शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

भारत दर्शन की पुस्तक ‘व्हाट इज इंडिया’ ने मचाई धूम


सलिल ज्ञवाली शिलांग, मेघालय के निवासी हैं और उत्तरपूर्वी क्षेत्रों में अपनी लेखनी के माध्यम से जाने जाते हैं। दर्शन उनका प्रिय विषय है,जिसका समुचित प्रभाव उनके जीवन पर भी देखा जा सकता है। उनके व्यक्तित्व से गंभीरता झलकती है, वे हृदय से मित्रों का सम्मान करते हैं, और सभी से स्नेह करते हैं। उऩ्हें इस देश की अंतर्निहित धर्मनिरपेक्षिता की विरासत पर अभिमान है, इस देश के ज्ञान तथा विवेक की धरोहर पर गर्व है, इस देश की भाषाओं से मिट्टी और मेघों से अटूट प्रेम है। वे समाज के उत्थान, प्रगति तथा भलाई के लिये कटिबद्ध हैं। यह सब उनकी लेखनी में छलकता है। इसीलिये उत्तरपूर्वी तथा राष्ट्रीय समाचार पत्रों के पाठक उऩ्हें रुचि से पढ़ते हैं, उनकी सत्यप्रियता, नीतिपरकता तथा देशभक्ति से प्रभावित होकर उनकी प्रशंसा करते हैं।
उऩ्होंने अंग्रेज़ी भाषा में स्नातकोत्तर उपाधि ली और उनकी प्रिय कृति 'ह्वाट इज़ इंडिया' को आशातीत पाठकीय सफ़लता मिली और उऩ्होंने विश्व के विद्वानों तथा पाठकों दोनों से मुक्तकंठ प्रशंसा पाई है।
'ह्वाट इज़ इंडिया' (What is INDIA?) पुस्तक का लोकार्पण मेघालय के राज्यपाल महामहिम आर.एस. मूशाहारी के करकमलों द्वारा २००९ में हुआ था। इस पुस्तक अनुवाद अब तमिल, तेलुगु, मलयालम, मराठी, गुजराती, नेपाली आदि भाषाओं में हो रहा है। हिन्दी का अनुवाद हिन्दी तथा अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध लेखक एयर वाइस मार्शल विश्व मोहन तिवारी ने किया है जो शीघ्र ही प्रकाश्य है। तब ऐसी पुस्तक का उद्भव कैसे हुआ यह एक रोचक बात है : जिसकी प्रेरणा उदात्त हो, उसकी कृति भी उदात्त होगी।
इसके लेखन में उनके देश प्रेम का सबसे बड़ा हाथ है। किन्तु वास्तविक और गहरी प्रेरणा उऩ्हें स्वामी विवेकानन्द के साहित्य पठन से मिली है, और इस प्रेम का बीज उनके पिताजी ने उनके हृदय में बचपन में ही डाल दिया था।
१९८९ में वे गुवाहाटी से दिल्ली जा रहे थे और रेलवे स्टेशन पर उऩ्होंने जवाहरलाल नेहरू की स्तक 'डिस्कवरी आफ़ इंडिया' देखी, और तुरंत खरीद ली और उऩ्हें पता नहीं कि वह ६० घंटे की यात्रा कैसे हो गई, बस वे तो भारत के नेहरू के ज्ञान से प्रभावित थे। उऩ्होंने भारत के विषय में जो अनेक हृर्दयस्पर्षि प्रशंसिक वाणि पश्चिम के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों और दार्शनिकों के दिये गये थे। उनको पढ़कर सलिल अभिभूत हुए। वे उद्धरण तो भारत के प्राचीन विवेक, उसकी भाषा, संस्कृत और उसकी वैदिक संस्कृति को मानो नतमस्तक श्रद्धा सुमन अर्पण कर रहे थे। ये उद्धरण उनके हृदय में अंकित हो गए ।
दूसरी पुस्तक जिसने उऩ्हें और अधिक प्रेरणा दी वह है परमहंस योगानंद की 'आटोबायोग्राफ़ी आफ़ ए योगी' ( Autobiography of Yogi) । इस पुस्तक में भी एमर्सन (Ralph Emerson) शोपैनहवर (Schopenhauer) आदि जैसे महान विचारकों तथा दार्शनिकों के भारत के ज्ञान के प्रति उद्धरण ज्ञवाली को पढने मिला । तीसरी पुस्तक जिसने उऩ्हें इस संकलन का निर्माण करने के लिये मानो बाध्य कर दिया था, वह है यूएफ़ओ ( अनभिज्ञात उड़न पदार्थ ) के वैज्ञानिक टामस एन्ड्रू (Tomas Andrew) की पुस्तक 'वी आर नाट दि फ़र्स्ट' (हम इस पृथ्वी पर प्रथम नहीं हैं) इस पुस्तक में भी वे आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा दिये भारत विषयक उद्धरणों से प्रभावित हुए, जो भारत के प्राचीन विवेक का मुक्त हृदय से प्रसन्नगान कर रहे थे ।
