शनिवार, 28 नवंबर 2015

रेल बजट आने वाला है, जरा ध्यान दीजिए इन सुझावों पर

आदरणीय बन्धुओ, संस्थाओं,  मंदिर/मस्जिद/गुरुद्वारों के पदाधिकारियों,
आप सभी को विदित है कि फरवरी 2016 में रेल बजट आने वाला है। सभी संस्थाएं व जागरूक बन्धु जनता की सहूलियत हेतु अपने-अपने सुझाव रेल मंत्रालय को भेजते हैं। अजयमेरु नागरिक अधिकार एवं जन चेतना समिति, नाका मदार, अजमेर ने जनता के हितार्थ समय-समय पर विभिन्न बिन्दुओं पर रेल प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है और रेल प्रशासन ने उन सुझावों पर कार्यवाही भी की है। 
पुन: रेल प्रशासन के ध्यान में विभिन्न बिन्दु लाने की आवश्यकता है, जिन पर कार्यवाही करने से जनता को काफी सहूलियतें मिलने की उम्मीद हैंं।
हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आप अजमेर की रेल आवश्यकताओं पर नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे, जयपुर के जनरल मैनेजर सहित अजमेर मंडल रेल प्रबंधक, रेल मंत्री, चेयरमैन रेलवे बोर्ड तक अपने सुझाव भेजें। कुछ ही माह बाद फरवरी में रेल बजट आने वाला है, यदि अभी ही सुझाव नहीं भेजे गए तो रेल बजट में उन प्रस्तावों का समावेश किया जाना सम्भव नहीं होगा:
1. गत रेल बजट 2015 में गुलाब बाड़ी रेल फाटक पर ओवर ब्रिज बनाने की स्वीकृति प्रदान की गई थी (देखें अजयमेरु टाइम्स 1 एवं 16 मार्च 2015 अंक), इस कार्य हेतु बजट आवंटन की मांग की जाय व इस कार्य को शीघ्र प्रारम्भ कराने हेतु पुरजोर मांग की जाय।
2. अजमेर रेलवे स्टेशन का द्वितीय निकास द्वार पाल बीचला की तरफ बनाने की योजना अजमेर विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इससे अजमेर की आधी आबादी को लाभ होगा और मेन स्टेशन रोड पर ट्रैफिक भी कम होगा। यह योजना जनता को सहूलियत तो प्रदान करेगी ही, प्रशासन के लिए भी स्टेशन रोड पर ट्रै्रफिक की समस्या का निदान निकालेगी। यह बड़ी योजना है जिसमें रेलवे के साथ-साथ अजमेर विकास प्राधिकरण, नगर निगम आदि सभी की भागीदारी होगी। इस योजना में भूमि अधिग्रहण कर रोड चौड़ा भी करना होगा अत: इसके लिए भारी जोर लगाने की आवश्यकता है।  अन्यथा इस कार्य पर सभी विभाग कार्य करने से दूर ही रहने का प्रयास करेगें। इसके लिए सांसद व जन प्रतिनिधियों पर भी विशेष जोर दिया जाना आवश्यक है।
3. मदार रेलवे स्टेशन को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने के साथ इसका विस्तार भी किया जाए, ताकि भविष्य में अजमेर मुख्य स्टेशन का भार कम किया जा सके। यदि मदार स्टेशन का विकास नहीं किया तो अजमेर को नई रेलगाडिय़ां मिलना मुश्किल हो जाएंगी। मुख्य स्टेशन पर स्थान की कमी के कारण पिटलाइनों का नितांत अभाव है, अत: मदार स्टेशन पर इस कार्य की योजना बनाई जानी आवश्यक है। अजमेर रेलवे स्टेशन पर जगह की कमी के कारण गत वर्ष रेल बजट में अजमेर को एक भी नई ट्रेन नहीं दी गई। स्मार्ट सिटी के परिप्रेक्ष्य में मदार स्टेशन का विस्तार व विकास अत्यन्त आवश्यक है। इस स्टेशन के विकास हेतु भूमि भी बहुतायत से उपलब्ध है, अत: इस स्टेशन हेतु दीर्घकालीन योजना बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए अजमेर के दोनों सांसद महोदय से विशेष अनुरोध किया जाना चाहिए।
