी स्वांग किया जाता था. ये सिलसिला सैंकड़ो साल पुराना है, उस दौर में पुरानी गाथाओं को नाट्य विधा के जरिये मंचित किया जाता था. ये काम अब भी जारी है.
हाँ, अब हम अपनी लोक कला की इस संस्कृति को भूलते जा रहे है. हम इसे बनाये रखे हुए है. हम इसमें किसी ऐतिहासिक पात्र का रूप धारण करते है. पात्र आज के दौर के भी होते है. इसे हम अपनी कला के माध्यम से जनता के सामने प्रस्तुत करते है. ये कलाकार समाज में चर्चित किसी हस्ती का रूप धारण करते है, उसी चरित्र के अनुसार अभिनय करते है, कभी किसी देवता तो कभी किसी नेता के रूप का श्रृंगार कर अपनी बात कहते है. वो संवाद बोलते है तो साथी कलाकार वाद्य यंत्रो पर संगीत की धुन छेड़ कर माहौल को जीवंत बनाए रखते है. ना रौशनी का चकाचौंध, ना पूंजी का प्रवाह, ना ऊँचे मंचो और महलो के लोग. इस विधा के कलाकार और कद्रदान समाज के उस हिस्से से आते है जहा जीवन का संघर्ष तो है, मगर स्वांग उतना नहीं.
क्या स्वांग पुरानी 'बहरूपिए' लोक कला जैसा ही है? सोनीपत के स्वांग कलाकार इंद्र सिंह कहते है 'स्वांग और बहरूपिए में बहुत फर्क है. बहरूपिये का कलाकार छोटा सा अभिनय कर पैसा मांग लेता है. सांगी ऐसे पैसे नहीं मांगता. इंद्र सिंह कहते है, �ये सिनेमा और टीवी तो अभी आए है. ये तो पृथ्वीराज चौहान के दौर में भी थी. ये हमारे पुरखो की कला है. हम इसे लोगों को बताना चाहते है. हम दिल से जुड़े है इस कला से. पर अब हमको दुःख होता है, हमारी पहले जैसी कद्र नहीं है. हम अपनी कद्र बढ़ाना चाहते है. हम इसके जरिये सत्य का प्रचार करते है जैसे राजा हरिश्चंद्र सत्यवादी थे, हम उनके किरदार को लोगो के सामने पेश करते है.�
समय के साथ जिदंगी में स्वांग तो बढ़ा मगर इन कलाकारों को वैसा प्रोत्साहन नहीं मिला. स्वांग कलाकार प्रेमलाल तीस साल से स्वांग कर रहे है. वे कहते है कि ये तो इंद्र की कचहरी में भी होता था. उन्होंने कहा, �मैं मदरना रोल करता हूँ, नृत्य करता हूं, हार्मोनियम बजाता हूं. अब इससे बमुशिकल गुजारा होता है, लेकिन इससे लगाव है. जैसे मैं गाता हूँ हरियाणा की कहानी सुन लो दो सौ साल की, नए किस्म की हवा चाल पड़ी नए चाल की. तो ये स्वांग तो चलता ही रहेगा.�
यूपी में मुज्जफरनगर के संजय खुद स्वांग के सिध्हस्त कलाकार है. वे कहते है स्वांग आज के सिनेमा और टी वी धारावाहिकों से बेहतर है.इसे पुरे परिवार के साथ आप देख सकते है.वे कहते है -पहले का दौर कुछ और था.जब शरम हया थी,छोटे बड़े की कद्र थी. आज ऐसी फिल्मे है जो घर परिवार में नहीं देख सकते .लेकिन स्वांग की कहानी ऐसी होती है माँ,पिता,बहिन ,भाई ,बच्चे सब एक साथ देख सकते है. टी वी और सिनेमा में बहुत कुछ बनावटी है. मगर हमारी कला में ऐसा नहीं है. लोग देखते और दिल से तारीफ करते है.
भारत में प्रजातंत्र परवान चढ़ा, राजनीति बलवान हुई. लेकिन इसके साथ ही स्वांग और नौटंकी जैसी लोक कलाओ की कद्र घट गई. गोया अब जीवंत स्वांग तो सियासी मंचो का चहेता हो गया, ऐसे में कोई अभिनीत स्वांग क्यों देखे. ये ही इन कलाकारों की पीड़ा है.

लेखक श्री नारायण बारेठ राजस्थान के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं और लंबे समय से बीबीसी से जुड़े हैं