इसका तो सीधा अर्थ यही निकलता है कि हमारा प्राचीन ज्ञान न केवल वैज्ञानिक दृष्टि रखता हैं वरन उनमें पूर्णरूप से 'विज्ञान' है । धीरे धीरे सलिल को समझ में आया कि श्रायडिन्जर, ओपनहाइमर, डेविड बाम, हाइज़ैनबर्ग, डेविड जोसैफ़सन आदि अधुनिक महान वैज्ञानिकों को वेद तथा उपनिषदों से विज्ञान की आधुनिकतम शाखा 'क्वांटम मैकैनिक्स' (Quantum Mechanics) के लिये भी वैज्ञानिक समझ मिली है, जिस क्वाण्टम मैकैनिक्स के विषय में कहा जाता है कि यह समझ में बिलकुल नहीं आती किन्तु कार्य सही करती है। इन तथ्यों ने सलिल के विश्वास को और सुदृढ़ किया कि प्राचीन भारतीय ज्ञान पूर्नरूप से विज्ञान संगत है। उऩ्होंने इस विषय से, भारतीय दर्शन से, संबन्धित कोई एक सौ पुस्तकें पढ़ डालीं। और भी फ़्रिट्याफ़ काप्रा की पुस्तक 'द डाओ आफ़ फ़िज़िक्स' (The Tao of Physics), डी पी सिंघल की 'इंडियन एन्ड द वर्ल्ड सिविलिज़ेशन्स', लिन्डा जानसैन की 'द कम्प्लीट इडियट गाइड टु हिन्दुइज़म', पोल विलियम राबर्ट्स की 'अंपायर आफ़ द सोल' आदि आदि पुस्तकों उनके हृदय में ज्वाला प्रज्वलित कर दी कि उऩ्हें इस देश की भव्य, उदात्त तथा मानवीय सम्स्कृति को बचाना है, और उसका प्रसार करना है।

जब उऩ्हें मालूम हुआ कि ‘क्वाण्टम मैकैनिक्स के पिता' नोबेल सम्मानित अर्विन श्रायडिन्जर ( Erwin Schrodinger) तथा परमाणु बम के जनक राबर्ट ओपनहाइमर (Robert Oppenheimer ) ने उपनिषदों तथा श्रीमद्भवद्गीता का गहन अध्ययन किया है और उऩ्हें अनेक उपयोगी मोती वहां से प्राप्त हुए हैं तथा वे भारतीय ज्ञान को सर्वोच्च सम्मान देते हैं, सलिल विस्मयाभिभूत हुए, मंत्रमुग्ध हुए। श्रायडिन्जर ने तो खुले आम अपने क्रान्तिकारी क्वाण्टम मैकैनिक्स के सिद्धान्त को उपनिषदों के मंत्रों द्वारा समर्थन भी दिया था। एर्विन श्रायडिन्जर का कथन है : “पूर्व से पश्चिम में कुछ रक्त- आधान आवश्यक है ताकि पाश्चात्य विज्ञान को आध्यात्मिक रक्ताल्पता से बचाया जा सके।. . . इस संसार में जो विभिन्नता है, उसमें चेतना की खोज करने के लिये पश्चिम में कोई भी ज्ञान तन्त्र नहीं है"
और इस तरह लगभग २२ वर्षों से सलिल अपने भारत प्रेम के कारण ऐसे, मणियों के समान, उद्धरणों का संकलन कर रहे हैं। किन्तु इसे पुस्तक का रूप देने का विचार उनके मन में तब आया जब वे फ़्रिट्याफ़ काप्रा की विश्वप्रसिद्ध पुस्त्तक 'द डाओ आफ़ फ़िज़िक्स' का अध्ययन दुबारा कर रहे थे। इस पुस्तक में जब उऩ्होंने राबर्ट ओपनहाइमर का यह कथन पढ़ा - “ हमें विज्ञान में जो ज्ञान मिलेगा, वह भारतीय प्राचीन ज्ञान का 'दृष्टान्तकरण' होगा, परिष्कृतरूप होगा और उससे हमारा उत्साह ही बढ़ेगा।" तब सलिल ने पुस्तक के विषय में गंभीर होकर सोचना प्रारंभ किया। यह कथन उऩ्हें चमत्कारी लगा । इस कथन में उऩ्होंने परमाणु बम के जनक के महान संदेश देखे जो न केवल वैज्ञानिकों के लिये हैं, वरन संपूर्ण मानव जाति के लिये हैं। उऩ्हें तीव्र प्रेरणा हुई कि वे इस कथन को समस्त भारतीय़ों तक पहुँचाएं। कम से कम वे पाठक यह तो समझेंगे कि भारत के प्राचीन ज्ञान में अंधविश्वास बिलकुल नहीं हैं, वरन वह पूर्णरूप से वैज्ञानिक है, वैश्विक है और सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष है।