4. अजमेर अन्तर्राष्ट्र्रीय धर्म नगरी है। यहां पुष्कर तीर्थ व ख्वाजा साहब की दरगाह सहित अनेक पवित्र स्थान हैं, जहां देश से ही नहीं विदेश से भी लाखों धर्म पे्रमी बन्धु निरंतर आते हैं। यहां दो-दो अन्तर्राष्ट्रीय मेले- पुष्कर व ख्वाजा सहाब, भरते हैं।  अजमेर का  मथुरा व सोमनाथ धर्मनगरों से सीधा सम्पर्क नहीं है। एक धर्म नगरी का दूसरी धर्म नगरी के साथ सीधा सम्पर्क होना आवश्यक है। इस सिलसिले में अजमेर को सोमनाथ व मथुरा से सीधे जोडऩे के क्रम में दिल्ली-राजकोट ट्रेन को सोमनाथ तक तथा इलाहबाद-जयपुर ट्रेन को अजमेर तक बढ़ाया जाना आवश्यक है।  
5. अजमेर व श्री महावीरजी के बीच तीन ट्रेनें हैं (अजमेर-पटना जियारत एक्सप्रेस, उदयपुर-सियालदाह अनन्या एक्सप्रेस, रांची-अजमेर एक्सप्रेस), जिनका ठहराव श्री महावीरजी स्टेशन पर नहीं है।  अनेक अवसरों पर रेल सलाहकार समिति सदस्यों के साथ सम्पन्न मीटिंगों में इसकी मांग उठी है, परन्तु सफलता नहीं मिल सकी है। उदयपुर, भीलवाड़ा, अजमेर, जयपुर सहित अनेक नगरों से हजारों की संख्या में तीर्थयात्री प्रतिदिन श्री महावीरजी जाते हैं, परन्तु इन ट्रेनों का ठहराव न होने से उन्हें भारी असुविधा होती है। 
6. अजमेर नगर के हर कोने में रेलवे की सम्पत्तियां मौजूद हैं अर्थात किसी भी कोने से निकल जाएं, रेलवे का वजूद वहां मिलेगा। ऐसे में यदि रेलवे द्वारा उस स्थान की संभाल नहीं की जाती है तो शहर की सुन्दरता पर भी प्रभाव पड़ता है।  ऐसा ही एक क्षेत्र राजा साइकिल चौराहा है, जहां ओवर ब्रिज का निर्माण हुआ है। इसके निर्माण के बाद रेलवे की काफी भूमि लावारिस जानवरों व शरारती तत्वों का अड्डा बनकर रह गई है।  रेलवे पर दबाव बनाया जाए कि इस भूमि हेतु कोई योजना बनाकर इसे सुन्दर पार्क का रूप दिया जाए या अन्य जनोपयोगी कार्य हेतु विकसित किया जाए। 
7. एयरपोर्ट  शटल चलाई जाए- अजमेर एयरपोर्ट को जयपुर (सांगानेर) से जोडऩे के लिए एक एयरपोर्ट शटल चलाई जाये, ताकि जो व्यक्ति अजमेर, पुष्कर, दरगाह विजिट करना चाहते हैं, वे सीधे जयपुर से इस शटल के माध्यम से अजमेर आ सकें। यह रेलवे ट्रैक लगभग 120 किलोमीटर का होगा, जिसमें 100 किलोमीटर ट्रैक पहले से तैयार है। इस रेल ट्रैक को जयपुर मेन स्टेशन से जोडऩे की आवश्यकता नहीं है। विदित हो कि अजमेर एयरपोर्ट दिल्ली, मुम्बई जैसे बड़े एयरपोर्ट से ही जुड़ पाएगा, अन्य नगरों के लिए उसे जयपुर एयरपोर्ट का ही उपयोग करना होगा। अत: एयरपोर्ट शटल के माध्यम से अजमेर एयरपोर्ट का जयपुर से कनेक्शन होने पर यात्रियों को भारी लाभ होगा। 
8. अहमदाबाद-आगरा फोर्ट ट्रेन सं. 12548 अजमेर से आगरा फोर्ट की तरफ रात्रि 2.10 पर रवाना होती है। अजमेर के तीर्थ यात्रियों/जायरीनों व जनता के लिए यह गाड़ी अत्यन्त उपयोगी तो है परन्तु इसकी रवानगी का समय यदि रात्रि 11.50 किया जाए तो यह अत्यन्त उपयोगी होगी और रेलवे को भी भारी ट्रेफिक प्राप्त कराएगी। पूर्व डी आर एम श्री मनोज सेठ द्वार इसके लिए रिवाइज्ड टामइ टेबल बनाया गया था और उसे पत्र  के माध्यम से जयपुर डिवीजनल हैड क्वाटर भेजा गया था। परन्तु यह कार्य आगे नहीं बढ़ सका। यह टे्रन अजमेर के लिए बहुत उपयोगी व महत्वपूर्ण टे्रन है जिसके समय में बदलाव होने से जनता का भारी सुविधा प्राप्त होगी। 
-एन.के. जैन, 
जन सम्पर्क प्रभारी
अजयमेरु नागरिक अधिकार एवं जन चेतना समिति, 
नाका मदार, अजमेर मो. 9414004270

शनिवार, 7 नवंबर 2015

क्या सोशल मीडिया पर कहा सुना सब कुछ सत्य है ?

