रविवार, 1 जुलाई 2012

'स्वांग' के वजूद पर है गहरा संकट

नारायण बारेठ
उत्तर भारत के अनेक भागों में सांस्कृतिक बदलाव और दबाव के बीच एक लोक कला स्वांग अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही है. उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में स्वांग एक सदियों पुरानी परंपरा है. रियासत काल में इसके कलाकार राजा - महाराजाओं और पौराणिक पात्रो के किरदार का स्वांग रचते, लोगों का मनोरंजन करते और इसके साथ अच्छाई का संदेश देते.
हरियाणा में तो अब भी स्वांग देहात-कस्बो में मंचित होता है और कलाकार सियासी सभा महफिलों और मेलों में रौनक बिखेरते है. मगर दूसरे हिस्सों में इसका दायरा सिमट रहा है.
स्वांग के मंचों पर सिनेमा जैसी भव्यता नहीं होती, लेकिन जब स्वांग के कलाकार अपनी विधा का प्रदर्शन करते है तो लोग उसे तल्लीनता से देखते, सुनते है. स्वांग के कलाकार खुद को 'सांगी' कहते है. वे स्वांग करते है और गांव कस्बो की थकी-हारी जिन्दगी का दिल बहलाते है. सुरेन्द्र कुमार करनाल में एक नाट्य संस्था का संचालन करते है और वो स्वांग के आयोजन से जुड़े हैं. वे कहते हैं, ये एक पारंपरिक लोक कला है.
राजा-महाराजाओं के दरबार में भी स्वांग किया जाता था. ये सिलसिला सैंकड़ो साल पुराना है, उस दौर में पुरानी गाथाओं को नाट्य विधा के जरिये मंचित किया जाता था. ये काम अब भी जारी है.
हाँ, अब हम अपनी लोक कला की इस संस्कृति को भूलते जा रहे है. हम इसे बनाये रखे हुए है. हम इसमें किसी ऐतिहासिक पात्र का रूप धारण करते है. पात्र आज के दौर के भी होते है. इसे हम अपनी कला के माध्यम से जनता के सामने प्रस्तुत करते है. ये कलाकार समाज में चर्चित किसी हस्ती का रूप धारण करते है, उसी चरित्र के अनुसार अभिनय करते है, कभी किसी देवता तो कभी किसी नेता के रूप का श्रृंगार कर अपनी बात कहते है. वो संवाद बोलते है तो साथी कलाकार वाद्य यंत्रो पर संगीत की धुन छेड़ कर माहौल को जीवंत बनाए रखते है. ना रौशनी का चकाचौंध, ना पूंजी का प्रवाह, ना ऊँचे मंचो और महलो के लोग. इस विधा के कलाकार और कद्रदान समाज के उस हिस्से से आते है जहा जीवन का संघर्ष तो है, मगर स्वांग उतना नहीं.
क्या स्वांग पुरानी 'बहरूपिए' लोक कला जैसा ही है? सोनीपत के स्वांग कलाकार इंद्र सिंह कहते है 'स्वांग और बहरूपिए में बहुत फर्क है. बहरूपिये का कलाकार छोटा सा अभिनय कर पैसा मांग लेता है. सांगी ऐसे पैसे नहीं मांगता. इंद्र सिंह कहते है, �ये सिनेमा और टीवी तो अभी आए है. ये तो पृथ्वीराज चौहान के दौर में भी थी. ये हमारे पुरखो की कला है. हम इसे लोगों को बताना चाहते है. हम दिल से जुड़े है इस कला से. पर अब हमको दुःख होता है, हमारी पहले जैसी कद्र नहीं है. हम अपनी कद्र बढ़ाना चाहते है. हम इसके जरिये सत्य का प्रचार करते है जैसे राजा हरिश्चंद्र सत्यवादी थे, हम उनके किरदार को लोगो के सामने पेश करते है.�
समय के साथ जिदंगी में स्वांग तो बढ़ा मगर इन कलाकारों को वैसा प्रोत्साहन नहीं मिला. स्वांग कलाकार प्रेमलाल तीस साल से स्वांग कर रहे है. वे कहते है कि ये तो इंद्र की कचहरी में भी होता था. उन्होंने कहा, �मैं मदरना रोल करता हूँ, नृत्य करता हूं, हार्मोनियम बजाता हूं. अब इससे बमुशिकल गुजारा होता है, लेकिन इससे लगाव है. जैसे मैं गाता हूँ हरियाणा की कहानी सुन लो दो सौ साल की, नए किस्म की हवा चाल पड़ी नए चाल की. तो ये स्वांग तो चलता ही रहेगा.�
यूपी में मुज्जफरनगर के संजय खुद स्वांग के सिध्हस्त कलाकार है. वे कहते है स्वांग आज के सिनेमा और टी वी धारावाहिकों से बेहतर है.इसे पुरे परिवार के साथ आप देख सकते है.वे कहते है -पहले का दौर कुछ और था.जब शरम हया थी,छोटे बड़े की कद्र थी. आज ऐसी फिल्मे है जो घर परिवार में नहीं देख सकते .लेकिन स्वांग की कहानी ऐसी होती है माँ,पिता,बहिन ,भाई ,बच्चे सब एक साथ देख सकते है. टी वी और सिनेमा में बहुत कुछ बनावटी है. मगर हमारी कला में ऐसा नहीं है. लोग देखते और दिल से तारीफ करते है.
भारत में प्रजातंत्र परवान चढ़ा, राजनीति बलवान हुई. लेकिन इसके साथ ही स्वांग और नौटंकी जैसी लोक कलाओ की कद्र घट गई. गोया अब जीवंत स्वांग तो सियासी मंचो का चहेता हो गया, ऐसे में कोई अभिनीत स्वांग क्यों देखे. ये ही इन कलाकारों की पीड़ा है.

लेखक श्री नारायण बारेठ राजस्थान के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं और लंबे समय से बीबीसी से जुड़े हैं

2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut achha saanskritik jaankariparak or sochniy bindu par kendrit Aalekh...! sadhuwad... hamari saanskritik virasat ke liye Aise hi sundar vichaaron ki is Saajha Manch se Apekshaa Hai...!

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