अब सलिल इस पुस्तक का सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में अनुवाद कराने के लिये अपनी पूरी ऊर्जा लगा रहे हैं ताकि समस्त भारतीयों को इन उपरोक्त तथ्यों की जानकारी मिले जो उऩ्हें पाठ्यक्रम में नहीं मिलती। प्रसन्नता कीबात है कि हिन्दी, तमिल,तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, तथा नेपाली में सहर्ष अनुवाद करने के लिये अनुवादक मिल गए हैं। हिन्दी, गुजरती, तमिल, तेलुगु के अनुवाद तो हो चुके हैं अब वे उपयुक्त प्रकाशक की खोज में हैं। मलयालम तथा नेपाली में अनुवाद हो रहा है।
अंग्रेज़ी में पुस्तक उऩ्होने अपने खर्चे से ही प्रकाशित की है - यह भारतमाता को उनकी पुष्पांजलि है। कैलिफ़ोर्निया की प्रियंका शर्मा, पूर्व एयर वाइस मार्शल विश्व मोहन तिवारी, मदुरइ के सूर्यनारायणन, यूएसए के दिवाकरुणि मूर्ति, इटैली से उम्बैर्तो पवन, कैलिफ़ोर्निया की अन्ना हुरिहन, आंध प्रदेश के संजय भारत तथा और भी अनेक विद्वानों तथा लेखकों द्वारा दिये गए उत्साह और सहायता का वे बहुत ऋण मानते हैं।
उनके अनुमान के अनुसार विश्व के लगभग दस लाख व्यक्तियों ने उनके संकलन को डिजिटल माध्यम में पढ़ा है। उऩ्हें पूरे विश्व से इस पुस्तक पर बहुल मात्रा में - लगभग हजारों - हृदयग्राही टिप्पणियां प्राप्त हुई हैं, इनमें प्रसिद्ध वैज्ञानिक, विद्वान, साहित्यिक सम्मिलित हैं। इनके कुछ ही उदाहरण यहां देने का मैं लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं: -
प्रोफ़ैसर ए. वी. मुरली (पी एच डी., पूर्व नासा वैज्ञानिक, Huston, USA) उन इने गिने वैज्ञानिकों में से हैं जिऩ्हें दोनों एपोलो तथा लूना अभियान द्वारा लाई गई चन्द्रमा की मिट्टी के अध्ययन के लिये चुना गया था। उऩ्होंने लिखा - “ यह संकलन, सरल शब्दों में कहें तो, बहुत उत्कृष्ट है ! हम सभी को इसके संकलनकर्ता को धन्यवाद देना चाहिये । इन उक्तियों को हमें संसद भवन में, विधान सभा में, और समस्त शैक्षणिक सम्स्थाओं की दीवारों टाँकना चाहिये । सबसे महत्वपूर्ण तो यह होगा कि इसे विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में अनिवार्य होना चाहिये और हो सके तो उऩ्हें महान भारतीय ऋषियों के कार्यों को समझाया जाए ।"
मिर्ज़ा ए. ए. बेग (लंदन) :- “ मैं एकदम चकित हूं कि इस छोटी सी पुस्तक में सलिल ज्ञवाली ने कितना गहन ज्ञान और विवेक कितनी सावधानी से जड़ दिया है!. . . यह सच है कि भारतीय सभ्यता सबसे पुरानी है जिसने यूनान के पाइथगोरस और टायेनिअस अपोलोनिअस के समान दार्शनिकों को आकर्षित किया था।‘
टिमदि हार्ट, फ़िलाडैल्फ़िया, पैन्सिल्वेनिया, USA कहती है :- "हाइ सलिल ज्ञवली, इंतरनैट पर मुझे अचानक ही आपका संकलन प्राप्त हुआ, और मैने उसे आदि से अंत तक ध्यानपूर्वक पढ़ा। सुन्दर भारत माता के शाश्वत ज्ञान के विस्तार को कोई नहीं रोक सकता। मैं अपने ही स्पष्टरूप से अनुभूत अमित विकास का प्रमाण दे सकती हूं - उस भारतमाता को हार्दिक धन्यवाद कि जिसके आध्यात्मिक और दार्शनिक ऋषियों तथा प्रतिभाओं ने यह अनुपम भेंट दी। आपको इस ज्ञानदान के लिये बहुत धन्यवाद।"
मेरा निश्चित विश्वास है कि यह पुस्तक विश्व की अनेक भाषाओं के द्वारा भारत के प्राचीन ज्ञान के द्वारा समस्त विश्व की, जो अनेकों संकटों से ग्रस्त है, रक्षा करेगी, यह ज्ञान पुन: भारत को विश्वगुरु स्थापित करेगा।
-विश्व मोहन तिवारी, पूर्व एयर वाइस मार्शल, दिल्ली

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