गत कुछ महीनों में संपूर्ण भारतवर्ष में जिस तरह का माहौल बना है और दिन प्रतिदिन राग-द्वैष, आरोप-प्रत्यारोप, भक्त-देशद्रोही,विकासपुरूष-घोटालेबाज़,सेक्युलर-सूडो सेक्युलर,बीफ-दादरी,असहिष्णुता-अवार्ड वापसी, अच्छे दिन-महंगे दिन, वगैरह-वगैरह की लड़ाई भक्त बनाम गैर भक्तो में जिस प्रकार से सोशल मीडिया पर चल रही है बड़ी ही दिलचस्प है। मैं क्या सही और क्या गलत है के चक्कर में ना पड़ के सीधे मुद्दे पर आता हूँ। किसी पर विश्वास करना बड़ी ही अच्छी बात है मगर बिना किसी विवेकपूर्ण तर्क के अन्धविश्वास करना और जो वो करे उसे ही सत्य  मान के औरों को अनसुना करना या उनके द्वारा कुछ कहने या बोलने पर गाली गलौच कर मार्क ज़ुकेरबर्ग के प्लेटफार्म को दूषित करना अत्यंत ही दुःख की बात है। सोशल मीडिया का आरम्भ अपने परायों से जुड़े रहने और ज्ञान एवं सुचना के आदान प्रदान के लिए हुआ था पर विगत वर्षो में इसे राजनैतिक पार्टियो ने एक बड़े ऑनलाइन समुदाय को भ्रमित एवं प्रभावित करने का माध्यम बना लिया है। आज ये  सोशल मीडिया राजनितिक अंध भक्तो के लड़ने का अखाड़ा बन चूका है। और सबसे बड़ी बात ये है की लोग अपने सोचने समझने की शक्ति भूल कर जो भी प्रायोजित तरीके से पोस्ट और शेयर आ रहे है उन्हें गीता और रामायण की तरह अटल सत्य मान कर अपना नजरिया बना रहे है। उन्हें ये नहीं मालूम की कौन व्यक्ति या समूह किस प्रयोजन के लिए क्या प्रोपेगंडा रच रहा है। क्या सत्य है क्या मिथ्या किसी को कुछ नहीं लेना देना। एक समय था जब हमारे बुजुर्ग सिर्फ अपने देखे और सुने पर ही यकीं करते थे और 'जो देखा वो सत्य, बाकि सब मिथ्या' वाली नीति का अनुसरण करते थे। परन्तु आजकल जो किसी ऑफिसियल या फ़र्ज़ी पेज या अकाउंट से कुछ भी शेयर होता है सब उसे पत्थर की लकीर मान लेते है। आधुनिक भारत में अफवाह उड़ाने का, घृणा फ़ैलाने का, सोशल मीडिया से बढ़िया प्लेटफार्म और कहा मिलता।

पुनश्च : झूठ को सौ बार चिल्ला चिल्ला के बोलो तो लोग सच मान लेते है, जैसा की आजकल हर  चुनाव में होता है। जीतने के लिए येन केन प्रकारेण वाली नीति चुनते है। मुद्दो को विकास से शुरू कर धर्म और असहिष्णुता पर ख़त्म करते है। और चुनाव के बात यही विदूषक मौन साध लेते है। अतः सभी बुद्धिजीवियों से निवेदन है कि किसी भी प्रायोजित पोस्ट और शेयर को देखते ही विश्वास करने के बजाय अपने विवेक से काम ले और सोशल मीडिया को राजनैतिक अखाड़ा ना बनाये। किसी ने सत्य ही कहा है 'दिखावे पर न जाए,अपनी अकल लगाये ' ।
Bhupendra Singh

सांई बाबा: भक्त भले ही भगवान मानें, अन्य क्यों?

हिंदू मंदिरों में सांई बाबा की मूर्ति स्थापित करने पर तो विवाद होगा ही
शुक्रवार 6 नवम्बर 2015 को आजतक न्यूज चैनल पर रात्रि के समय साईं बाबा को लेकर एक दिलचस्प/गंभीर व धर्म में किसे भगवान कहा जाए, के मुद्दे पर बहस देख कर यह लगा कि हम भगवान और धर्मावलम्बियों के दायरे को ध्यान में रखे बिना ऐसी बहस कर रहे हैं, जिसका रिजल्ट हमें सही व सम्यक नहीं मिल सकता। 
बहस का विषय था कि सांई बाबा भगवान हैं कि नहीं। उत्तर तो हमें बहुत सीधा व सम्यक मिल सकता है, मगर यह तभी मिलेगा, जब यह बहस स्याद्वाद (अपेक्षा के सिद्धांत) के सिद्धान्त पर आधारित हो, न कि अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर।
बहस में शामिल मुस्लिम धर्म के पैरोकार ने कहा कि हमारे मजहब में तो हमें पैगम्बर मोहम्मद साहब को भी खुदा का दूत माना गया है, खुदा नहीं। खुदा एक है ही है, जो निराकार है। ऐसे में साईं बाबा को खुदा या भगवान कैसे माना जा सकता है। वे तो केवल एक फकीर थे।
साईं बाबा को भगवान मानने वालों के यहां जो साहित्य / धर्म ग्रंथ हैं, चाहे वे अभी लिखे गए हों या 100 वर्ष पूर्व में, उनके आधार पर साईं बाबा भगवान हैं। ऐसे में अगर साईं भक्त उन्हें भगवान मानें तो किसे एतराज है, मगर उनकी मूर्ति हिंदू मंदिरों में स्थापित करने को लेकर विवाद है, क्योंकि अधिसंख्य हिंदू उन्हें भगवान नहीं मानते। 
जैन धर्म में भगवान की व्याख्या पूरी तरह से अलग है व सभी धर्मों से हट कर है। उनके धर्म ग्रन्थ में भगवान का वह रूप है ही नहीं, जो अन्य धर्मों में है। उनके धर्म ग्रंथ कहते हैं कि भगवान का अर्थ है, वह भव्य आत्मा जो राग-द्वेष से मुक्त होकर अपने स्वभाव में विराजमान हो गई है, जिसे संसार से किसी प्रकार का काई लेना-देना नहीं है और वह जन्म-मरण के बन्धन से भी मुक्त हो गई है। वे मानते हैं कि भगवान या अन्य कोई शक्ति ऐसा कुछ नहीं कर सकती, जिससे दूसरे का हित-अहित हो सकता हो। यह धर्म अकर्तावादी सिद्धांन्त अर्थात भगवान किसी का कुछ नही कर सकता, को मानता है। इसके मानने वाले अपने धर्म / मजहब को मान कर खुश हैं उन्हें इस बात से कोई ऐतराज नहीं है कि अन्य कोई किसको भगवान मानता है या नहीं। उन्हें इस बात में भी कोई एतराज नहीं है कि आपके भगवान आपके रक्षक हैं या आपकी झोली भरने वाले हैं। जैन धर्म सिखाता है कि मैत्री भाव रख कर ही चला जाना चाहिए। उनका धर्म कहता है कि यदि तू धर्म का राही बनना चाहता है, अपनी आत्मा का उद्धार करना चाहता है तो दूसरों की ओर दृष्टि मत कर- किसने क्या माना है, क्या सोचा है, तू तो अपनी ओर देख, अपना लोटा छान कर पी, सबको छना पानी पिलाने की मत सोच। लोटा तो छन जाएगा सबके चक्कर में कुआं नहीं छनेगा।
सनातनधर्मी निराकार ईश्वर के अवतारों को भगवान मानते हैं। अब तक तेईस भगवान अवतार ले चुके हैं और चौबीसवें भगवान कल्कि अवतार लेंगे। 
अब उनकी इस मान्यता पर किसे एतराज होना चाहिए। ये सब निजी मान्यताओं की बात है, अपने-अपने पुराण, धर्म ग्रंथों की बात है। इसमें विवाद कब पैदा होता है, जब हम अन्य की मजहबी मान्यताओं में दखल देने का प्रयास करते हैं। आज सिख सम्प्रदाय में गुरु ग्रंथ साहब ही उनके सर्वोपरि व भगवान तुल्य हैं, उनकी अवमानना पर वे उतना ही क्षुब्ध होते हैं, जैसे भगवान की अवमानना हो गई हो। 
भारत जैसे देश में अनेक धर्म और धार्मिक मान्यताएं हैं, उन मान्यताओं पर न तो विवाद होना चाहिए, न इन पर बहस होनी चाहिए। मूल बात जो ध्यान में रखनी चाहिए वह है कि हमें एक दूसरे की सीमा में प्रवेश नहीं करना चाहिए अथवा एक दूसरे के क्षेत्राधिकार में दखल नहीं देना चाहिए।
आप अपने घर में किसी की भी पूजा करें मुझे क्या एतराज है परन्तु मेरी मान्यता के साथ अपनी मान्यता को ठूसने का प्रयास ही कलह की जड़ है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश भगवान की मूर्तियों के साथ साईं बाबा को बैठाने का प्रयास करोगे तो बात नहीं बनेगी, कलह होगी ही होगी। यह छोटी सी बात है मगर है बड़ी गूढ़।  साईं के मंदिर में साईं बाबा बैठें, किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए मगर साईं मंदिर में अन्य सम्प्रदाय / धर्म की मूर्तियां लगाने / रखने में तो ऐतराज व कलह होगी ही।
किसी भी बात का अतिरेक नुकसानदायक होता है। अब साईं को हरिद्वार के मंदिरों में जहां हिन्दू देवताओं के मंदिर हैं, उनमें बैठाने से तो कलह होगी ही।
मैं तो एक बात और भी कहना चाहता हूं, भगवान शब्द का प्रयोग हर किसी के लिए या हर किसी संदर्भ में नहीं होना चाहिए। कभी आगे चल कर सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान कहना भी कलह पैदा करने का कारण बन सकता है।
विवाद का अन्त होना श्रेयकर हैं, विवाद का स्थान तो किसी भी धर्म में नहीं है।
-एन.के. जैन सीए
मो. 9414004270

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

वादे ! ......क्या अाएंगे 'अब'अच्छे दिन ?

'बेटी बचाओ' क्या सिर्फ 'नारा' ही है,
'नन्ही हथेलियाँ'', हो रहीं लहूलुहान हैं ।
नहीं लग रही अब,कोई कहीं लगाम है,
दिनों-दिन आदमी हो रहा यों हैवान है।
घूस, अपहरण और बलात्कार यहाँ वहाँ
हर रोज बनता 'फोकस' खबरों का जहां।
पीड़ित तो पीड़ित, परिजन होते शर्मसार,
रक्षकों की बातकरें,नहीं बदल रहेआसार।
भूखे भेड़िये से, गुंडे मिजाज गर्माते हैं,
जेल जाते भी अब, नहीं कतई शर्माते हैं।
समाज की तो , बडी निराली है रीत ही,
पचडों से दूर ही रहना,बन गया गीत है।
ना धर्म, न शर्म है, कर्म की बात क्या कीजे,
कलजुग है घोर,कहते शर्मिंदा होत दिन तीजे।
भृष्टाचार अक्सर, आ सामने खडा होता है,
बडा ऊंचा समझता, पडा जहाँ छापा होता है।
अस्पतालों की तो,बात ही मत कीजिए सर,
महंगी दवा और डॉक्टर ,जरा कसिये तो 'पर'।
दाल भात,तेल और, बिजली चढ़ रहे ऊँचे है,
गंगा मैली, कचरे के ढेरों पर बैठे गली कूँचे हैं।
आदमी तो खा रहा , रोज महगाई के कोडे़ है,
जनता के पसीने से,नेता खारहे तले पकौडे है।
काला धन, भला कैसे स्वदेशी हो जाएगा,
राज आपका , दाऊद क्यों मरने आएगा ?
दिल्ली से देश तक, हवा जो कभी तन जाए
रोक लीजिए पहले, कि 'धूंआ' आग बन जाए।
मोदी जी अब, सैल्फी से जरा बाहर आ जाईये,
"मन की बात" है, अच्छे दिन,अब ले हीआईये।
~~~~~~~~ ~~~~ * शमेन्द्र जड़वाल

अजमेर विकास प्राधिकरण की वेबसाइट पर जनहित की सूचनाएं डाली जाएं

अजमेर विकास प्राधिकरण (पूर्व यूआईटी) की वेबसाइट दो मायनों में त्रुटिपूर्ण है। पहली यह कि इसमें सूचनाएं या तो डाली नहीं जाती हैं या वे अपूर्ण/डिफेक्टिव डाली जाती हैं। दूसरी यह कि इस वेबारसाइट मे  सिटीजन चार्टर नहीं है जिसे किसी भी विभाग की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है।
विकास प्राधिकरण जनता व सरकार के साथ कई प्रकार से बेईमानी कर रहा है। एक तो यह कि रिकार्ड पर यह बताया ताजा है कि उसने कानूनी/विभागीय अनिवार्यता के कारण वेबसाइट का निर्माण कर लिया है ताकि सरकार यह न कहे कि प्राधिकरण की वेबसाइट क्यों नहीं बनी है। दूसरी यह कि इसमें जो आवश्यक व जनता की जानकारी के लिए जरूरी/महत्वपूर्ण जानकारियां/सूचनाएं हैं, वे नहीं डाली जाती।
किसी भी सरकारी या अद्र्ध सरकारी/स्वायत्तशाषी विभाग को अपनी वेबसाइट बनानी आवश्यक है। इस वेबसाइट के माध्यम से यह बताना भी आवश्यक है कि यह विभाग किस कार्य के लिए बनाया गया है तथा वह जनता के किस-किस काम को कितने समय में पूरा करेगा। इन कार्यों के लिए विभाग ने किस प्रकार से व्यवस्था कर रखी है। से सब बातें विभाग अपने सिटीजन चार्टर के माध्यम से जनता को बताता है, परन्तु खेद, दु:ख व शर्मिन्दगी का बात है कि यह जानकारी (सिटीजन चार्टर)अभी तक इस वेबसाइट पर डाली ही नहीं गई है। अभी तक सिटीजन चार्टर का चैप्टर बनाया ही नहीं गया है। यदि वेबाइट खोलकर देखेगें तो यह तो दिखाई देगा कि इस विभागर का सिटीजन चार्टर है, परन्तु जब अन्दर झांककर देखेगें तो मालुम होगा कि सिटीजन चार्टर का निर्माण प्रारम्भ से ही नहीं किया गया है। आज भी उस कॉलम में यही लिखा आता है कि इसका निर्माण कार्य चल रहा है। वेबसाइट को प्रारम्भ हुए पांच बरस बीत भी चुके हैं परन्तु यह पंचवर्षीय योजना से भी अधिक समय लेने  वाला कार्य बताया जा रहा है।
इस वेबसाइट में अनगिनत खामियां तो हैं हीं  इसके माध्यम से जनता से छुपाव का खेल भी खेला जा रहा है।  इस वेबसाइट पर न्यास/प्राधिकरण मीटिंगों (मिनिट्स), सम्पूर्ण बजट,  नियमन फाइलों की नाम, पते सहित पूरी सूची, संस्थाओं, व्यक्तियों, प्रतिष्ठानों आदि को रियायती, आधी/पूरी दर पर आवंटन भूखण्ड आदि अनेक जानकारियां डाली ही नहीं जाती। इसके पीछे यही मकसद है कि जनता को पता ही न चले कि उसके नगर के विकास का जिम्मा धारण करने वाली संस्था किस-किस का विकास और कैसे-कैसे कर ही है। बजट का पूरा विवरण न डालकार छुपाया जा रहा है कि किस कार्य के लिए कितना पैसा व किस शर्त पर खर्च किया जा रहा है।
खेद है कि अजमेर के राजनीतिक बंधुओं ने किसी प्रकार की कोई ऐसी पहल नहीं की है, जिससे अजमेर विकास प्राधिकरण (नगर सुधार न्यास) की वेबसाइट पर आवश्यक सामग्री प्रदर्शित हो और जनता को सही व सम्पूर्ण जानकारियां/सूचनाएं इस वेबसाइट के माध्यम से मिल सकें।
यदि हम अन्य नगर सुधार न्यास व जेडीए जयपुर की वेबसाइट का अवलोकन करें तो यह साफ हो जायेगा कि अजमेर की वेब साइट में वहां के मुकाबले शून्य के बराबर सूचनाएं हैं।
अजयमेरु टाइम्स ने ही प्रथम बार यह बात उजागर की कि नगर सुधार न्यास ने इस वेबसाइट को बनाने के लिए करीब 1 करोड़ खर्च किए हैं, परंतु जनता के लिए जो आवश्यक सामग्री है, वह इस वेबसाइट पर डाली नहीं जा रही है, जिसके कारण भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुंचा है और नरेन शाहनी जैसे साफ सुथरी छवि के व्यक्ति भी उससे बच नहीं पाए।
और जानकारियों की छोडिय़े, अकेले नियमन के मामले को ही लें तो, नियमन हेतु जो फाइल 15 वर्ष पूर्व लगी, वह आज भी वहीं की वहीं है जबकि उसके बाद की फाइलों को कभी का निपटा दिया गया है। यदि वेबासाइट पर यह सूचना डालदी जाती है तो सभी को पता चल जाता है कि नई फाइलें क्यों निपटाई जा रही और पुरानी फाइलें क्यों नहीं निपट रही हैं। ये सब घाल-मेल वेबसाइट की गड़बड़ी से आगे बढ़ रहा है।
यदि आज नियमन हेतु किसी ने 15 वर्ष पूर्व फाइल लगाई है और नियमन नहीं हो पाया है और यदि वह जानना चाहे कि उसकी फाइल की क्या स्थिति है, तो वह कितने भी प्रयास करले तो भी उसे न्यास से कोई जवाब नहीं मिलेगा। यानि कि न तो न्यास सीध तौर पर कोई जानकारी दे रहा है और न ही वेबसाइट पर जानकारी मुहैया करवा रहा है।
अफसोस तो इस बात का है कि आए दिन चौराहों पर धरना देने वाले, कांग्रेस के खिलाफ राष्ट्रवाद का ध्वज फहराने वाले भी कोई नेता इस प्रकरण में एक शब्द भी नहीं बोलते हैं।
अजमेर विकास प्राधिकरण के वर्तमान अध्यक्ष श्री हेमन्त गेरा साहब से इस सम्बन्ध में सुधार किए जाने की पूरी उम्मीद है, प्रार्थना यही है कि इस विभाग में कार्य करने का उन्हें इतना समय मिल जाए कि वे इस विभाग की न सिर्फ सम्हाल कर सकें बल्कि ऐसी व्यवस्था भी बैठा सकें कि आगे के लिए भी गाड़ी पटरी पर आ जाए।
एन. के. जैन सीए

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

अजमेर का अभेद दुर्ग है अनूठा तारागढ़

वर्ल्ड हेरिटेज डे पर विशेष
taragarh kila 3आक्रमण, सुरक्षा और स्थापत्य का अद्भुत नमूना है तारागढ़ दुर्ग! अजमेर में जाकर कहीं से देखिए लगता है, ऐसा लगता है मानो तारागढ़ हमें बुला रहा है। इस दुर्ग के पीछे छिपा है इसका गौरवशाली इतिहास। इसके खंडहर आज भी उतनी ही मजबूती से अपनी गाथा कह रहे हैं।
अजमेर की सबसे ऊंची पर्वत शृंखला पर स्थित तारागढ़ दुर्ग को सन् 1832 में भारत के गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक ने देखा तो उनके मुंह से निकल पड़ा- ''ओह दुनिया का दूसरा जिब्राल्टरÓÓ और मुगल बादशाह अकबर ने तो इसकी श्रेष्ठता भांप कर अजमेर को अपने साम्राज्य का सबसे बड़ा सूबा बनाया था। 1 हजार 885 फीट ऊंचे पर्वत शिखर पर दो वर्ग मील में फैले इस दुर्ग के चारों तरफ बनी बुर्जों पर से एक ओर गहरी घाटी, दूसरी ओर लगातार तीन पर्वत शृंखलाओं, तीसरी ओर सर्पाकार पहाड़ी मार्ग के सीधे ढलान व चौथी ओर पहाड़ी की तलहटी में बसे विशाल अजमेर शहर को देखते हैं तो बड़ा सुखद रोमांच होता है। मुगलकालीन उत्तर-मध्य भारत के सामरिक नियंत्रण और उत्तर मुगलकालीन राजस्थान में मराठों, राठौड़ों तथा अंग्रेजों की रक्तिम पैंतरेबाजी में तारागढ़ का सर्वाधिक महत्व रहा। तारागढ़ की प्राकृतिक सुरक्षा एवं अनूठे स्थापत्य के कारण ही मुगल साम्राज्य का सबसे बड़ा सूबा बनाया जिसमें उस समय साठ सरकारें व 197 परगने थे।
यह ऐतिहासिक दुर्ग अजमेर के चौहान राजा अजयराज द्वितीय ने 1033 ई. में बनवाया था। इससे पहले सयादलक्ष के चौहान नरेश अजयराज प्रथम ने छठी शताब्दी में यहां चौहानों की सैन्य चौकी स्थापित की थी। प्रारंभ में नाम अजयमेरू दुर्ग था। सन् 1505 में मेवाड़ के राजकुमार पृथ्वीराज ने इस पर अधिकार किया तथा अपनी रानी ताराबाई के नाम से दुर्ग का नाम तारागढ़ रख दिया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. पारसनाथ सिंह के अनुसार उत्तर भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) का वध इसी तारागढ़ में सुल्तान मुहम्मद गौरी ने किया था। तारागढ़ का स्थापत्य अनूठा है। दुर्ग स्थापत्य की दृष्टि से राजस्थान में कुम्भलगढ़, सिवाना, रणथम्भौर, चित्तौडग़ढ़ व तारागढ़ बेमिसाल है। इनमें भी तारागढ़ की विशिष्टता को अंग्रेज सेनापतियों ने भी खुली आंखों से स्वीकार किया। दुर्ग की अनूठी विशेषता उसके तोरणद्वार को ढकने वाली वर्तुलाकार दीवार है। ऐसा भारत के किसी भी दुर्ग में नहीं है। इसमें प्रवेश के लिए एक छोटा-सा द्वार है। उसकी बनावट भी ऐसी है कि बाहर से आने वाले दुश्मों को पंक्तिबद्ध करके आसानी से सफाया किया जा सके। मुख्यद्वार को ढकने वाली दीवार में भीतर से गोलियां और तीर चलाने के लिए पचासों सुराख हैं। किले के चारों तरफ 14 बुर्ज हैं जिन पर मुगलों ने तोपें जमा की थी। इन्हीं बुर्जों ने तो दुर्जेय तारागढ़ को अजेय बना दिया था। इसलिए तारागढ़ जिसके भी अधीन रहा, वह दुर्ग के द्वार पर कभी लड़ाई नहीं हारा। शताधिक युद्धों के साक्षी इस दुर्ग का भाग्य मैदानी लड़ाई के निर्णयों के अनुसार ही बदलता रहा। तारागढ़ के दुर्ग-स्थापत्य में चौदह बुर्जों का विशेष महत्व रहा। बड़े दरवाजे से पूरब की ओर जा रही किले की दीवार पर तीन बुर्जें हैं-घूंघट बुर्ज, गुमटी बुर्ज तथा फूटी बुर्ज। घूंघट बुर्ज इमारतनुमा है-दूर से यह नजर नहीं आती। आजकल इसमें सरकार का वायरलैस लगा हुआ है। बुर्ज की इस प्रकार की संरचना युद्धनीति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जाती है। आगे है नक्कारची बुर्ज, कहते हैं कि सैय्यद मीरान साहब के साथ युद्ध में नगाड़ा बजाते हुए हजरत बुलन्दशाह यहीं मारे गए थे, इसलिए बुर्ज का नाम नक्कारची बुर्ज पड़ गया। अब तो ध्वंसावशेष ही दिखते हैं। शहर जाने वाली गिब्सन रोड उसी के पास से गुजरती है। इस बुर्ज के बाद है शृंगार चंवरी बुर्ज। वह आजकल लोढ़ों की कोठी है। इसके आगे चार बुर्जें हैं-अत्ता बुर्ज, पीपली बुर्ज, इब्राहिम शहीद का बुर्ज व दौराई बुर्ज। इनके बाद बान्द्रा बुर्ज, इमली बुर्ज, खिड़की बुर्ज व फतह बुर्ज है। इन बुर्जों के अलावा दुर्ग का दो किलोमीटर लम्बा परकोटा भी इसकी विशेषता है। इस परकोटे पर दो घुड़सवार आराम से साथ-साथ दौड़ सकते थे। पहले पूरा शहर इसी परकोटे के भीतर रहा होगा।
तारागढ़ का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि 1832 से 1920 के बीच अंग्रेजों ने इसमें व्यापक तोडफ़ोड़ की, जिसके परिणामस्वरूप तोरणद्वार, टूटी-फूटी बुर्जों, मीरान साहब की दरगाह आदि के अलावा आज कुछ भी शेष नहीं है। अजमेर के विख्यात इतिहासकार दीवान हरबिलास शारदा के अनुसार 1832 में भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम मेंटिक ने तारागढ़ में व्यापक तोड़-फोड़ के आदेश देते हुए व्यवस्था कर दी कि यहां नसीराबाद छावनी के सैनिकों की चिकित्सा हेतु सेनिटोरियम स्थापित कर दिया जाए। अत: 1860 से 1920 तक यहां सेनिटोरियम रहा। सन् 1033 से 1818 तक इस दुर्ग ने शताधिक युद्ध देखे। चौहानों के बाद अफगानों, मुगलों, राजपूतों, मराठों और अंग्रेजों के बीच इस दुर्ग को अपने-अपने अधिकार में रखने के लिए जो छोटे-बड़े युद्ध हुए उनका अनुमान इन ऐतिहासिक तथ्यों से लगाया जा सकता है-
1192 गढ़ पर गौरी का अधिकार, 1202 राजपूतों का आधिपत्य, 1226 में सुल्तान इल्तुतमश के अधीन, 1242 में सुल्तान अलाउद्दीन मसूद का कब्जा, 1364 में महाराणा क्षेत्र सिंह का अधिकार, 1405 में चूण्डा राठौड़ का प्रभुत्व, 1455 में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी का अधिकार, 1505 में मेवाड़ के सिसोदिया राजपूतों का कब्जा, 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह का अधिकार, 1538 में जोधपुर के राजा मालदेव का प्रभुत्व, 1557 में हाजी खां पठान का कब्जा, 1558 में मुगलों का अधिकार, 1818 में अंग्रेजों का अधिकार। लेकिन वक्त की विडम्बना है कि इतना महत्वपूर्ण तारागढ़ दुर्ग पुरातत्व विभाग की उपेक्षा के कारण मिट्टी में मिलता जा रहा है। इसके मुख्य द्वार और परकोटे से पत्थर निकाले जा रहे हैं। बीच में राज्य सरकार ने इसे राजस्थान का ''मिनी माउण्ट आबूÓÓ बनाने का विचार किया था, लेकिन वह योजना भी कागजों तक ही सीमित रह गई।
-शिव शर्मा, रामगंज, अजमेर